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हड्डियों की मजबूती ही नहीं, पेट की हर तकलीफ का भी 'सुपरहीरो' है विटामिन-D; डॉक्टर का बड़ा खुलासा

हड्डियों की मजबूती ही नहीं, पेट की हर तकलीफ का भी 'सुपरहीरो' है विटामिन-D; डॉक्टर का बड़ा खुलासा

हड्डियों की मजबूती ही नहीं, पेट की हर तकलीफ का भी 'सुपरहीरो' है विटामिन-D; डॉक्टर का बड़ा खुलासा


आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में पेट से जुड़ी बीमारियां बहुत तेजी से बढ़ रही हैं। ...और पढ़ें






लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। इरिटेबल बाउल सिंड्रोम, इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज और क्रोहन डिजीज जैसी समस्याएं, आज के खराब लाइफस्टाइल में काफी आम हो गई हैं। इन बीमारियों के कारण लोगों को अक्सर पेट में तेज दर्द, दस्त, सूजन और पाचन से जुड़ी गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ता है।


हालांकि, हाल ही में हुए शोध एक बहुत ही पॉजिटिव खबर लेकर आए हैं और वह यह है कि एक खास विटामिन आपकी इन सभी तकलीफों को कम करने में एक बड़ी भूमिका निभा सकता है। आइए, PSRI अस्पताल, दिल्ली के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. नृपेन सैकिया से डिटेल में जानते हैं इस बारे में।




(Image Source: Freepik)
सिर्फ हड्डियों के लिए नहीं, इम्युनिटी का भी रक्षक

हम सभी आमतौर पर यही मानते हैं कि 'विटामिन D' का काम सिर्फ हमारी हड्डियों को मजबूत बनाना है, लेकिन इसका फायदा सिर्फ हड्डियों तक ही सीमित नहीं है।

मेडिकल साइंस के अनुसार, यह विटामिन हमारे शरीर के इम्यून सिस्टम को संतुलित रखने में भी बेहद जरूरी है। आंतों से जुड़ी कई गंभीर बीमारियां 'ऑटोइम्यून' होती हैं- यानी एक ऐसी स्थिति जहां शरीर का अपना ही सुरक्षा तंत्र गलती से अपनी स्वस्थ कोशिकाओं पर हमला करने लगता है।


ऐसी स्थिति में विटामिन-डी शरीर की सूजन को कम करने और इम्यून सिस्टम की प्रतिक्रिया को सही दिशा में नियंत्रित करने में बड़ी मदद करता है।
"लीकी गट" से बचाव और आंतों की मजबूती

इसके अलावा, आंतों को सुरक्षित रखने में भी विटामिन D का काम किसी मजबूत दीवार की तरह होता है। यह हमारी आंतों की परत (को ताकत देता है। अगर किसी कारणवश आंतों की यह दीवार कमजोर हो जाए, तो "लीकी गट" नाम की खतरनाक समस्या पैदा हो सकती है।


इस स्थिति में हानिकारक टॉक्सिन्स और खतरनाक बैक्टीरिया आसानी से शरीर के अंदर प्रवेश कर जाते हैं। शरीर में विटामिन D की सही मात्रा इस परत को मजबूत बनाए रखती है और ऐसे जोखिमों को काफी हद तक टाल देती है।




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विटामिन-डी की कमी से बढ़ सकती है IBD की तकलीफ

कई मेडिकल स्टडीज में भी इस बात की पुष्टि हुई है कि जिन लोगों में विटामिन D की कमी पाई जाती है, उनमें IBD जैसी आंतों की बीमारियों के लक्षण कहीं ज्यादा गंभीर और तकलीफदेह होते हैं।


डॉक्टरों ने पाया है कि ऐसे मरीजों को जब विटामिन-डी के सप्लीमेंट दिए जाते हैं, तो उनके लक्षणों में काफी हद तक सुधार देखने को मिलता है। हालांकि, यह समझना भी जरूरी है कि सिर्फ विटामिन-डी ही इन बीमारियों का इकलौता इलाज नहीं है, बल्कि यह आपके संपूर्ण इलाज और रिकवरी की प्रक्रिया को बेहतर बनाने का एक बहुत ही शानदार तरीका है।
अक्सर आंखों में दर्द लेकर जागते हैं आप? जानिए डॉक्टर ने किन 5 कारणों को बताया जिम्मेदार

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सुबह आंखों में दर्द और भारीपन कई लोगों को परेशान करता है। ...और पढ़ें





क्या आप भी सुबह आंखों में दर्द के साथ उठते हैं? (Image Source: AI-Generated)


सुबह आंखों में दर्द के 5 मुख्य कारण जानें


ड्राई आई, नींद की कमी, एलर्जी प्रमुख वजहें


इन्फेक्शन, गलत चश्मा भी दर्द का कारण

 नई दिल्ली। सुबह की शुरुआत अगर ताजगी की बजाय आंखों में भारीपन, चुभन या दर्द के साथ हो, तो पूरा दिन परेशानी में बीतता है। हम में से कई लोग इसे एक मामूली थकान मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यह किसी सीरियस आई प्रॉब्लम का शुरुआती संकेत भी हो सकता है।


ग्वालियर स्थित रतन ज्योति नेत्रालय के संस्थापक, निदेशक और सर्जन डॉ. पुरेन्द्र भसीन के अनुसार, सुबह आंखों में दर्द के पीछे मुख्य रूप से 5 कारण जिम्मेदार हो सकते हैं। सही इलाज के लिए इन कारणों को समझना बेहद जरूरी है। आइए जानते हैं।



(Image Source: AI-Generated)
ड्राई आई

रात में सोते समय हमारी आंखें बंद रहती हैं, जिसके कारण प्राकृतिक आंसुओं का बनना कम हो जाता है। जिन लोगों की आंखों में पहले से ही नमी की कमी होती है, उन्हें सुबह उठने पर जलन और दर्द महसूस होता है। खासकर जो लोग बहुत ज्यादा स्क्रीन का इस्तेमाल करते हैं, उनमें यह समस्या सबसे ज्यादा देखी जाती है।



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नींद की कमी

अगर आप पर्याप्त और गहरी नींद नहीं ले रहे हैं, तो आपके शरीर के साथ-साथ आपकी आंखों को भी पूरा आराम नहीं मिल पाता। देर रात तक मोबाइल या लैपटॉप पर आंखें गड़ाए रखने की आदत आंखों पर एक्स्ट्रा दबाव डालती है। यही कारण है कि सुबह उठने पर आंखों में भयंकर थकान और दर्द होता है।

एलर्जी का असर

कई बार हमारे बिस्तर, तकिए या कंबल में धूल और प्रदूषण के बारीक कण मौजूद होते हैं, जो रात भर हमारी आंखों को नुकसान पहुंचाते हैं। इस एलर्जी के कारण सुबह आंखों में कई समस्याएं हो सकती हैं, जैसे:
आंखों में रेडनेस
तेज खुजली मचना
दर्द होना
आंखों से पानी आना या सूजन महसूस होना
आंखों में इन्फेक्शन

अगर सुबह आपकी आंखें चिपचिपी हो रही हैं और दर्द के साथ सूजन भी है, तो यह कंजक्टिवाइटिस या ब्लेफेराइटिस जैसे इन्फेक्शन का स्पष्ट संकेत हो सकता है। अगर ये लक्षण कई दिनों तक बने रहें, तो बिना देरी किए डॉक्टर से अपनी जांच करवानी चाहिए।

गलत चश्मे का इस्तेमाल या कमजोर नजर

अगर आपकी आंखों की रोशनी कमजोर है और आप या तो चश्मा नहीं पहनते या फिर गलत पावर का चश्मा इस्तेमाल कर रहे हैं, तो आंखों की मांसपेशियों पर लगातार तनाव बना रहता है। यह बढ़ा हुआ तनाव भी सुबह के समय आंखों में दर्द का एक बड़ा कारण बनता है।




