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हड्डियों की मजबूती ही नहीं, पेट की हर तकलीफ का भी 'सुपरहीरो' है विटामिन-D; डॉक्टर का बड़ा खुलासा

हड्डियों की मजबूती ही नहीं, पेट की हर तकलीफ का भी 'सुपरहीरो' है विटामिन-D; डॉक्टर का बड़ा खुलासा

हड्डियों की मजबूती ही नहीं, पेट की हर तकलीफ का भी 'सुपरहीरो' है विटामिन-D; डॉक्टर का बड़ा खुलासा


आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में पेट से जुड़ी बीमारियां बहुत तेजी से बढ़ रही हैं। ...और पढ़ें






लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। इरिटेबल बाउल सिंड्रोम, इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज और क्रोहन डिजीज जैसी समस्याएं, आज के खराब लाइफस्टाइल में काफी आम हो गई हैं। इन बीमारियों के कारण लोगों को अक्सर पेट में तेज दर्द, दस्त, सूजन और पाचन से जुड़ी गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ता है।


हालांकि, हाल ही में हुए शोध एक बहुत ही पॉजिटिव खबर लेकर आए हैं और वह यह है कि एक खास विटामिन आपकी इन सभी तकलीफों को कम करने में एक बड़ी भूमिका निभा सकता है। आइए, PSRI अस्पताल, दिल्ली के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. नृपेन सैकिया से डिटेल में जानते हैं इस बारे में।




(Image Source: Freepik)
सिर्फ हड्डियों के लिए नहीं, इम्युनिटी का भी रक्षक

हम सभी आमतौर पर यही मानते हैं कि 'विटामिन D' का काम सिर्फ हमारी हड्डियों को मजबूत बनाना है, लेकिन इसका फायदा सिर्फ हड्डियों तक ही सीमित नहीं है।

मेडिकल साइंस के अनुसार, यह विटामिन हमारे शरीर के इम्यून सिस्टम को संतुलित रखने में भी बेहद जरूरी है। आंतों से जुड़ी कई गंभीर बीमारियां 'ऑटोइम्यून' होती हैं- यानी एक ऐसी स्थिति जहां शरीर का अपना ही सुरक्षा तंत्र गलती से अपनी स्वस्थ कोशिकाओं पर हमला करने लगता है।


ऐसी स्थिति में विटामिन-डी शरीर की सूजन को कम करने और इम्यून सिस्टम की प्रतिक्रिया को सही दिशा में नियंत्रित करने में बड़ी मदद करता है।
"लीकी गट" से बचाव और आंतों की मजबूती

इसके अलावा, आंतों को सुरक्षित रखने में भी विटामिन D का काम किसी मजबूत दीवार की तरह होता है। यह हमारी आंतों की परत (को ताकत देता है। अगर किसी कारणवश आंतों की यह दीवार कमजोर हो जाए, तो "लीकी गट" नाम की खतरनाक समस्या पैदा हो सकती है।


इस स्थिति में हानिकारक टॉक्सिन्स और खतरनाक बैक्टीरिया आसानी से शरीर के अंदर प्रवेश कर जाते हैं। शरीर में विटामिन D की सही मात्रा इस परत को मजबूत बनाए रखती है और ऐसे जोखिमों को काफी हद तक टाल देती है।




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विटामिन-डी की कमी से बढ़ सकती है IBD की तकलीफ

कई मेडिकल स्टडीज में भी इस बात की पुष्टि हुई है कि जिन लोगों में विटामिन D की कमी पाई जाती है, उनमें IBD जैसी आंतों की बीमारियों के लक्षण कहीं ज्यादा गंभीर और तकलीफदेह होते हैं।


डॉक्टरों ने पाया है कि ऐसे मरीजों को जब विटामिन-डी के सप्लीमेंट दिए जाते हैं, तो उनके लक्षणों में काफी हद तक सुधार देखने को मिलता है। हालांकि, यह समझना भी जरूरी है कि सिर्फ विटामिन-डी ही इन बीमारियों का इकलौता इलाज नहीं है, बल्कि यह आपके संपूर्ण इलाज और रिकवरी की प्रक्रिया को बेहतर बनाने का एक बहुत ही शानदार तरीका है।
अक्सर आंखों में दर्द लेकर जागते हैं आप? जानिए डॉक्टर ने किन 5 कारणों को बताया जिम्मेदार

