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अब तक अनार के छिलके फेंकते आए हैं? इसकी चाय के फायदे जान लेंगे, तो आज से ही जमा करना शुरू कर देंगे

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अब तक अनार के छिलके फेंकते आए हैं? इसकी चाय के फायदे जान लेंगे, तो आज से ही जमा करना शुरू कर देंगे


अनार के छिलके जितने साधारण लगते हैं, उतने ही औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं। इनसे बनी चाय शरीर को अंदर से डिटॉक्स करती है और कई बीमारियों से बचाती है। ...और पढ़ें





अनार को अक्सर उसके मीठे दानों के लिए खाया जाता है, लेकिन इसके छिलकों में भी भरपूर औषधीय गुण पाए जाते हैं। आयुर्वेद और आधुनिक रिसर्च दोनों ही बताते हैं कि अनार के छिलकों में एंटीऑक्सीडेंट्स, विटामिन और मिनरल्स मौजूद होते हैं जो सेहत को कई तरीकों से फायदा पहुंचाते हैं।


इन छिलकों से बनी चाय न सिर्फ टेस्टी होती है बल्कि शरीर को डिटॉक्स करने, इम्युनिटी बढ़ाने और कई बीमारियों से बचाने में मदद करती है।तो आइए जानते हैं हफ्ते में कम से कम दो बार अनार के छिलकों की चाय क्यों पीनी चाहिए और इसे बनाने की सही विधि के बारे में-

अनार के छिलकों की चाय पीने के 5 बड़े फायदे
डाइजेस्टिव सिस्टम को मजबूत बनाती है

अनार के छिलकों में मौजूद टैनिन्स और पॉलीफेनॉल्स गैस, अपच और डायरिया जैसी प्रॉब्लम्स से राहत दिलाते हैं। यह पेट की अंदरूनी लेयर को शांत करता है और हेल्दी डाइजेशन को बढ़ावा देता है।

इम्युनिटी बूस्टर

इस चाय में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स और विटामिन सी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाते हैं। नियमित सेवन से सर्दी-जुकाम, गले की खराश और इन्फेक्शन से बचाव होता है।
हार्ट को हेल्दी रखती है

अनार के छिलकों में फ्लेवोनॉयड्स और एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं जो कोलेस्ट्रॉल लेवल को कंट्रोल में रखते हैं और ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर बनाते हैं। इससे दिल की बीमारियों का खतरा कम होता है।
वेट लॉस करने में मददगार

इस चाय को पीने से मेटाबॉलिज्म तेज होता है और शरीर से टॉक्सिन्स बाहर निकलते हैं। यह भूख को संतुलित करती है और फैट बर्न करने में मदद करती है, जिससे धीरे-धीरे वजन कम होता है

स्किन और बालों के लिए फायदेमंद

अनार के छिलकों में एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-फंगल गुण होते हैं जो स्किन इन्फेक्शन और मुंहासों से बचाते हैं। साथ ही इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स झुर्रियों और समय से पहले बूढ़ेपन को रोकते हैं। बालों के लिए भी यह जड़ों को मजबूत बनाता है।

अनार के छिलकों की चाय बनाने की विधि

इंग्रीडिएंट्स अनार के सूखे छिलके– 2 चम्मच
पानी– 2 कप
शहद या नींबू– स्वादानुसार

बनाने का तरीका

सबसे पहले अनार के छिलकों को अच्छी तरह धोकर धूप में सुखा लें। सूख जाने के बाद इन्हें पीसकर पाउडर बना लें और एयरटाइट डिब्बे में रख लें। चाय बनाने के लिए एक पैन में 2 कप पानी डालें और उबालें। इसमें 2 चम्मच अनार के छिलकों का पाउडर डालकर 5–7 मिनट तक उबालें। गैस बंद कर इसे छान लें और चाहें तो शहद या नींबू मिलाकर गुनगुना पीएं।