(Image Source: AI-Generated)
बचाव के लिए रखें इन बातों का ध्यान

डॉ. भसीन सलाह देते हैं कि अगर यह दर्द कभी-कभार होता है, तो यह चिंता का विषय नहीं है, लेकिन अगर रोज सुबह आंखें खोलने में तकलीफ होती है, तो इसे बिल्कुल भी नजरअंदाज न करें। इससे बचने के लिए आप कुछ आसान तरीके अपना सकते हैं:
नींद पूरी करें: आंखों को आराम देने के लिए अच्छी नींद बहुत जरूरी है।
स्क्रीन टाइम कम करें: सोने से पहले गैजेट्स से दूरी बना लें।
सफाई का ध्यान रखें: अपनी आंखों को साफ रखें और साफ बिस्तर का इस्तेमाल करें।
आर्टिफिशियल टीयर्स: जरूरत महसूस होने पर आंखों की नमी बरकरार रखने के लिए 'आर्टिफिशियल टीयर्स' का इस्तेमाल करें।
भारत में हर चौथी मौत का कारण हार्ट अटैक, 'नॉर्मल हेल्थ रिपोर्ट' के भरोसे रहना पड़ सकता है भारी

युवाओं में हार्ट अटैक के मामले बढ़ रहे हैं। स्टडी में पाया गया कि 80% लोग जांच में लो-रिस्क पाए गए थे, फिर भी उन्हें हार्ट अटैक आया। ...और पढ़ें





युवाओं में तेजी से बढ़ रहे हैं हार्ट अटैक के मामले (Picture Courtesy: Freepik)


 भारत में हार्ट अटैक के खतरे का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और यह अब हर उम्र के लोगों को प्रभावित कर रहा है। देश में हर चार में एक मौत हार्ट अटैक से, युवा सबसे ज्यादा इसकी चपेट में आ रहे हैं।


इस तरह के बढ़ते मामले सार्वजनिक स्वास्थ्य की बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। दिल्ली के जीबी पंत अस्पताल में इसे लेकर हुए अध्ययन में ' सामने आया है कि करीब 80 प्रतिशत ऐसे मरीज जिन्हें पहले मेडिकल जांच में 'लो-रिस्क' माना गया था, वे बाद हार्ट अटैक का शिकार हो गए।




(Picture Courtesy: Freepik)

दिल्ली के जीबी पंत अस्पताल के वरिष्ठ कार्डियोलाजिस्ट डॉ. मोहित दयाल गुप्ता के नेतृत्व में 2023 से 2025 के बीच एकत्रित छह हजार से अधिक मरीजों के डेटा पर आधारित हुआ क्लिनिकल विश्लेषण भारत में हार्ट डिजीज के बदलते पैटर्न को दर्शाता है। हार्ट अटैक का शिकार होने वाले 20- 30 वर्ष के युवाओं की संख्या पांच से 10 प्रतिशत के बीच है।


यह संख्या तेजी से बढ़ रही है, साथ ही इस उम्र में भी अचानक और बिना चेतावनी के हार्ट अटैक के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं। 30 40 वर्ष की उम्र में यह खतरा और बढ़ जाता है, जहां तनाव, अनियमित दिनचर्या, मोटापा और शुरुआती डायबिटीज प्रमुख कारण बनते हैं।

क्यों बढ़ रहा है दिल पर दबाव?

करियर का दबाव, आर्थिक बोझ और नींद का पूरी न होना हृदय पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। धूमपान, वेपिंग और ड्रग्स का सेवन रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाता है और उन्हें संकरा कर देता है। विशेषज्ञ कहते हैं कि कई घंटों तक कुर्सी पर बैठ कर काम करते रहने, जंक फूड खाने, देर रात तक जागने व तनावभरी दिनचर्या ने कोलेस्ट्राल की समस्या को बढ़ा दिया है जो हार्ट अटैक का कारण।


जबकि 40 से 50 वर्ष की आयु में इस तरह के लगभग 25 प्रतिशत मामले सामने आए। 50 से 60 वर्ष का वर्ग अब भी सबसे ज्यादा प्रभावित (30 से 35 प्रतिशत) बना हुआ है। 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में मृत्यु दर सबसे अधिक देखी जाती है।

दिल की बीमारियों से तीन लाख से ज्यादा मौतें

दिल्ली की स्थिति भी चिंताजनक है। सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (सीआरएस) व अन्य सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2024 में दिल और रक्त संचार संबंधी बीमारियों से 34 हजार से अधिक मौतें दर्ज की गईं जो पिछले वर्षों की तुलना में तेज बढ़ोतरी दर्शाती हैं। पिछले दो दशकों में दिल्ली में तीन लाख से ज्यादा लोग दिल से जुड़ी बीमारियों के कारण जान गंवा चुके हैं।


विशेषज्ञ इसके पीछे प्षण, तनावपूर्ण जीवनशैली, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर को प्रमुख कारण मानते हैं। यह भी सामने आया कि पश्चिमी देशों के आधार पर तैयार किए गए रिस्क कैलकुलेटर भारत के लिए पूरी तरह से कारगर नहीं हैं । विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए अलग हार्ट रिस्क आंकलन माडल विकसित करने की जरूरत है।


साथ ही लोगों को 'नार्मल रिपोर्ट' के भरोसे न रहकर नियमित जांच, संतुलित आहार, व्यायाम और तनाव नियंत्रण पर विशेष ध्यान देना चाहिए। जिन लोगों के माता- पिता को दिल की बीमारी रही है, ऐसे बच्चे-वयस्क डाक्टर से सलाह लेकर नियमित रूप से टेस्ट कराएं।
 स्मार्टफोन के दौर में खो गया है फोकस? जानिए कैसे एक हॉबी बदल सकती है आपकी जिंदगी

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'फ्लो स्टेट' में पहुंचने पर लोगों को कुछ और महत्वपूर्ण नहीं लगता, विकर्षण की गतिविधियों में आती है कमी। ...और पढ़ें









लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। हम एक ऐसे वातावरण में जी रहे हैं जिसे "डिस्ट्रैक्शन इकोनमी" कहा गया है। मतलब यह कि एक ऐसा माहौल, जो हर मोड़ पर हमारा ध्यान आकर्षित करने के लिए तैयार किया गया है। इसका परिणाम अक्सर ध्यान में बिखराव, फोकस की कमी और कभी-कभी बढ़ती हुई चिंताओं और विचारों की पुनरावृत्ति होती है।


किसी गतिविधि में पूरी तरह से डूब जाना एक दुर्लभ घटना हो गई है। कल्पना कीजिए कि आप जब कोई इतनी आकर्षक फिल्म देख रहे थे तो अपने फोन को हाथ तक नहीं लगाया। इस अनुभव को "फ्लो" कहा जाता है।

फ्लो एक ऐसी अवस्था है, जिसमें लोग किसी गतिविधि में इतने लिप्त हो जाते हैं कि कुछ और महत्वपूर्ण नहीं लगता। इसका अनुभव इतना आनंददायक होता है कि लोग इसे करने के लिए बड़े खर्च पर भी जारी रखते हैं।


एक शौक के प्रति प्रतिबद्धता और अपने फ्लो को खोजने से न केवल बाहरी शोर (कार्य या सोशल मीडिया विकर्षण) को कम करने में मदद मिल सकती है, बल्कि आपके अपने आंतरिक शोर, जैसे मन की भटकन या पुनरावृत्ति को भी कम कर सकती है।


विकर्षणों की दुनिया में किसी गतिविधि में पूरी तरह से डूब जाना दुर्लभ है, लेकिन यह आपके मस्तिष्क के लिए लाभकारी हो सकता है तंत्रिका विज्ञान के साक्ष्यों की समीक्षाएं दिखाती हैं कि फ्लो स्टेट में होना मस्तिष्क की गतिविधि को दबाकर मन के भटकाव को कम करता है। यह मस्तिष्क के क्षेत्रों का एक सेट है, जो आत्म- संदर्भित प्रोसेसिंग को कवर करता है।

मन का भटकाव

मस्तिष्क सक्रियता में कमी का मतलब है कि ध्यान नेटवर्क की अधिक प्रभावी सक्रियता हो सकती है । शोधकर्ताओं ने दिखाया कि फ्लो की स्थितियों में उद्देश्यपूर्ण मानसिक प्रयास और दृष्टि का ध्यान सबसे अधिक था। फ्लो का मतलब है कि ध्यान इतने प्रभावी ढंग से कार्य में आवंटित किया जाता है कि आत्म-निगरानी और विकर्षण गायब हो जाते हैं।


हालांकि, फ्लो "हाइपरफोकस " के समान नहीं है। वास्तव में, ये एक- दूसरे के साथ नकारात्मक रूप से संबंधित हो सकते हैं। कालेज के 85 छात्रों के एक अध्ययन में, जिनमें ध्यान में कमी के विकार (एडीएचडी) वाले और बिना एडीएचडी वाले छात्र शामिल थे। जिन छात्रों में क्लीनिकल रूप से महत्वपूर्ण एडीएचडी के लक्षण थे, उन्होंने उच्च हाइपरफोकस की रिपोर्ट की, लेकिन कई मानदंडों पर कम फ्लो। मुख्य अंतर नियंत्रण में प्रतीत होता है । फ्लो निर्देशित और इरादतन होता है, जबकि हाइपरफोकस आपके साथ होता है।