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सुबह आंखों में दर्द और भारीपन कई लोगों को परेशान करता है। ...और पढ़ें





क्या आप भी सुबह आंखों में दर्द के साथ उठते हैं? (Image Source: AI-Generated)


सुबह आंखों में दर्द के 5 मुख्य कारण जानें


ड्राई आई, नींद की कमी, एलर्जी प्रमुख वजहें


इन्फेक्शन, गलत चश्मा भी दर्द का कारण

 नई दिल्ली। सुबह की शुरुआत अगर ताजगी की बजाय आंखों में भारीपन, चुभन या दर्द के साथ हो, तो पूरा दिन परेशानी में बीतता है। हम में से कई लोग इसे एक मामूली थकान मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यह किसी सीरियस आई प्रॉब्लम का शुरुआती संकेत भी हो सकता है।


ग्वालियर स्थित रतन ज्योति नेत्रालय के संस्थापक, निदेशक और सर्जन डॉ. पुरेन्द्र भसीन के अनुसार, सुबह आंखों में दर्द के पीछे मुख्य रूप से 5 कारण जिम्मेदार हो सकते हैं। सही इलाज के लिए इन कारणों को समझना बेहद जरूरी है। आइए जानते हैं।



(Image Source: AI-Generated)
ड्राई आई

रात में सोते समय हमारी आंखें बंद रहती हैं, जिसके कारण प्राकृतिक आंसुओं का बनना कम हो जाता है। जिन लोगों की आंखों में पहले से ही नमी की कमी होती है, उन्हें सुबह उठने पर जलन और दर्द महसूस होता है। खासकर जो लोग बहुत ज्यादा स्क्रीन का इस्तेमाल करते हैं, उनमें यह समस्या सबसे ज्यादा देखी जाती है।



यह वीडियो भी देखें


नींद की कमी

अगर आप पर्याप्त और गहरी नींद नहीं ले रहे हैं, तो आपके शरीर के साथ-साथ आपकी आंखों को भी पूरा आराम नहीं मिल पाता। देर रात तक मोबाइल या लैपटॉप पर आंखें गड़ाए रखने की आदत आंखों पर एक्स्ट्रा दबाव डालती है। यही कारण है कि सुबह उठने पर आंखों में भयंकर थकान और दर्द होता है।

एलर्जी का असर

कई बार हमारे बिस्तर, तकिए या कंबल में धूल और प्रदूषण के बारीक कण मौजूद होते हैं, जो रात भर हमारी आंखों को नुकसान पहुंचाते हैं। इस एलर्जी के कारण सुबह आंखों में कई समस्याएं हो सकती हैं, जैसे:
आंखों में रेडनेस
तेज खुजली मचना
दर्द होना
आंखों से पानी आना या सूजन महसूस होना
आंखों में इन्फेक्शन

अगर सुबह आपकी आंखें चिपचिपी हो रही हैं और दर्द के साथ सूजन भी है, तो यह कंजक्टिवाइटिस या ब्लेफेराइटिस जैसे इन्फेक्शन का स्पष्ट संकेत हो सकता है। अगर ये लक्षण कई दिनों तक बने रहें, तो बिना देरी किए डॉक्टर से अपनी जांच करवानी चाहिए।

गलत चश्मे का इस्तेमाल या कमजोर नजर

अगर आपकी आंखों की रोशनी कमजोर है और आप या तो चश्मा नहीं पहनते या फिर गलत पावर का चश्मा इस्तेमाल कर रहे हैं, तो आंखों की मांसपेशियों पर लगातार तनाव बना रहता है। यह बढ़ा हुआ तनाव भी सुबह के समय आंखों में दर्द का एक बड़ा कारण बनता है।