खाने का सही तरीका

एक्सपर्ट के अनुसार हफ्ते में दो से तीन बार इस चाय का सेवन करना फायदेमंद होता है। इसे सुबह खाली पेट या शाम को हल्के नाश्ते के बाद पीना बेहतर रहता है।
रात 2 बजे बच्चे को चढ़ जाए तेज बुखार, तो घबराएं नहीं; डॉक्टर की यह सलाह आएगी काम

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आधी रात को बच्चे को बुखार आए, तो पैनिक होने के बजाय करें ये काम (Image Source: AI-Generated)



बुखार कम करने का प्रभावी तरीका है गुनगुने पानी से स्पॉन्जिंग


माथे, गर्दन, बगल और जांघों पर विशेष ध्यान दें


ठंडे पानी से बचें; बुखार कम होने पर ढीले कपड़े पहनाएं


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। सोचिए रात के 2 बजे हैं, चारों तरफ सन्नाटा है और अचानक आपको महसूस होता है कि आपके बच्चे का शरीर बुखार से तप रहा है। ऐसे वक्त में, जब डॉक्टर उपलब्ध न हों, तो खासतौर से न्यू पेरेंट्स अक्सर घबरा जाते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपके घर में मौजूद सिर्फ थोड़ा-सा पानी और सूती कपड़ा इस मुश्किल स्थिति को संभाल सकता है?


जी हां, रेडिक्स हेल्थकेयर, निर्माण विहार, दिल्ली के चेयरमैन और वरिष्ठ सलाहकार बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. रवि मलिक की मानें, तो बच्चे का बुखार तेज हो, तो 'स्पॉन्जिंग' तापमान को नीचे लाने का सबसे असरदार तरीका है। आइए जानते हैं इसे सही तरीके से कैसे करें।


स्पॉन्जिंग करने का सही तरीका

बुखार उतारने के लिए सबसे पहले एक कटोरे में गुनगुना पानी लें। ध्यान रहे, पानी बहुत ठंडा नहीं होना चाहिए। इस पानी में एक साफ कपड़ा भिगोएं और इन स्टेप्स को फॉलो करें:माथे से करें शुरुआत: सबसे पहले भीगे हुए कपड़े से बच्चे का माथा पोंछें।
गर्दन की सफाई: इसके बाद बच्चे की गर्दन को पोंछें।
सबसे जरूरी जगहें: गर्दन के बाद बच्चे की बगलों और जांघों पर स्पॉन्जिंग करें। यह स्टेप सबसे जरूरी है क्योंकि शरीर में सबसे ज्यादा गर्मी यहीं से पैदा होती है।
हाथ और पैर: आखिर में, बच्चे के हाथों और पैरों को अच्छी तरह से स्पॉन्जिंग करें।
कब बदलें पानी?

स्पॉन्जिंग के दौरान कपड़े को बार-बार पानी में डुबोते रहें। जैसे ही कटोरे का पानी बच्चे के शरीर की गर्मी से गर्म हो जाए, उसे तुरंत बदल दें और ताजा गुनगुना पानी लें। यह प्रक्रिया तब तक दोहराते रहें जब तक कि बच्चे का शरीर का तापमान कम न हो जाए। जैसे ही तापमान नीचे आए, स्पॉन्जिंग बंद कर दें।

क्या सावधानियां रखें?

इस प्रक्रिया के दौरान कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है:कभी भी बर्फ वाले ठंडे पानी का इस्तेमाल न करें।
अगर किसी भी समय बच्चे को बहुत ज्यादा असुविधा महसूस हो, तो स्पॉन्जिंग तुरंत रोक दें और चिकित्सकीय सलाह लें।
बुखार कम होने के बाद क्या करें?