फ्लो कैसे खोजें

शौक ( हाबी ) फ्लो स्टेट पाने का एक बेहतरीन तंत्र हैं। खेलों को फ्लो उत्पन्न करने वाली गतिविधि के रूप में व्यापक रूप से शोधित किया गया है। 188 जूनियर टेनिस खिलाड़ियों के एक अध्ययन में, कार्य पर ध्यान और नियंत्रण की भावना फ्लो के दो पहलू थे जो सबसे मजबूत रूप से यह भविष्यवाणी करते थे कि खिलाड़ी ने अपना मैच जीता या हारा। हालांकि, यह केवल जीतने के बारे में नहीं है।


12-16 वर्ष के 413 युवा एथलीटों के एक अध्ययन में पाया गया कि प्रतिभागियों ने प्रयास और सुधार पर ध्यान केंद्रित किया, न कि जीतने पर उन्होंने अधिक फ्लो की रिपोर्ट की।

फ्लो स्टेट में होना दोस्तों के साथ सामाजिक इंटरैक्शन से अधिक संतोष से जुड़ा होना होता है। ये निष्कर्ष अन्य शोधों के साथ मेल खाते हैं, जो दिखाते हैं कि गेमिंग के दौरान फ्लो स्टेट इतना अवशोषित हो सकता है कि यह आपको देर से सोने पर मजबूर कर देता है यह एक नई हाबी उठाने से पहले विचार करने के लिए कुछ है।
सिर्फ आंखों की रोशनी ही नहीं, जानलेवा कैंसर के खिलाफ भी ढाल बनेगा ये 'खास' न्यूट्रिएंट

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शिकागो विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है कि आंखों की रोशनी के लिए जरूरी 'जेक्सैंथिन' अब कैंसर से लड़ने में भी एक मजबूत ढाल ...और पढ़ें






आंखों की सेहत सुधारने वाला 'जेक्सैंथिन' अब करेगा कैंसर का खात्मा? (Image Source: AI-Generated)


जेक्सैंथिन एंटी-ट्यूमर प्रतिरक्षा को मजबूत कर कैंसर से लड़ता है


यह CD8+ टी कोशिकाओं की कैंसर-नाशक क्षमता बढ़ाता है


शिकागो विश्वविद्यालय के शोध ने कैंसर उपचार में नई उम्मीदें जगाई हैं


एएनआई, नई दिल्ली। हम सभी जानते हैं कि हेल्दी डाइट और कुछ खास पोषक तत्व हमारी आंखों की रोशनी के लिए वरदान होते हैं। इन्हीं में से एक प्रमुख कैरोटीनॉयड है- 'जेक्सैंथिन', लेकिन अब वैज्ञानिकों ने इसके बारे में एक बेहद ही चौंकाने वाला खुलासा किया है।


दरअसल, आंखों की सेहत को बढ़ावा देने वाला यह तत्व अब कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से लड़ने में भी एक मजबूत ढाल साबित हो सकता है।



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कैंसर सेल्स को ढूंढकर मारेगी आपकी इम्युनिटी

यह नई और अहम जानकारी शिकागो विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन में सामने आई है। इस महत्वपूर्ण रिसर्च के नतीजे मेडिकल जर्नल 'सेल रिपोर्ट्स मेडिसिन' में प्रकाशित किए गए हैं। इस अध्ययन ने चिकित्सा जगत को एक नई उम्मीद दी है कि कैसे एक सामान्य सा तत्व शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाकर कैंसर को हराने में मदद कर सकता है।

'एंटी-ट्यूमर' इम्युनिटी को लेकर हुआ खुलासा

इस शोध से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता जिंग चेन ने भी इन नतीजों पर खुशी और हैरानी जताई है। उनका कहना है, "हमें यह जानकर बहुत सुखद आश्चर्य हुआ कि जेक्सैंथिन, जिसे हम अब तक मुख्य रूप से आंखों के स्वास्थ्य में इसकी बेहतरीन भूमिका के लिए ही जानते थे, वह असल में शरीर के अंदर एंटी-ट्यूमर प्रतिरक्षा को बढ़ाने का भी काम करता है।"

कैंसर के खिलाफ कैसे काम करता है यह तत्व?

शोधकर्ताओं की टीम ने पाया कि जेक्सैंथिन हमारे शरीर की खास रक्षक कोशिकाओं- 'सीडी8 प्लस टी कोशिकाओं' की काम करने की क्षमता को सीधे तौर पर तेज कर देता है। आपको बता दें कि ये खास प्रतिरक्षा कोशिकाएं ही शरीर में मौजूद कैंसर की खतरनाक कोशिकाओं की पहचान करने और उन्हें नष्ट करने की सबसे अहम जिम्मेदारी निभाती हैं।


अध्ययन में इस पूरी प्रक्रिया को विस्तार से समझाया गया है। दरअसल, असामान्य या कैंसर वाली कोशिकाओं का पता लगाने के लिए ये 'सीडी8 प्लस टी कोशिकाएं' एक विशेष संरचना पर निर्भर करती हैं, जिसे 'टी-कोशिका रिसेप्टर' कहा जाता है।

टी-सेल्स का 'रिसेप्टर कॉम्प्लेक्स' होगा मजबूत

वैज्ञानिकों ने पाया कि जब ये रक्षक टी-कोशिकाएं कैंसर की कोशिकाओं से टकराती हैं, तो जेक्सैंथिन वहां पहुंचकर इस 'रिसेप्टर कॉम्प्लेक्स' के निर्माण को मजबूत और स्थिर करने में मदद करता है। इस मजबूती के कारण कोशिकाओं के अंदर के संकेत काफी तेज हो जाते हैं। नतीजा यह होता है कि टी-कोशिकाएं पहले से ज्यादा सक्रिय हो जाती हैं, साइटोकाइन का उत्पादन बढ़ जाता है और कुल मिलाकर ट्यूमर को नष्ट करने की कोशिकाओं की ताकत में भारी सुधार होता है।
 हेल्दी समझकर रोज खा रहे हैं ग्रेनोला? फायदे की जगह शरीर को हो सकते हैं ये 8 बड़े नुकसान

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हेल्दी समझकर रोज खा रहे हैं ग्रेनोला? फायदे की जगह शरीर को हो सकते हैं ये 8 बड़े नुकसान


ग्रेनोला को कई लोग हेल्दी फूड समझकर रोज सुबह ब्रेकफास्ट में खाते हैं, लेकिन बाजार में मिलने वाला ग्रेनोला सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है। ...और पढ़ें




क्या आप भी रोज ग्रेनोला खाना हेल्दी समझते हैं? (Picture Courtesy: Freepik)


बाजार के ग्रेनोला में उच्च चीनी, वजन बढ़ाए


अधिक कैलोरी से मोटापा और दिल का खतरा


प्रिजर्वेटिव्स लिवर, किडनी पर एक्स्ट्रा दबाव डालते हैं


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आजकल हेल्दी स्नैक के रूप में ग्रेनोला काफी ट्रेंड में है। लोग इसे नाश्ते, स्नैक या कभी-कभी डिनर रिप्लेसमेंट के तौर पर भी खाने लगे हैं। हेल्थ-कॉन्शस लोग इसे एनर्जी और न्यूट्रिशन का अच्छा सोर्स मानते हैं।


लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसे रोज खाना आपके शरीर को नुकसान भी पहुंचा सकता है? जी हां, हेल्दी दिखने वाला यह फूड आपके शरीर को नुकसान पहुंचा सकता है। आइए जानें कैसे।
ग्रेनोला होता क्या है?