(Image Source: AI-Generated)
बचाव के लिए रखें इन बातों का ध्यान

डॉ. भसीन सलाह देते हैं कि अगर यह दर्द कभी-कभार होता है, तो यह चिंता का विषय नहीं है, लेकिन अगर रोज सुबह आंखें खोलने में तकलीफ होती है, तो इसे बिल्कुल भी नजरअंदाज न करें। इससे बचने के लिए आप कुछ आसान तरीके अपना सकते हैं:
नींद पूरी करें: आंखों को आराम देने के लिए अच्छी नींद बहुत जरूरी है।
स्क्रीन टाइम कम करें: सोने से पहले गैजेट्स से दूरी बना लें।
सफाई का ध्यान रखें: अपनी आंखों को साफ रखें और साफ बिस्तर का इस्तेमाल करें।
आर्टिफिशियल टीयर्स: जरूरत महसूस होने पर आंखों की नमी बरकरार रखने के लिए 'आर्टिफिशियल टीयर्स' का इस्तेमाल करें।
भारत में हर चौथी मौत का कारण हार्ट अटैक, 'नॉर्मल हेल्थ रिपोर्ट' के भरोसे रहना पड़ सकता है भारी

युवाओं में हार्ट अटैक के मामले बढ़ रहे हैं। स्टडी में पाया गया कि 80% लोग जांच में लो-रिस्क पाए गए थे, फिर भी उन्हें हार्ट अटैक आया। ...और पढ़ें





युवाओं में तेजी से बढ़ रहे हैं हार्ट अटैक के मामले (Picture Courtesy: Freepik)


 भारत में हार्ट अटैक के खतरे का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और यह अब हर उम्र के लोगों को प्रभावित कर रहा है। देश में हर चार में एक मौत हार्ट अटैक से, युवा सबसे ज्यादा इसकी चपेट में आ रहे हैं।


इस तरह के बढ़ते मामले सार्वजनिक स्वास्थ्य की बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। दिल्ली के जीबी पंत अस्पताल में इसे लेकर हुए अध्ययन में ' सामने आया है कि करीब 80 प्रतिशत ऐसे मरीज जिन्हें पहले मेडिकल जांच में 'लो-रिस्क' माना गया था, वे बाद हार्ट अटैक का शिकार हो गए।




(Picture Courtesy: Freepik)

दिल्ली के जीबी पंत अस्पताल के वरिष्ठ कार्डियोलाजिस्ट डॉ. मोहित दयाल गुप्ता के नेतृत्व में 2023 से 2025 के बीच एकत्रित छह हजार से अधिक मरीजों के डेटा पर आधारित हुआ क्लिनिकल विश्लेषण भारत में हार्ट डिजीज के बदलते पैटर्न को दर्शाता है। हार्ट अटैक का शिकार होने वाले 20- 30 वर्ष के युवाओं की संख्या पांच से 10 प्रतिशत के बीच है।


यह संख्या तेजी से बढ़ रही है, साथ ही इस उम्र में भी अचानक और बिना चेतावनी के हार्ट अटैक के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं। 30 40 वर्ष की उम्र में यह खतरा और बढ़ जाता है, जहां तनाव, अनियमित दिनचर्या, मोटापा और शुरुआती डायबिटीज प्रमुख कारण बनते हैं।

क्यों बढ़ रहा है दिल पर दबाव?

करियर का दबाव, आर्थिक बोझ और नींद का पूरी न होना हृदय पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। धूमपान, वेपिंग और ड्रग्स का सेवन रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाता है और उन्हें संकरा कर देता है। विशेषज्ञ कहते हैं कि कई घंटों तक कुर्सी पर बैठ कर काम करते रहने, जंक फूड खाने, देर रात तक जागने व तनावभरी दिनचर्या ने कोलेस्ट्राल की समस्या को बढ़ा दिया है जो हार्ट अटैक का कारण।


जबकि 40 से 50 वर्ष की आयु में इस तरह के लगभग 25 प्रतिशत मामले सामने आए। 50 से 60 वर्ष का वर्ग अब भी सबसे ज्यादा प्रभावित (30 से 35 प्रतिशत) बना हुआ है। 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में मृत्यु दर सबसे अधिक देखी जाती है।