जब बच्चे का तापमान कम हो जाए और आप स्पॉन्जिंग बंद कर दें, तो बच्चे के शरीर को एक अच्छे सूती तौलिये से पोंछकर सुखा लें। इसके बाद बच्चे को हल्के और ढीले-ढाले सूती कपड़े पहनाएं, ताकि शरीर को हवा लगती रहे।
एंटीबायोटिक कोर्स के बाद क्यों खराब हो जाता है पेट? डॉक्टर ने समझाई वजह और बचाव के तरीके

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क्या आपने कभी सोचा है कि इन्फेक्शन से लड़ने वाली जो दवा आपकी जान बचाती है, वही आपके शरीर के अंदर क्या उथल-पुथल मचा सकती है? एंटीबायोटिक्स ने बेशक मॉडर् ...और पढ़ें






एंटीबायोटिक्स ने बैक्टीरिया से होने वाले संक्रमणों से लड़कर अनगिनत जानें बचाई हैं, लेकिन इनका इस्तेमाल कभी-कभी हमारे शरीर, खासकर हमारी गट हेल्थ के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है।

डॉ. अमरीश साहनी (एसोसिएट डायरेक्टर, इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड डाइजेस्टिव डिजीज, बीएलके-मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल) बताते हैं कि हमारे पेट में ट्रिलियंस बैक्टीरिया, वायरस और फंगी रहते हैं, जिन्हें 'गट माइक्रोबायोम' कहा जाता है। यह पाचन, इम्युनिटी, विटामिन बनाने और यहां तक कि मेंटल हेल्थ के लिए भी बहुत जरूरी हैं।




(Image Source: AI-Generated)
पेट का संतुलन बिगड़ना

एंटीबायोटिक्स का सबसे बड़ा असर 'डिस्बायोसिस' के रूप में होता है, जिसका मतलब है पेट के बैक्टीरिया में असंतुलन।ब्रॉड-स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक्स का खतरा: ऐसी एंटीबायोटिक्स जो कई तरह के बैक्टीरिया को मारती हैं, वे सबसे ज्यादा नुकसान करती हैं। ये पेट में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया की पूरी आबादी को खत्म कर सकती हैं, जिससे उनकी विविधता कम हो जाती है।
तेजी से होता है असर: यह बदलाव बहुत तेजी से होता है, अक्सर इलाज शुरू होने के कुछ दिनों के अंदर ही।
लंबे समय तक प्रभाव: क्लिंडामाइसिन जैसी कुछ एंटीबायोटिक्स पेट के बैक्टीरिया में लंबे समय तक रहने वाले बदलाव कर सकती हैं, जिससे प्रतिरोधी बैक्टीरिया को पनपने का मौका मिल जाता है।
डायरिया और पाचन की समस्याएं

एंटीबायोटिक्स का एक बहुत ही आम दुष्प्रभाव है 'एंटीबायोटिक-एसोसिएटेड डायरिया'।


कितना आम है?

एंटीबायोटिक्स लेने वाले हर पांच में से एक व्यक्ति को यह समस्या हो सकती है।
क्यों होता है?

अच्छे बैक्टीरिया के कम होने से पाचन बिगड़ जाता है और Clostridium difficile जैसे हानिकारक बैक्टीरिया टॉक्सिन्स बनाने लगते हैं।लक्षण: पेट में ऐंठन, मतली, गैस और दस्त। यह इसलिए होता है क्योंकि फाइबर का पाचन सही से नहीं हो पाता और आंतों में पानी सोखने की प्रक्रिया बदल जाती है।
गंभीर मामले: अगर ध्यान न दिया जाए, तो यह कोलाइटिस या इरिटेबल बाउल सिंड्रोम (IBS) जैसी गंभीर बीमारियों का रूप ले सकता है।




(Image Source: AI-Generated)
लंबे समय तक रहने वाले खतरे

सिर्फ तुरंत होने वाली परेशानियां ही नहीं, एंटीबायोटिक्स का असर लंबे समय तक रह सकता है:एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस: बार-बार एंटीबायोटिक्स लेने से पेट में ऐसे बैक्टीरिया पनप सकते हैं जिन पर दवाओं का असर नहीं होता। इससे भविष्य में संक्रमण का इलाज करना मुश्किल हो सकता है।
मेटाबॉलिज्म पर असर: माइक्रोबायोम में बदलाव से पोषक तत्वों को सोखने की क्षमता और इम्यून सिस्टम पर असर पड़ सकता है।
बच्चों पर प्रभाव: बच्चे सबसे ज्यादा संवेदनशील होते हैं। बचपन में एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल उनके जीवन भर की पेट की सेहत को प्रभावित कर सकता है, जिसका संबंध एलर्जी या मोटापे जैसी समस्याओं से हो सकता है।
गट हेल्थ को कैसे करें ठीक?