ग्रेनोला ओट्स, नट्स, बीज, शहद या शुगर सिरप और सूखे फलों को मिलाकर बेक करके तैयार किया जाता है। इसे योगर्ट, दूध या स्मूदी के साथ खाया जाता है। देखने में यह हेल्दी लगता है और तुरंत एनर्जी भी देता है। लेकिन मार्केट में मिलने वाले अधिकतर ग्रेनोला बार्स और पैकेट्स में हाई शुगर, ऑयल्स और प्रिजर्वेटिव्स मिलाए जाते हैं, जिससे यह हेल्दी से ज्यादा कैलोरी और शुगर लोडेड स्नैक बन जाता है। यही वजह है कि इसे रोज खाना शरीर को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचा सकता है।





(Picture Courtesy: Freepik)
रोज ग्रेनोला खाने से होने वाले नुकसानहाई शुगर कंटेंट- मार्केट में मिलने वाले ग्रेनोला में शुगर की मात्रा बहुत ज्यादा होती है। लगातार इसे खाने से ब्लड शुगर लेवल बढ़ सकता है, जिससे डायबिटीज और मोटापे का खतरा बढ़ता है
कैलोरी ओवरलोड- ग्रेनोला का एक छोटा बाउल ही लगभग 200–300 कैलोरी तक का हो सकता है। रोजाना इसे खाने से वजन तेजी से बढ़ सकता है, खासकर उन लोगों में जो पहले से कम एक्टिव लाइफस्टाइल जीते हैं।
हाई फैट लेवल- इसे टेस्टी बनाने के लिए अक्सर इसमें ऑयल्स और बटर जैसे फैट्स मिलाए जाते हैं। इससे कोलेस्ट्रॉल लेवल बढ़ सकता है और दिल की बीमारियों का खतरा भी।
डाइजेशन प्रॉब्लम- ग्रेनोला में फाइबर की मात्रा ज्यादा होती है। थोड़ी मात्रा में यह डाइजेशन के लिए अच्छा है, लेकिन रोजाना ज्यादा मात्रा में इसे खाने से गैस, ब्लोटिंग और कब्ज की समस्या हो सकती है।
हिडन प्रिजर्वेटिव्स- पैक्ड ग्रेनोला में स्वाद और शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए प्रिजर्वेटिव्स और आर्टिफिशियल फ्लेवर डाले जाते हैं। ये लिवर और किडनी पर एक्स्ट्रा प्रेशर डाल सकते हैं।
ब्लड शुगर स्पाइक- ग्रेनोला जल्दी डाइजेस्ट हो जाता है और ब्लड शुगर लेवल को अचानक बढ़ा देता है। डायबिटिक मरीजों के लिए यह काफी नुकसानदायक साबित हो सकता है।
हाई सोडियम लेवल- कुछ ग्रेनोला प्रॉडक्ट्स में सोडियम भी ज्यादा होता है। रोजाना इसे खाने से ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है और दिल से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं।
एडिक्शन का खतरा- ग्रेनोला का मीठा और क्रंची टेस्ट कई लोगों को इसे बार-बार खाने के लिए प्रेरित करता है। यह ओवरईटिंग की आदत डाल सकता है और हेल्दी डाइट बैलेंस बिगाड़ देता है।
आंखों से बेवजह पानी आने को हल्के में न लें! आंखों को सुरक्षित रखने के लिए आज ही फॉलो करें ये टिप्स

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दुख या खुशी में आंखों में आंसू आते ही हैं। लेकिन आंखों से लगातार आंसू या पानी आना एपिफोरा कहलाता है। परेशानी बढ़ने पर डॉक्टरी सलाह जरूर लें। ...और पढ़ें




लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आंखों में नमी बनाए रखने के लिए कुदरती तौर पर टियर्स या आंसू बनते रहते हैं। कई बार जरूरत से ज्यादा टियर्स बनने की वजह से आपको चीजों को देखने या रोजमर्रा के काम करने में परेशानी हो सकती है। ऐसा होने के कई कारण हो सकते हैं और इससे बचने के लिए छोटी-छोटी सावधानियां बड़ी राहत दिला सकती हैं।

इन वजहों से जरूरत से ज्यादा बहते हैं आंसूएलर्जी
ड्राई आइज
कंजंक्टिवाइटिस या रेड आई
टियर डक्ट का बंद होना
पलकों की बनावट असामान्य होना
आंख के ऊपर फुंसी होना
ऐसे बचे रहें इस परेशानी से

एक्सपायरी डेट का आई-मेकअप न लगाएं: हर तीन से छह महीने में अपना मस्कारा और आई शैडो रिप्लेस कर दें। पुराने या एक्सपायरी डेट वाले आई-मेकअप का इस्तेमाल ना करें और साथ ही अपने मेकअप एप्लीकेटर्स की भी अच्छी तरह सफाई करते रहें। ऐसा ना करने से इंफेक्शन का खतरा बढ़ सकता है या आंखों से पानी जाने की परेशानी और ज्यादा बढ़ सकती है।

एलर्जी के कारणों से दूर रहें

ऐसी चीजों से सतर्क रहें जोकि एलर्जी पैदा करते हों और आंखों से ज्यादा मात्रा में आंसू आने का कारण बनते हों जैसे:धूल-मिट्टी
परागकण
धुआं
आई ब्रेक लेते रहें

लगातार डिजिटल डिवाइस का इस्तेमाल करने से आंखें थक जाती हैं, जिसकी वजह से उनसे पानी आने, ड्राइनेस की समस्या होती है। ऐसे में थोड़ी-थोड़ी देर में अपने डिवाइस से ब्रेक लेना ना भूलें।


आंखों को रगड़ें नहीं

अगर आंखों में आपके बार-बार खुजली हो रही है तो उसे रगड़ने की बजाय आंखों को ल्युब्रिकेट करने वाले आई ड्रॉप का इस्तेमाल करें। ड्राई आंखों को रगड़ने से पानी आने की समस्या और बढ़ जाती है।

डॉक्टर से सलाह लें

अगर छोटी-छोटी सावधानियां बरतने के बावजूद आपकी परेशानी दूर नहीं हो रही तो इन स्थितियों में डॉक्टरी सलाह जरूरी हो जाती है:आंखों से लगातार पानी आना
आंखों में दर्द होना
आंखों का लाल हो जाना
धूप या रोशनी में जाने पर परेशानी महसूस होना
आंखों में सूजन
डिस्चार्ज होना या पलकों पर पपड़ी जमना
किसी से कम नहीं बस अलग है आटिज्म पीड़ित बच्चों की दुनिया, समझ-सहयोग और संवेदना से बदलेगी तस्वीर

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एआई द्वारा जेनरेट की गई ग्राफिक।


आटिज्म बीमारी नहीं, बल्कि एक न्यूरो-विकासात्मक स्थिति है।


शुरुआती पहचान, थेरेपी और सहयोग से बच्चे सामान्य जीवन जीते हैं।


स्क्रीन टाइम सीमित कर सामाजिक संपर्क बढ़ाना बच्चों के लिए आवश्यक।

 पटना। करीब पांच वर्ष का बच्चा, जो न तो आंखें मिलाता है और न ही पुकारने पर तुरंत प्रतिक्रिया देता है। बस अपनी ही दुनिया में गुम, कभी खिलौनों को सजाता है तो कभी एक ही हरकत को बार-बार दोहराता है।


वर्षों तक माता-पिता यह समझ ही नहीं पाते कि उनका बच्चा खामोश या शांतप्रिय नहीं बल्कि आटिज्म की अलग दुनिया में जी रहा है। राजधानी पटना समेत प्रदेश के लाखों परिवार इसी अनुभव से गुजर रहे हैं।

माता-पिता शुरुआत यानी डेढ़ से दो वर्ष में इसकी पहचान कर सकें, इसलिए हर वर्ष 2 अप्रैल को विश्व आटिज्म जागरूकता दिवस मनाया जाता है। अब इसे बीमारी नहीं बल्कि एक अलग न्यूरो-विकासात्मक स्थिति के रूप में देखा जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे बच्चों की सोच, सीखने व प्रतिक्रिया देने का तरीका अलग होने से उन्हें संभालना चुनौतीपूर्ण है लेकिन उम्मीद भी है। जागरूकता, सही इलाज व समाज के सहयोग से ये बच्चे अलग पहचान बना रहे हैं, बस जरूरत उन्हें समझने और स्वीकार करने की है।



स्क्रीन से भाषा विकास हो रहा प्रभावित

आइजीआइएमएस की क्लीनिकल चाइल्ड साइकोलाजिस्ट डॉ. प्रियंका के अनुसार उनकी ओपीडी में हर दिन दो से चार नए आटिज्म स्पेक्ट्रम डिसआर्डर यानी एएसडी पीड़ित बच्चे आते हैं। फालोअप को जोड़े तो इनकी संख्या 6 से आठ हो जाती है।


यह एक बड़ी मानसिक स्वास्थ्य चुनौती की ओर संकेत कर रहा है। प्रदेश में हर सौ में से एक तो देश में 80 में से एक बच्चा एएसडी ग्रसित है। इसके शुरुआती लक्षण 18 से 24 माह दिखने लगते हैं।