दिल की बीमारियों से तीन लाख से ज्यादा मौतें

दिल्ली की स्थिति भी चिंताजनक है। सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (सीआरएस) व अन्य सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2024 में दिल और रक्त संचार संबंधी बीमारियों से 34 हजार से अधिक मौतें दर्ज की गईं जो पिछले वर्षों की तुलना में तेज बढ़ोतरी दर्शाती हैं। पिछले दो दशकों में दिल्ली में तीन लाख से ज्यादा लोग दिल से जुड़ी बीमारियों के कारण जान गंवा चुके हैं।


विशेषज्ञ इसके पीछे प्षण, तनावपूर्ण जीवनशैली, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर को प्रमुख कारण मानते हैं। यह भी सामने आया कि पश्चिमी देशों के आधार पर तैयार किए गए रिस्क कैलकुलेटर भारत के लिए पूरी तरह से कारगर नहीं हैं । विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए अलग हार्ट रिस्क आंकलन माडल विकसित करने की जरूरत है।


साथ ही लोगों को 'नार्मल रिपोर्ट' के भरोसे न रहकर नियमित जांच, संतुलित आहार, व्यायाम और तनाव नियंत्रण पर विशेष ध्यान देना चाहिए। जिन लोगों के माता- पिता को दिल की बीमारी रही है, ऐसे बच्चे-वयस्क डाक्टर से सलाह लेकर नियमित रूप से टेस्ट कराएं।
 स्मार्टफोन के दौर में खो गया है फोकस? जानिए कैसे एक हॉबी बदल सकती है आपकी जिंदगी

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'फ्लो स्टेट' में पहुंचने पर लोगों को कुछ और महत्वपूर्ण नहीं लगता, विकर्षण की गतिविधियों में आती है कमी। ...और पढ़ें









लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। हम एक ऐसे वातावरण में जी रहे हैं जिसे "डिस्ट्रैक्शन इकोनमी" कहा गया है। मतलब यह कि एक ऐसा माहौल, जो हर मोड़ पर हमारा ध्यान आकर्षित करने के लिए तैयार किया गया है। इसका परिणाम अक्सर ध्यान में बिखराव, फोकस की कमी और कभी-कभी बढ़ती हुई चिंताओं और विचारों की पुनरावृत्ति होती है।


किसी गतिविधि में पूरी तरह से डूब जाना एक दुर्लभ घटना हो गई है। कल्पना कीजिए कि आप जब कोई इतनी आकर्षक फिल्म देख रहे थे तो अपने फोन को हाथ तक नहीं लगाया। इस अनुभव को "फ्लो" कहा जाता है।

फ्लो एक ऐसी अवस्था है, जिसमें लोग किसी गतिविधि में इतने लिप्त हो जाते हैं कि कुछ और महत्वपूर्ण नहीं लगता। इसका अनुभव इतना आनंददायक होता है कि लोग इसे करने के लिए बड़े खर्च पर भी जारी रखते हैं।


एक शौक के प्रति प्रतिबद्धता और अपने फ्लो को खोजने से न केवल बाहरी शोर (कार्य या सोशल मीडिया विकर्षण) को कम करने में मदद मिल सकती है, बल्कि आपके अपने आंतरिक शोर, जैसे मन की भटकन या पुनरावृत्ति को भी कम कर सकती है।


विकर्षणों की दुनिया में किसी गतिविधि में पूरी तरह से डूब जाना दुर्लभ है, लेकिन यह आपके मस्तिष्क के लिए लाभकारी हो सकता है तंत्रिका विज्ञान के साक्ष्यों की समीक्षाएं दिखाती हैं कि फ्लो स्टेट में होना मस्तिष्क की गतिविधि को दबाकर मन के भटकाव को कम करता है। यह मस्तिष्क के क्षेत्रों का एक सेट है, जो आत्म- संदर्भित प्रोसेसिंग को कवर करता है।