अच्छी खबर यह है कि हमारा पेट काफी लचीला होता है और समय के साथ ठीक हो सकता है, हालांकि इसमें हफ्तों या महीनों लग सकते हैं। रिकवरी के लिए आप ये उपाय कर सकते हैं:

सही डाइट: लहसुन, प्याज और केले जैसे 'प्रीबायोटिक' फाइबर से भरपूर चीजें खाएं।
फर्मेंटेड फूड्स: दही या किमची जैसे फर्मेंटेड फूड्स लें, जो शरीर में प्रोबायोटिक्स पहुंचाते हैं।
सप्लीमेंट्स: प्रोबायोटिक सप्लीमेंट्स पेट में अच्छे बैक्टीरिया को वापस लाने में मदद कर सकते हैं। ध्यान रहे, इन्हें एंटीबायोटिक का कोर्स पूरा होने के बाद लेना चाहिए ताकि दवा का असर कम न हो।
हाइड्रेशन: खूब पानी पिएं और शरीर को हाइड्रेटेड रखें।
सावधानी: वायरल बीमारियों (जैसे सामान्य सर्दी-जुकाम) के लिए एंटीबायोटिक्स न लें। इनका इस्तेमाल तभी करें जब बहुत जरूरी हो।

एंटीबायोटिक्स जरूरी हैं, लेकिन इनका असर हमारी पेट की सेहत पर गहरा होता है। समझदारी इसी में है कि हम इनका इस्तेमाल सोच-समझकर करें।
डायबिटीज के मरीजों के लिए वरदान है 'दिन की रोशनी', शुगर कंट्रोल करने का नया वैज्ञानिक तरीका

डायबिटीज के मरीजों के लिए वरदान है 'दिन की रोशनी', शुगर कंट्रोल करने का नया वैज्ञानिक तरीका

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अक्सर डायबिटीज के मरीज अपने खान-पान और दवाइयों पर तो बहुत ध्यान देते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि "दिन की रोशनी" भी आपकी शुगर को कंट्रोल करने में द ...और पढ़ें






ब्लड शुगर कंट्रोल करना है? तो दिन की रोशनी में बिताएं वक्त (Image Source: Freepik)



प्राकृतिक प्रकाश चयापचय और सर्कैडियन रिदम को बेहतर बनाता है


ब्लड शुगर को स्थिर करता है, इंसुलिन संवेदनशीलता बढ़ाता है


अध्ययन ने टाइप 2 मधुमेह रोगियों को लाभ की पुष्टि की


दिन का प्राकृतिक प्रकाश मधुमेह (डायबिटीज) रोगियों के लिए कई तरह से फायदेमंद है। यह विटामिन डी उत्पादन, मेटाबालिज्म और सर्केडियन रिदम (शरीर की आंतरिक घड़ी) को बेहतर बनाता है, जिससे ब्लड शुगर के नियंत्रण में मदद मिलती है, इंसुलिन संवेदनशीलता बढ़ती है और फैट आक्सीडेशन (वसा जलना) बढ़ता है, जो समग्र शर्करा संतुलन और एनर्जी मेटाबालिज्म को सुधारता है, साथ ही मूड और प्रतिरक्षा प्रणाली को भी मजबूत करता है।


एक अध्ययन के अनुसार, दिन की रोशनी का सेवन स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद करता है, जिससे टाइप 2 डायबिटीज से ग्रसित लोगों को बेहतर ग्लाइसेमिक नियंत्रण प्राप्त करने में मदद मिलती है। स्विट्जरलैंड की यूनिवर्सिटी आफ जिनेवा (यूएनआइजीई) और नीदरलैंड के मास्ट्रिच विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पाया कि जो लोग प्राकृतिक प्रकाश के संपर्क में थे, उनके ब्लड शुगर का स्तर दिन में ज्यादा घंटों तक सामान्य रेंज में रहता है और उनमें कम उतार-चढ़ाव होता है।