जागरूकता की कमी के कारण प्रदेश में जब बच्चे स्कूल जाते हैं तब समस्या का पता चलता है। यदि शुरुआत में पहचान हो जाए और स्पीच, आकुपेशनल व बिहेवियरल थेरेपी के साथ सामाजिक सहयोग मिले तो ऐसे बच्चे सामान्य जीवन जी सकते हैं।


मोबाइल या स्क्रीन में अधिक समय बिताने से छोटे बच्चे समाज से कटते हैं और उनका भाषा विकास प्रभावित होता है। इससे आटिज्म के लक्षण और अधिक गंभीर प्रतीत होते हैं। बच्चों का स्क्रीन टाइम सीमित करने व वास्तविक सामाजिक संपर्क बढ़ाना जरूरी है।

बेटियों में कम नहीं पर होती उनकी अनदेखी

क्लीनिकल साइकोलाजिस्ट सह पटना यूनिवर्सिटी में विजिटिंग फैकल्टी ईशा सिंह के अनुसार आटिज्म स्पेक्ट्रम डिसआर्डर बच्चों में होने वाला एक न्यूरो-डेवलपमेंटल डिसआर्डर है।

इससे उनके व्यवहार, संवाद क्षमता व सामाजिक विकास पर असर पड़ता है। लड़कों में यह समस्या लड़कियों की तुलना में अधिक यानी यदि तीन लड़के तो एक लड़की इससे पीड़ित होती है।

इसका सामाजिक कारण है, अधिसंख्य माता-पिता बेटों को जांच के लिए डाक्टर के पास ले जाते हैं लेकिन बेटियों को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। थेरेपी और जरूरत पड़ने पर दवाओं से इसे काफी हद तक ठीक किया जा सकता है।


जरूरत बच्चों के व्यवहार में बदलाव की अनदेखी के बजाय साइकोलाजिस्ट से परामर्श लेने की है। पटना में थेरेपी सेंटर, स्पेशल स्कूल व प्रशिक्षित विशेषज्ञों की कमी भी एक बड़ी चुनौती है।
क्या आटिज्म व इसका कारण

आटिज्म एक न्यूरो-विकासात्मक विकार है, रोग नहीं। यह बच्चे के सामाजिक व्यवहार, संचार क्षमता व सीखने के तरीके को प्रभावित करता है।

इसे आटिज्म स्पेक्ट्रम डिसआर्डर (एएसडी) भी कहते हैं क्योंकि इसके लक्षण व तीव्रता हर बच्चे में अलग होती है। इसका कोई एक निश्चित कारण नहीं है।

यह मुख्यतः आनुवंशिक और मस्तिष्क के विकास में होने वाले बदलावों से जुड़ा होता है। गर्भावस्था के दौरान कुछ जैविक कारक भी इसकी संभावना को प्रभावित कर सकते हैं।
मुख्य लक्षण व क्या करें

यदि बच्चा आंखों में आंखें डाल कर नहीं देखे, बोलने में देरी, बार-बार एक ही गतिविधि दोहराए, बोलने में देरी या भाषा का असामान्य प्रयोग, आवाज देने पर तुरंत प्रतिक्रिया नहीं दे तो तुरंत जांच कराएं। माता-पिता बच्चों का स्क्रीन टाइम सीमित कर, उनसे बातचीत व खेल का समय बढ़ाएं।
डिलीवरी के बाद हर महिला को करना चाहिए योग, शारीरिक और मानिसक सेहत के लिए है फायदेमंद

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डिलीवरी के बाद हर महिला को करना चाहिए योग, शारीरिक और मानिसक सेहत के लिए है फायदेमंद

डिलीवरी के बाद महिलाओं को होने वाली शारीरिक थकान, कमजोरी और मानसिक चिड़चिड़ापन जैसी समस्याओं के लिए योग थेरेपी बेहद फायदेमंद है। ...और पढ़ें




डिलीवरी के बाद योग थेरेपी: शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए वरदान


योग पेल्विक मसल्स को मजबूत कर पोस्चर सुधारता है


प्राणायाम हार्मोन संतुलित कर चिड़चिड़ापन, थकान घटाता है


नियमित अभ्यास आत्मविश्वास बढ़ाता, मानसिक शांति देता है


ब्रांड डेस्क, नई दिल्ली। बच्चे के जन्म यानी डिलीवरी के बाद अक्सर महिलाओं को शारीरिक थकान, कमजोरी, नींद में कमी के कारण चिड़चिड़ापन, बिना बात का गुस्सा और मांसपेशियों में ढीलेपन की समस्या होती है। अगर महिलाओं की इन समस्याओं का सामाधान तुरंत न किया जाए, तो इससे भविष्य में बीमारियों का खतरा बढ़ता है।


डिलीवरी के बाद इन परेशानियों को दूर करने में योग थेरेपी काफी मददगार साबित होती है। योग गुरु स्वामी रामदेव मानते हैं कि डिलीवरी के बाद महिलाएं योग थेरेपी करें। इससे शरीर की मांसपेशियों को धीरे-धीरे मजबूत मिलती है।

पेल्विक मसल्स को मजबूत बनाती है योग थेरेपी

प्रेग्नेंसी और डिलीवरी के समय महिलाओं की पेल्विक मसल्स काफी कमजोर हो जाती हैं। ऐसे में भुजंगासन, सेतुबंधासन जैसे योगासन पेल्विक मसल्स को एक्टिव करने में मदद करते हैं। इन योगासनों को करने से शरीर का पोस्चर ठीक होता है। साथ ही, कमर और पीठ के दर्द से राहत मिलती है।

डिलीवरी के बाद योग और प्राणायाम जैसे अनुलोम-विलोम और भ्रामरी जैसे प्राणायाम करने से शरीर का हार्मोनल संतुलन बनता है। इससे नर्वस सिस्टम स्थिर होता है और महिलाओं को मानसिक शांति मिलती है। डिलीवरी के बाद योग थेरेपी करने से मूड स्विंग्स चिड़चिड़ापन और बिना कारण आने वाला गुस्सा कम होता है।


योग थेरेपी से मानसिक थकान होता है कम


योग थेरेपी का एक खास पहलू होता है श्वास प्रक्रिया। इस दौरान गहरी और नियंत्रित सांस लेने की प्रक्रिया को बार-बार दोहराया जाता है। इससे शरीर में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ता है, जिससे शरीर को एनर्जी मिलती है और थकान भी दूर होती है। डिलीवरी के बाद 40 से 50 दिनों तक लगातार योग थेरेपी करने से महिलाओं को मानसिक तौर पर शांति मिलती है। श्वास प्रक्रिया से डिलीवरी के बाद कब्ज, गैस और अपच की समस्या को भी दूर करने में मदद मिलती है।

आत्मविश्वास बढ़ाती है योग थेरेपी


कई बार डिलीवरी के बाद महिलाएं अपने शरीर में हुए बदलावों को लेकर असहज महसूस करती हैं। ऐसे में योग थेरेपी करने से महिलाओं को अपने बदले हुए शरीर को स्वीकार करने में मदद मिलती है। डिलीवरी के बाद महिलाएं नियमित योगा अभ्यास करें, तो इससे मन में स्थिरता आती है और आत्मविश्वास बढ़ता है। अगर आपकी भी हाल फिलहाल में डिलीवरी हुई है तो शारीरिक और मानसिक रिकवरी के लिए योग थेरेपी को जरूर अपनाएं। योग थेरेपी शुरुआत में 10 मिनट से शुरू करें और धीरे-धीरे इसका समय 15, 20 और 1 घंटे तक लेकर जाएं।
AC के सामने बैठकर कट रही है गर्मियां? जानिए एयर कंडीशनर के इस्तेमाल से सेहत को होने वाले नुकसान

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गर्मियों में तपती धूप से बचने के लिए दिनभर AC के सामने बैठना आज के समय में आम हो गया है, लेकिन यही आदत मोटापे का कारण बन सकती है। ...और पढ़ें




AC में ज्यादा समय बिताना बढ़ा सकता है मोटापा और स्वास्थ्य जोखिम (Picture Credit- AI Generated)

AC में रहने से शरीर का मेटाबॉलिज्म धीमा होता है


ठंडे माहौल में भूख बढ़ती है, जिससे मोटापा आता है


पसीना न आने से शरीर में टॉक्सिन्स जमा होते हैं


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज के समय में गर्मियों की चिलचिलाती धूप से बचने के लिए घंटों AC के सामने बैठना आम हो गया है। ये बात और है कि ये आरामदायक लगता है, लेकिन आपकी यह आदत आपके शरीर पर चुपके से बुरा असर डाल सकती है।