मन का भटकाव

मस्तिष्क सक्रियता में कमी का मतलब है कि ध्यान नेटवर्क की अधिक प्रभावी सक्रियता हो सकती है । शोधकर्ताओं ने दिखाया कि फ्लो की स्थितियों में उद्देश्यपूर्ण मानसिक प्रयास और दृष्टि का ध्यान सबसे अधिक था। फ्लो का मतलब है कि ध्यान इतने प्रभावी ढंग से कार्य में आवंटित किया जाता है कि आत्म-निगरानी और विकर्षण गायब हो जाते हैं।


हालांकि, फ्लो "हाइपरफोकस " के समान नहीं है। वास्तव में, ये एक- दूसरे के साथ नकारात्मक रूप से संबंधित हो सकते हैं। कालेज के 85 छात्रों के एक अध्ययन में, जिनमें ध्यान में कमी के विकार (एडीएचडी) वाले और बिना एडीएचडी वाले छात्र शामिल थे। जिन छात्रों में क्लीनिकल रूप से महत्वपूर्ण एडीएचडी के लक्षण थे, उन्होंने उच्च हाइपरफोकस की रिपोर्ट की, लेकिन कई मानदंडों पर कम फ्लो। मुख्य अंतर नियंत्रण में प्रतीत होता है । फ्लो निर्देशित और इरादतन होता है, जबकि हाइपरफोकस आपके साथ होता है।

फ्लो कैसे खोजें

शौक ( हाबी ) फ्लो स्टेट पाने का एक बेहतरीन तंत्र हैं। खेलों को फ्लो उत्पन्न करने वाली गतिविधि के रूप में व्यापक रूप से शोधित किया गया है। 188 जूनियर टेनिस खिलाड़ियों के एक अध्ययन में, कार्य पर ध्यान और नियंत्रण की भावना फ्लो के दो पहलू थे जो सबसे मजबूत रूप से यह भविष्यवाणी करते थे कि खिलाड़ी ने अपना मैच जीता या हारा। हालांकि, यह केवल जीतने के बारे में नहीं है।


12-16 वर्ष के 413 युवा एथलीटों के एक अध्ययन में पाया गया कि प्रतिभागियों ने प्रयास और सुधार पर ध्यान केंद्रित किया, न कि जीतने पर उन्होंने अधिक फ्लो की रिपोर्ट की।

फ्लो स्टेट में होना दोस्तों के साथ सामाजिक इंटरैक्शन से अधिक संतोष से जुड़ा होना होता है। ये निष्कर्ष अन्य शोधों के साथ मेल खाते हैं, जो दिखाते हैं कि गेमिंग के दौरान फ्लो स्टेट इतना अवशोषित हो सकता है कि यह आपको देर से सोने पर मजबूर कर देता है यह एक नई हाबी उठाने से पहले विचार करने के लिए कुछ है।
सिर्फ आंखों की रोशनी ही नहीं, जानलेवा कैंसर के खिलाफ भी ढाल बनेगा ये 'खास' न्यूट्रिएंट

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शिकागो विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है कि आंखों की रोशनी के लिए जरूरी 'जेक्सैंथिन' अब कैंसर से लड़ने में भी एक मजबूत ढाल ...और पढ़ें






आंखों की सेहत सुधारने वाला 'जेक्सैंथिन' अब करेगा कैंसर का खात्मा? (Image Source: AI-Generated)


जेक्सैंथिन एंटी-ट्यूमर प्रतिरक्षा को मजबूत कर कैंसर से लड़ता है


यह CD8+ टी कोशिकाओं की कैंसर-नाशक क्षमता बढ़ाता है


शिकागो विश्वविद्यालय के शोध ने कैंसर उपचार में नई उम्मीदें जगाई हैं


एएनआई, नई दिल्ली। हम सभी जानते हैं कि हेल्दी डाइट और कुछ खास पोषक तत्व हमारी आंखों की रोशनी के लिए वरदान होते हैं। इन्हीं में से एक प्रमुख कैरोटीनॉयड है- 'जेक्सैंथिन', लेकिन अब वैज्ञानिकों ने इसके बारे में एक बेहद ही चौंकाने वाला खुलासा किया है।