(Image Source: Freepik)
प्राकृतिक प्रकाश का लाभकारी प्रभाव

इसके अतिरिक्त उनके मेलाटोनिन स्तर, जो नींद का हार्मोन है शाम के समय थोड़ा अधिक था और वसा आक्सीडेटिव मेटाबालिज्म में भी सुधार हुआ। यह अध्ययन सेल मेटाबालिज्म नाम के जर्नल में प्रकाशित हुआ । इस स्थिति से ग्रसित लोगों पर प्राकृतिक प्रकाश के लाभकारी प्रभाव का पहला प्रमाण प्रस्तुत करता है। यूएनआइजीई में एसोसिएट प्रोफेसर चार्ना डिबनर ने कहा, यह कई सालों से पता है कि सर्केडियन रिदम में गड़बड़ी मेटाबालिक डिसआर्डर के विकास में एक बड़ी भूमिका निभाती है, जो पश्चिमी आबादी के बढ़ते हिस्से को प्रभावित कर रही है।

65 वर्ष से अधिक आयु के 13 लोगों पर अध्ययन

अध्ययन के लिए टीम ने 65 वर्ष और उससे अधिक आयु के 13 लोगों को भर्ती किया, ये सभी टाइप 2 मधुमेह से ग्रसित थे । उन्होंने विशेष रूप से डिजाइन किए गए रहने के स्थानों में 4.5 दिन बिताए, जो या तो बड़े खिड़कियों के माध्यम से प्राकृतिक प्रकाश से या कृत्रिम प्रकाश से रोशन थे। चार सप्ताह के कम से कम ब्रेक के बाद वे दूसरे सत्र के लिए लौटे, इस बार दूसरे प्रकाश वातावरण में थे।


विश्लेषण में दिखे सकारात्मक बदलाव

शरीर के मेटाबालिज्म में देखे गए सकारात्मक परिवर्तनों को बेहतर ढंग से समझने के लिए विज्ञानियों ने लोगों से प्रत्येक प्रकाश उपचार से पहले, दौरान और बाद में रक्त और मांसपेशियों के नमूने लिए। उन्होंने कल्चर की गई कंकाल की मांसपेशी कोशिकाओं में आणविक घड़ियों के नियमन के साथ- साथ रक्त में लिपिड, मेटाबोलाइट्स और जीन ट्रांसक्रिप्ट्स का विश्लेषण किया।


कुल मिलाकर नतीजे साफ दिखाते हैं। कि प्राकृतिक रोशनी से आंतरिक घड़ी और मेटाबालिज्म प्रभावित होते हैं। डिबनर ने बताया, यह बेहतर ब्लड शुगर के बेहतर नियमन और दिमाग में सेंट्रल क्लाक और अंगों में मौजूद क्लाक के बीच बेहतर तालमेल का कारण हो सकता है।"
पैकेटबंद खाने का 'स्वाद' पड़ सकता है जान पर भारी, प्रिजर्वेटिव्स से बढ़ रहा डायबिटीज और कैंसर का खतरा

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क्या आप जानते हैं कि पैकेट बंद खाने को लंबे समय तक खराब होने से बचाने के लिए जो केमिकल्स इस्तेमाल किए जाते हैं, वे आपकी सेहत के लिए भारी पड़ सकते हैं? ...और पढ़ें





मेडिकल जर्नल्स 'नेचर कम्युनिकेशंस' और 'द बीएमजे' में पब्लिश रिजल्ट्स के मुताबिक, प्रिजर्वेटिव्स के ज्यादा सेवन और गंभीर बीमारियों के बीच सीधा संबंध पाया गया है। शोधकर्ताओं ने 2009 से 2023 के बीच 1 लाख से ज्यादा फ्रांस के लोगों के खान-पान और हेल्थ डेटा का विश्लेषण किया। 14 साल तक चले इस 'न्यूट्रीनेट-सैंट' अध्ययन में यह देखा गया कि प्रिजर्वेटिव्स का हमारे शरीर पर क्या असर पड़ता है (Health Risks of Packaged Food)।