मोटापा एक ऐसा खतरा है जो बिना आहट के आपके जीवन में प्रवेश कर सकता है। अगर आप भी दिनभर एसी की ठंडी हवा में सुस्त रहते हैं, तो अलर्ट हो जाइए। आईए जानते हैं कि कैसे हमारे शरीर पर असर होता है है

जानिए कैसे बढ़ता है मोटापा
गतिविधियों में भारी गिरावट

जब शरीर आरामदायक ठंडक में रहता है, तो वह एनर्जी खर्च करने के लिए इंस्पायर नहीं होता। पूरे दिन बैठे रहना या लेटे रहना कैलोरी बर्न को बहुत कम कर देता है। नतीजा फैट तेजी से जमा होता है।

नेचुरल टेंपरेचर बैलेंस बिगड़ जाता है

गर्म मौसम में शरीर टेंपरेचर को संतुलित करने के लिए अधिक मेहनत करता है, जिससे मेटाबॉलिज्म एक्टिव रहता है। एसी में रहने से यह प्रक्रिया धीमी हो जाती है, जिससे मेटाबालिज्म दर गिरती है और वजन बढ़ने लगता है।

भूख में अनियंत्रित बढ़ोतरी

ठंडे वातावरण में शरीर को एक्स्ट्रा एनर्जी की जरूरत महसूस होती है। इसका नतीजा है बार-बार भूख लगना और बिना सोचे-समझे जंक फूड या ऑयली फूड्स का सेवन करना, जो मोटापा बढ़ाता है।
पसीने का रुकना और डिटॉक्स न होना

पसीना आना बॉडी का एक नेचुरल डिटॉक्स सिस्टम है। एसी में रहने से पसीना न के बराबर आता है, जिससे टॉक्सिन्स शरीर में जमा होते रहते हैं और वजन बढ़ने के साथ अन्य हेल्थ प्रॉब्लम्स भी हो सकती हैं।

मन और शरीर की निष्क्रियता

ठंडी हवा में दिमाग भी सुस्त पड़ सकता है, जिससे एक्साइटमेंट और ऐक्टिवनेस घटती है। इसका असर मोटिवेशन पर भी पड़ता है, जिससे एक्सरसाइज से दूरी बढ़ जाती है।
कैसे करें बचाव हर 45 मिनट बाद 5 मिनट टहलें या हल्की स्ट्रेचिंग करें।
एसी का तापमान बहुत कम न रखें, 24–26 डिग्री तक सीमित करें।
घर के कामों में खुद को व्यस्त रखें।
ताजे फल, सलाद और पानी का सेवन बढ़ाएं।
हर दिन कम से कम 30 मिनट वर्कआउट को समय दें।
आराम जरूरी है, लेकिन आराम की आदत से पैदा हुआ मोटापा जिंदगी भर का स्ट्रेस बन सकता है।
पैकेटबंद स्नैक्स और कोल्ड ड्रिंक से पुरुषों की फर्टिलिटी पर सीधा असर, कंसीव करने में आ सकती है दिक्कत

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स्टडी में पाया गया कि अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड्स पुरुषों में सबफर्टिलिटी का कारण बन सकते हैं। ...और पढ़ें







खान-पान से प्रजनन क्षमता पर प्रभाव (Picture Courtesy: Freepik)


पुरुषों में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड से सबफर्टिलिटी का खतरा बढ़ा


महिलाओं में भ्रूण के शुरुआती विकास पर नकारात्मक प्रभाव


नीदरलैंड के शोध में आधुनिक खान-पान और फर्टिलिटी का संबंध


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स, जैसे- पैकेट बंद स्नैक्स, कोल्ड ड्रिंक्स और रेडी-टू-ईट मील हमारी थाली का अहम हिस्सा बन चुके हैं।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि स्वाद का यह चस्का केवल मोटापे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पुरुषों की फर्टिलिटी को भी सीधे तौर पर प्रभावित कर रहा है? जी हां, हाल ही में हुए एक शोध ने इस विषय पर चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। आइए जानें क्या कहती है यह स्टडी।

शोध के आंकड़े क्या कहते हैं?

नीदरलैंड की रिसर्चर डॉ. रोमी गैलार्ड के नेतृत्व में एक स्टडी की गई, जिसमें आधुनिक खान-पान और फर्टिलिटी के बीच के संबंधों को गहराई से परखा गया। यह शोध साल 2017 से 2021 के बीच किया गया। इस अध्ययन की खास बात यह थी कि इसमें 831 महिलाओं और 651 पुरुषों को शामिल किया गया, ताकि यह समझा जा सके कि गर्भधारण से पहले माता-पिता की डाइट का आने वाले बच्चे और फर्टिलिटी पर क्या असर पड़ता है

अध्ययन में पाया गया कि औसतन महिलाओं के कुल खान-पान में 22 प्रतिशत हिस्सा अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का था, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा थोड़ा ज्यादा यानी 25 प्रतिशत पाया गया।
पुरुषों के लिए बढ़ता जोखिम

इस रिसर्च के सबसे चिंताजनक परिणाम पुरुषों से जुड़े हुए थे। आंकड़ों से पता चला कि जो पुरुष ज्यादा मात्रा में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खा रहे थे, उनमें सबफर्टिलिटी का जोखिम काफी बढ़ा हुआ पाया गया। सबफर्टिलिटी का मतलब है कि पुरुष की फर्टिलिटी सामान्य से कम हो जाती है, जिसके कारण पार्टनर को गर्भधारण करने में सामान्य से काफी ज्यादा समय लगता है। यानी खराब खान-पान सीधे तौर पर पुरुषों के पिता बनने की 

महिलाओं और भ्रूण के विकास पर प्रभाव

हालांकि, अध्ययन में यह देखा गया कि महिलाओं के अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खाने से गर्भधारण की संभावना पर कोई सीधा नकारात्मक असर नहीं पड़ा, लेकिन इसका प्रभाव होने वाले बच्चे के शुरुआती विकास पर जरूर दिखा। शोध के अनुसार, जो महिलाएं इस तरह का खाना ज्यादा मात्रा में खा रही थीं, उनके भ्रूण का शुरुआती विकास प्रभावित हुआ। खासतौर से योल्क सैक का आकार सामान्य से छोटा पाया गया। बता दें कि योल्क सैक भ्रूण के विकास के लिए बेहद जरूरी होता है, क्योंकि यह शुरुआती चरणों में उसे पोषण देता है।
पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के लिए ज्यादा खतरनाक है टीबी, डॉक्टर ने बताया छीन सकता है मां बनने का सुख

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24 मार्च का दिन हर साल World TB Day के रूप में मनाया जाता है। ...और पढ़ें






लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। अक्सर हम यही मानते हैं कि टीबी सिर्फ फेफड़ों से जुड़ी एक बीमारी है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह महिलाओं के रिप्रोडक्टिव सिस्टम को भी अपना शिकार बना सकती है?

गुरुग्राम स्थित CIFAR की डायरेक्टर और रिप्रोडक्टिव हेल्थ एक्सपर्ट, डॉ. पुनीत राणा अरोड़ा के अनुसार, महिलाओं के लिए टीबी एक गंभीर खतरा बन सकती है, जिसे 'जननांग टीबी' (Genital TB) कहा जाता है। यह समस्या विशेष रूप से उन महिलाओं को अपना शिकार बनाती है जिनकी इम्युनिटी कमजोर होती है।




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महिलाओं के शरीर पर कैसे होता है असर?

जब टीबी का संक्रमण महिलाओं के प्रजनन अंगों तक पहुंचता है, तो यह गर्भाशय, फैलोपियन ट्यूब और अंडाशय को भारी नुकसान पहुंचाता है। इसका सबसे खतरनाक नतीजा बांझपन के रूप में सामने आता है।

दरअसल, टीबी के कारण फैलोपियन ट्यूब में सूजन या ब्लॉकेज आ जाती है। इस रुकावट के चलते महिला के अंडे और पुरुष के शुक्राणु आपस में मिल नहीं पाते हैं। इसके कारण कई और गंभीर परेशानियां जन्म लेती हैं, जैसे:

पीरियड्स का अनियमित होना या पूरी तरह से रुक जाना।
गर्भधारण करने में बहुत अधिक कठिनाई होना।
गर्भ ठहरने के बाद बार-बार गर्भपात हो जाना।
पुरुषों और महिलाओं में टीबी के असर में क्या अंतर है?