दरअसल, आंखों की सेहत को बढ़ावा देने वाला यह तत्व अब कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से लड़ने में भी एक मजबूत ढाल साबित हो सकता है।



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कैंसर सेल्स को ढूंढकर मारेगी आपकी इम्युनिटी

यह नई और अहम जानकारी शिकागो विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन में सामने आई है। इस महत्वपूर्ण रिसर्च के नतीजे मेडिकल जर्नल 'सेल रिपोर्ट्स मेडिसिन' में प्रकाशित किए गए हैं। इस अध्ययन ने चिकित्सा जगत को एक नई उम्मीद दी है कि कैसे एक सामान्य सा तत्व शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाकर कैंसर को हराने में मदद कर सकता है।

'एंटी-ट्यूमर' इम्युनिटी को लेकर हुआ खुलासा

इस शोध से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता जिंग चेन ने भी इन नतीजों पर खुशी और हैरानी जताई है। उनका कहना है, "हमें यह जानकर बहुत सुखद आश्चर्य हुआ कि जेक्सैंथिन, जिसे हम अब तक मुख्य रूप से आंखों के स्वास्थ्य में इसकी बेहतरीन भूमिका के लिए ही जानते थे, वह असल में शरीर के अंदर एंटी-ट्यूमर प्रतिरक्षा को बढ़ाने का भी काम करता है।"

कैंसर के खिलाफ कैसे काम करता है यह तत्व?

शोधकर्ताओं की टीम ने पाया कि जेक्सैंथिन हमारे शरीर की खास रक्षक कोशिकाओं- 'सीडी8 प्लस टी कोशिकाओं' की काम करने की क्षमता को सीधे तौर पर तेज कर देता है। आपको बता दें कि ये खास प्रतिरक्षा कोशिकाएं ही शरीर में मौजूद कैंसर की खतरनाक कोशिकाओं की पहचान करने और उन्हें नष्ट करने की सबसे अहम जिम्मेदारी निभाती हैं।


अध्ययन में इस पूरी प्रक्रिया को विस्तार से समझाया गया है। दरअसल, असामान्य या कैंसर वाली कोशिकाओं का पता लगाने के लिए ये 'सीडी8 प्लस टी कोशिकाएं' एक विशेष संरचना पर निर्भर करती हैं, जिसे 'टी-कोशिका रिसेप्टर' कहा जाता है।

टी-सेल्स का 'रिसेप्टर कॉम्प्लेक्स' होगा मजबूत

वैज्ञानिकों ने पाया कि जब ये रक्षक टी-कोशिकाएं कैंसर की कोशिकाओं से टकराती हैं, तो जेक्सैंथिन वहां पहुंचकर इस 'रिसेप्टर कॉम्प्लेक्स' के निर्माण को मजबूत और स्थिर करने में मदद करता है। इस मजबूती के कारण कोशिकाओं के अंदर के संकेत काफी तेज हो जाते हैं। नतीजा यह होता है कि टी-कोशिकाएं पहले से ज्यादा सक्रिय हो जाती हैं, साइटोकाइन का उत्पादन बढ़ जाता है और कुल मिलाकर ट्यूमर को नष्ट करने की कोशिकाओं की ताकत में भारी सुधार होता है।
 हेल्दी समझकर रोज खा रहे हैं ग्रेनोला? फायदे की जगह शरीर को हो सकते हैं ये 8 बड़े नुकसान

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हेल्दी समझकर रोज खा रहे हैं ग्रेनोला? फायदे की जगह शरीर को हो सकते हैं ये 8 बड़े नुकसान


ग्रेनोला को कई लोग हेल्दी फूड समझकर रोज सुबह ब्रेकफास्ट में खाते हैं, लेकिन बाजार में मिलने वाला ग्रेनोला सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है। ...और पढ़ें




क्या आप भी रोज ग्रेनोला खाना हेल्दी समझते हैं? (Picture Courtesy: Freepik)