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डायबिटीज का खतरा

'नेचर कम्युनिकेशंस' में प्रकाशित अध्ययन टाइप-2 डायबिटीज और प्रिजर्वेटिव्स के बीच संबंध खोजने वाला दुनिया का पहला अध्ययन है। इसके नतीजे बेहद चिंताजनक हैं:शोध में कुल 17 प्रिजर्वेटिव्स की जांच की गई, जिनमें से 12 का ज्यादा सेवन टाइप-2 डायबिटीज के खतरे को बढ़ाने वाला पाया गया।
जिन लोगों ने कुल मिलाकर प्रिजर्वेटिव्स का हाई इनटेक किया, उनमें डायबिटीज होने का खतरा 47% तक ज्यादा था।
नॉन-एंटीऑक्सीडेंट प्रिजर्वेटिव्स के मामले में यह खतरा 49% और एंटीऑक्सीडेंट एडिटिव्स के मामले में 40% ज्यादा पाया गया।

स्टडी की कोऑर्डिनेटर मैथिल्ड टौवियर ने कहा कि हालांकि इन नतीजों की पुष्टि के लिए अभी और शोध की जरूरत है, लेकिन यह पहले से मौजूद उन एक्सपेरिमेंट्स से मेल खाते हैं जो बताते हैं कि ये केमिकल्स हानिकारक हो सकते हैं।




(Image Source: Freepik)
कैंसर से जुड़ा खतरा

'द बीएमजे' में प्रकाशित कैंसर से जुड़े अध्ययन में पाया गया कि हालांकि सभी प्रिजर्वेटिव्स कैंसर का कारण नहीं बनते, लेकिन कुछ विशेष रसायनों का ज्यादा सेवन खतरे को बढ़ा सकता है:पोटैशियम सॉर्बेट (Potassium Sorbate): इसका ज्यादा सेवन ओवरऑल कैंसर के खतरे को 14% और ब्रेस्ट कैंसर के खतरे को 26% तक बढ़ा सकता है।
सोडियम नाइट्राइट (Sodium Nitrite): यह प्रोस्टेट कैंसर के खतरे को 32% तक बढ़ा सकता है।
पोटैशियम नाइट्रेट (Potassium Nitrate): इससे ब्रेस्ट कैंसर का खतरा 22% ज्यादा पाया गया।
सल्फाइट्स (Sulfites): इनका संबंध ओवरऑल कैंसर के खतरे में 12% की बढ़ोतरी से पाया गया।
एसीटेट्स और एसिटिक एसिड: इनका संबंध भी कैंसर के बढ़ते जोखिम से जुड़ा हुआ मिला।

शोधकर्ताओं का मानना है कि ये केमिकल्स हमारे शरीर के इम्यून सिस्टम और सूजन संबंधी रास्तों को बदल सकते हैं, जिससे कैंसर पनपने की संभावना बढ़ जाती है।

क्या रहते हैं एक्सपर्ट्स?

यूनिवर्सिटी कॉलेज डबलिन के प्रोफेसर विलियम गैलाघर ने कहा कि भले ही कैंसर की दर में यह बढ़ोतरी मामूली लग सकती है, लेकिन जब हम पूरी आबादी के स्तर पर इसे देखते हैं, तो यह एक महत्वपूर्ण और गंभीर मामला है।


चूंकि यह एक 'ऑब्जर्वेशनल स्टडी' थी, इसलिए शोधकर्ता सीधे तौर पर कारण और प्रभाव का दावा नहीं कर रहे हैं, लेकिन यह नतीजे काफी महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में, उपभोक्ताओं को सलाह दी गई है कि वे पैकेट बंद या अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड के बजाय ताजा और कम से कम प्रोसेस्ड फूड्स को ही डाइट में शामिल करें।