डॉ. अरोड़ा बताती हैं कि पुरुषों में टीबी का संक्रमण ज्यादातर फेफड़ों तक ही सीमित रहता है। हालांकि, कुछ मामलों में यह पुरुषों के प्रजनन अंगों- जैसे टेस्टिस और प्रोस्टेट को भी प्रभावित कर सकता है। इससे पुरुषों के स्पर्म काउंट और उनकी क्वालिटी में गिरावट आ सकती है, लेकिन एक बड़ी राहत की बात यह है कि महिलाओं की तुलना में पुरुषों में टीबी के कारण बांझपन का खतरा काफी कम होता है।




(Image Source: AI-Generated)
बीमारी को पहचानने में क्यों होती है देरी?

महिलाओं में इस 'जेनिटल टीबी' की सबसे बड़ी चुनौती इसका छिपकर वार करना है। इसके लक्षण बहुत ही सामान्य और हल्के होते हैं, जैसे:हल्का पेट दर्द रहना
बेवजह कमजोरी महसूस होना
पीरियड्स साइकिल में बदलाव आना

अक्सर महिलाएं इन लक्षणों को आम बात समझकर नजरअंदाज कर देती हैं, और यही कारण है कि इस गंभीर बीमारी का पता बहुत देर से चलता है।

सही समय पर इलाज है बचाव

टीबी से घबराने की नहीं, बल्कि सतर्क रहने की जरूरत है। अगर सही समय पर इसकी जांच हो जाए और सही इलाज मिले, तो टीबी को पूरी तरह से ठीक किया जा सकता है। महिलाओं को यह खास ध्यान रखना चाहिए कि यदि उन्हें लंबे समय तक गर्भधारण करने में परेशानी हो रही हो या उनके पीरियड्स में लगातार बदलाव दिख रहा हो, तो वे बिना देरी किए डॉक्टर से सलाह जरूर लें।
दांतों में दर्द से लेकर मसूड़ों की सूजन तक, ये 9 लक्षण चीख-चीख कर कह रहे हैं- 'डेंटिस्ट की जरूरत है'

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आमतौर पर हम दांतों की छोटी-मोटी समस्याओं को टाल देते हैं और डॉक्टर के पास तभी जाते हैं जब दर्द बर्दाश्त के बाहर हो जाता है। ...और पढ़ें





अगर आपके साथ भी हो रहा है ऐसा, तो डेंटिस्ट के पास भागने में ही भलाई है (Image Source: AI-Generated)


मुंह पूरे शरीर की सेहत का आईना होता है


9 लक्षण दिखें तो तुरंत डेंटिस्ट से मिलें


तंबाकू, शराब छोड़ें, सही खानपान अपनाएं


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज 20 मार्च को दुनियाभर में World Oral Health Day 2026 मनाया जा रहा है। क्या आप जानते हैं कि हमारा मुंह हमारे पूरे शरीर की सेहत का 'आईना' होता है?

मैक्स मल्टी स्पेशलिटी सेंटर, नोएडा के निदेशक और एचओडी (मैक्सिलोफेशियल सर्जरी और इंप्लांटोलॉजी) डॉ. केशव नैथानी के अनुसार, कई बार शरीर की गंभीर बीमारियों के लक्षण सबसे पहले हमारे मुंह में ही दिखाई देते हैं।

दिल की बीमारी, कैंसर, सांस की तकलीफ और डायबिटीज जैसी गंभीर बीमारियों और दांतों की समस्याओं के पीछे अक्सर एक जैसे ही कारण होते हैं। इनमें तंबाकू का सेवन, शराब पीना और बहुत ज्यादा मीठा खाना शामिल है। अगर इन शुरुआती समस्याओं का सही समय पर इलाज न किया जाए, तो ये न सिर्फ दांतों को बल्कि आपके पूरे शरीर को भारी नुकसान पहुंचा सकती हैं।







(Image Source: AI-Generated)
9 लक्षण दिखते ही जाएं डेंटिस्ट के पास (Dental Health Warning Signs)

अगर आपको अपने मुंह या दांतों में नीचे दी गई कोई भी समस्या महसूस हो, तो तुरंत डेंटिस्ट से संपर्क करना चाहिए:मुंह में छाले या न भरने वाले घाव: अगर आपके मुंह में कोई लाल या सफेद निशान या छाला है जो दो हफ्ते से ज्यादा समय से ठीक नहीं हो रहा है, तो इसे हल्के में न लें। यह किसी गहरे इन्फेक्शन या ओरल कैंसर का संकेत हो सकता है।
लगातार सूजन या गांठ: मसूड़ों, जबड़े या गले के हिस्से में सूजन आना 'एब्सेस' का लक्षण हो सकता है। अगर इसका इलाज नहीं हुआ, तो यह इन्फेक्शन खून या आस-पास के हिस्सों में फैल सकता है।
पक्के दांतों का हिलना: वयस्कों के दांत हिलने नहीं चाहिए। अगर ऐसा हो रहा है, तो यह मसूड़ों की गंभीर बीमारी, किसी चोट या ऑस्टियोपोरोसिस का इशारा हो सकता है।
मसूड़ों से खून आना: खाना खाते समय या ब्रश करते वक्त मसूड़ों से खून आना मसूड़ों की बीमारी (जिंजिवाइटिस या पेरियोडोंटाइटिस) का सबसे आम लक्षण है, जिस पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है।
दांतों में झनझनाहट: ज्यादा ठंडा, गरम या मीठा खाने पर दांतों में तेज झनझनाहट होना यह बताता है कि दांतों की ऊपरी परत घिस गई है, दांतों में कैविटी है या दांत क्रैक हो गए हैं।
लगातार दांतों में दर्द: अगर दांतों में लगातार दर्द बना रहता है, तो इसका मतलब है कि दांतों में सड़न हो चुकी है और उसे इलाज की सख्त जरूरत है।
सांसों की बदबू और मुंह का खराब स्वाद: अगर आपके मुंह से लगातार बदबू आती है या स्वाद अजीब रहता है, तो यह मसूड़ों की बीमारी, इन्फेक्शन या कैविटी के कारण हो सकता है।
जबड़े में दर्द या आवाज आना: जबड़ा हिलाते समय दर्द होना, परेशानी महसूस होना या 'कट-कट' की आवाज आना टीएमजे डिसऑर्डर का संकेत हो सकता है।
मुंह का हमेशा सूखना: लंबे समय तक मुंह सूखने की वजह से मसूड़ों की बीमारी और कैविटी का खतरा बहुत बढ़ जाता है। यह किसी दवाई के साइड इफेक्ट, डिहाइड्रेशन या किसी अन्य बीमारी के कारण हो सकता है।
ओरल हेल्थ को बेहतरीन बनाए रखने के उपाय

ओरल हेल्थ से जुड़ी समस्याओं से बचना बहुत आसान है:
सही खानपान: अपनी डाइट में चीनी कम करें। ताजे फल और सब्जियां ज्यादा खाएं और दिन भर पर्याप्त मात्रा में पानी पीते रहें।
तंबाकू से दूरी: किसी भी तरह के तंबाकू या सुपारी चबाने की आदत को पूरी तरह छोड़ दें।
शराब से परहेज: शराब से दूरी बनाएं।
सुरक्षा का ध्यान: साइकिल चलाते समय या खेलकूद के दौरान चेहरे और दांतों को चोट से बचाने के लिए माउथगार्ड या हेलमेट जैसे सुरक्षा उपकरणों का इस्तेमाल करें।
ब्रश करने का सही तरीका: दांतों को सड़न से बचाने के लिए फ्लोराइड बहुत जरूरी है। इसलिए दिन में दो बार फ्लोराइड वाले टूथपेस्ट से ब्रश जरूर करें।
 डाइटिंग में पास्ता छोड़ रहे हैं? रुकिए! डॉक्टर ने बताया वजन बढ़ने का असली कारण

डाइटिंग में पास्ता छोड़ रहे हैं? रुकिए! डॉक्टर ने बताया वजन बढ़ने का असली कारण

डाइटिंग में पास्ता छोड़ रहे हैं? रुकिए! डॉक्टर ने बताया वजन बढ़ने का असली कारण

कई लोग मानते हैं कि पास्ता खाने से वजन बढ़ता है, लेकिन असल में पास्ता खुद नहीं, बल्कि उसमें डाली जाने वाली चीजें वजन बढ़ाती हैं। ...और पढ़ें