बाजार के ग्रेनोला में उच्च चीनी, वजन बढ़ाए


अधिक कैलोरी से मोटापा और दिल का खतरा


प्रिजर्वेटिव्स लिवर, किडनी पर एक्स्ट्रा दबाव डालते हैं


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आजकल हेल्दी स्नैक के रूप में ग्रेनोला काफी ट्रेंड में है। लोग इसे नाश्ते, स्नैक या कभी-कभी डिनर रिप्लेसमेंट के तौर पर भी खाने लगे हैं। हेल्थ-कॉन्शस लोग इसे एनर्जी और न्यूट्रिशन का अच्छा सोर्स मानते हैं।


लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसे रोज खाना आपके शरीर को नुकसान भी पहुंचा सकता है? जी हां, हेल्दी दिखने वाला यह फूड आपके शरीर को नुकसान पहुंचा सकता है। आइए जानें कैसे।
ग्रेनोला होता क्या है?

ग्रेनोला ओट्स, नट्स, बीज, शहद या शुगर सिरप और सूखे फलों को मिलाकर बेक करके तैयार किया जाता है। इसे योगर्ट, दूध या स्मूदी के साथ खाया जाता है। देखने में यह हेल्दी लगता है और तुरंत एनर्जी भी देता है। लेकिन मार्केट में मिलने वाले अधिकतर ग्रेनोला बार्स और पैकेट्स में हाई शुगर, ऑयल्स और प्रिजर्वेटिव्स मिलाए जाते हैं, जिससे यह हेल्दी से ज्यादा कैलोरी और शुगर लोडेड स्नैक बन जाता है। यही वजह है कि इसे रोज खाना शरीर को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचा सकता है।





(Picture Courtesy: Freepik)
रोज ग्रेनोला खाने से होने वाले नुकसानहाई शुगर कंटेंट- मार्केट में मिलने वाले ग्रेनोला में शुगर की मात्रा बहुत ज्यादा होती है। लगातार इसे खाने से ब्लड शुगर लेवल बढ़ सकता है, जिससे डायबिटीज और मोटापे का खतरा बढ़ता है
कैलोरी ओवरलोड- ग्रेनोला का एक छोटा बाउल ही लगभग 200–300 कैलोरी तक का हो सकता है। रोजाना इसे खाने से वजन तेजी से बढ़ सकता है, खासकर उन लोगों में जो पहले से कम एक्टिव लाइफस्टाइल जीते हैं।
हाई फैट लेवल- इसे टेस्टी बनाने के लिए अक्सर इसमें ऑयल्स और बटर जैसे फैट्स मिलाए जाते हैं। इससे कोलेस्ट्रॉल लेवल बढ़ सकता है और दिल की बीमारियों का खतरा भी।
डाइजेशन प्रॉब्लम- ग्रेनोला में फाइबर की मात्रा ज्यादा होती है। थोड़ी मात्रा में यह डाइजेशन के लिए अच्छा है, लेकिन रोजाना ज्यादा मात्रा में इसे खाने से गैस, ब्लोटिंग और कब्ज की समस्या हो सकती है।
हिडन प्रिजर्वेटिव्स- पैक्ड ग्रेनोला में स्वाद और शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए प्रिजर्वेटिव्स और आर्टिफिशियल फ्लेवर डाले जाते हैं। ये लिवर और किडनी पर एक्स्ट्रा प्रेशर डाल सकते हैं।
ब्लड शुगर स्पाइक- ग्रेनोला जल्दी डाइजेस्ट हो जाता है और ब्लड शुगर लेवल को अचानक बढ़ा देता है। डायबिटिक मरीजों के लिए यह काफी नुकसानदायक साबित हो सकता है।
हाई सोडियम लेवल- कुछ ग्रेनोला प्रॉडक्ट्स में सोडियम भी ज्यादा होता है। रोजाना इसे खाने से ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है और दिल से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं।
एडिक्शन का खतरा- ग्रेनोला का मीठा और क्रंची टेस्ट कई लोगों को इसे बार-बार खाने के लिए प्रेरित करता है। यह ओवरईटिंग की आदत डाल सकता है और हेल्दी डाइट बैलेंस बिगाड़ देता है।