डाइटिंग में पास्ता छोड़ना गलत! जानें वजन बढ़ने का असली सच (Picture Credit- AI Generated)

पास्ता खुद नहीं, उसमें डलने वाली चीजें वजन बढ़ाती हैं


होलव्हीट पास्ता फाइबर युक्त, पाचन और शुगर नियंत्रित करता है


सही सामग्री, मात्रा और ग्लूटेन-फ्री विकल्प चुनें


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। पास्ता कई लोगों का पसंदीदा फूड होता है। लोग अक्सर अपनी पसंद के मुताबिक इन्हें खाते हैं, लेकिन अक्सर इसे खाने के बाद गिल्ट भी करते हैं। कई लोगों का ऐसा मानना है कि पास्ता खाने से वजन बढ़ता और इसलिए कई लोग इसे खाने से कतराते हैं।


क्या आप भी उन लोगों में से हैं, जिन्हें है कि एक प्लेट पास्ता खाना मतलब सीधा वजन बढ़ाना है? कई समय से पास्ता को 'डाइटिंग का सबसे बड़ा दुश्मन' माना जाता रहा है। लोग सोचते हैं कि यह सिर्फ स्टार्च और कार्बोहाइड्रेट का मिश्रण है, जो पेट फुलाता है और सुस्ती लाता है। लेकिन सच वो नहीं, जो आप मानते आए हैं। सच इससे काफी अलग है, जिसके बारे में मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, नोएडा में क्लिनिकल न्यूट्रिशन की हेड डॉ. करुणा चतुर्वेदी बता रही हैं।
डॉक्टर बताती हैं कि अगर इसे सही तरीके और सही चीजों के साथ खाया जाए, तो यह आपकी सेहतमंद डाइट और वजन कम करने के सफर का एक शानदार हिस्सा बन सकता है। आइए, पास्ता से जुड़े ऐसे ही कुछ मिथकों को तोड़ते हैं और इसका असली सच जानते हैं:-

क्या पास्ता सच में सिर्फ 'एम्पटी कैलोरी' है?

डॉक्टर बताती हैं कि पास्ता मुख्य रूप से कार्बोहाइड्रेट है, जो हमारे शरीर और दिमाग के लिए एनर्जी का सबसे बड़ा सोर्स है। यही वजह है कि एथलीट इसे इतना पसंद करते हैं।


इसमें सिर्फ कार्ब्स नहीं होते, बल्कि इसमें बी-विटामिन्स (जैसे थायमिन और फोलेट) और आयरन भी होता है। अगर आप होलव्हीट (साबुत अनाज) पास्ता चुनते हैं, तो आपको ढेर सारा फाइबर, मैग्नीशियम और एंटीऑक्सीडेंट्स भी मिलते हैं।
क्या पास्ता खाने से वजन बढ़ता है?

इस सवाल का जवाब देते हुए डॉक्टर ने बताया कि पास्ता आपको मोटा नहीं करता, बल्कि उसमें डलने वाली चीजें करती हैं! सादा सूखा पास्ता असल में लो-फैट होता है।वजन बढ़ाने वाले असली विलेन: जब आप पास्ता में ढेर सारा चीज (Cheese), बटर, हेवी क्रीम सॉस और प्रोसेस्ड मीट मिलाते हैं, तो उसकी कैलोरी बहुत ज्यादा बढ़ जाती है।
हेल्दी तरीका: पास्ता को टमाटर की सॉस, खूब सारी हरी सब्जियों, ऑलिव ऑयल और गुड प्रोटीन (जैसे चिकन, दालें या मछली) के साथ बनाएं। यह आपका पेट भी भरेगा और वजन भी नहीं बढ़ाएगा।
मात्रा का ध्यान रखें: आप कितना खा रहे हैं, इस बात का ध्यान रखना भी बहुत जरूरी है! एक वयस्क के लिए 75 ग्राम कच्चा पास्ता (जो पकने के बाद 180-200 ग्राम हो जाता है) एकदम सही है। इससे ज्यादा इसे खाना हानिकारक हो सकता है।
सफेद पास्ता बनाम होलव्हीट पास्ता: कौन-सा बेहतर है?सफेद पास्ता: इसे रिफाइंड गेहूं से बनाया जाता है, जिसमें से फाइबर वाला बाहरी हिस्सा निकाल दिया जाता है।
होलव्हीट पास्ता: यह पूरे अनाज से बनता है। सफेद पास्ता के मुकाबले इसमें फाइबर लगभग दोगुना (6 से 9 ग्राम) होता है। यह आपके पाचन को धीमा करता है, शुगर लेवल को कंट्रोल रखता है और आपको लंबे समय तक भूख नहीं लगने देता।
पास्ता खाने के बाद पेट क्यों फूलता है या सुस्ती क्यों आती है?

अगर आपको पास्ता खाने के बाद गैस या पेट फूलने की समस्या होती है, तो इसके पीछे दो कारण हो सकते हैं:
ग्लूटेन या FODMAPs: कुछ लोगों को गेहूं के ग्लूटेन या उसमें मौजूद खास तरह के कार्ब्स (FODMAPs) से एलर्जी होती है, जिसे पचाना आंतों के लिए मुश्किल होता है।
सुस्ती का कारण: अगर आप रिफाइंड सफेद पास्ता बहुत ज्यादा मात्रा में खा लेते हैं, तो ब्लड शुगर तेजी से बढ़ता और गिरता है, जिससे नींद आने लगती है।
अगर गेहूं से एलर्जी है, तो क्या पास्ता नहीं खा सकते?

आजकल बाजार में ग्लूटेन-फ्री (Gluten-free) पास्ता के बेहतरीन विकल्प मौजूद हैं:
दालों वाला पास्ता: यह पास्ता छोले, मसूर या मटर से बनता है। इनमें गेहूं वाले पास्ता से भी ज्यादा प्रोटीन और फाइबर होता है।
चावल या क्विनोआ पास्ता: इनका स्वाद और टेक्सचर एकदम रेगुलर पास्ता जैसा होता है और ये पचने में बहुत आसान होते हैं।
वैज्ञानिकों ने ढूंढ निकाला दवाओं को असरदार बनाने का 'सीक्रेट' तरीका, कैंसर के इलाज में मिलेगी मदद

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वैज्ञानिकों ने 'ट्राइसल्फाइड मेटाथेसिस प्रतिक्रिया' नामक एक नई रासायनिक प्रक्रिया खोजी है। ...और पढ़ें





वैज्ञानिकों ने खोजा वो 'सीक्रेट बॉन्ड' जिससे मिनटों में बनेंगी असरदार दवाएं (Image Source: Freepik)


नई 'ट्राइसल्फाइड मेटाथेसिस प्रतिक्रिया' की दुर्लभ वैज्ञानिक खोज


बिना बाहरी गर्मी, कमरे के तापमान पर सेकंडों में प्रतिक्रिया


कैंसर दवाओं, बायोटेक्नोलॉजी, रीसायकल प्लास्टिक में क्रांतिकारी उपयोग


प्रेट्र, नई दिल्ली। क्या आपने कभी सोचा है कि बिना किसी बाहरी गर्मी, रोशनी या केमिकल के कोई रासायनिक प्रतिक्रिया अपने आप सेकंडों में पूरी हो सकती है? वैज्ञानिकों ने एक ऐसी ही अद्भुत और दुर्लभ खोज की है। इस नई खोज ने दवा निर्माण, प्रोटीन विज्ञान और बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में विकास के नए दरवाजे खोल दिए हैं। आइए, इस अहम वैज्ञानिक खोज को डिटेल में समझते हैं।




(Image Source: Freepik)
क्या है यह नई रिसर्च?

शोधकर्ताओं ने एक पूरी तरह से नई रासायनिक प्रक्रिया की खोज की है, जिसे 'ट्राइसल्फाइड मेटाथेसिस प्रतिक्रिया' नाम दिया गया है। इसके बारे में मशहूर विज्ञान पत्रिका 'नेचर केमिस्ट्री' में प्रकाशित किया गया है।

इस प्रतिक्रिया की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह सामान्य कमरे के तापमान पर, बिना किसी बाहरी एजेंट या उत्तेजना (जैसे गर्मी या रोशनी) के अपने आप काम करती है। यह प्रतिक्रिया कुछ ही सेकंडों में पूरी हो जाती है और इसके परिणाम बेहद साफ, सटीक और कुशल होते हैं।
सल्फर-सल्फर बांड्स का खेल

इस पूरी खोज के केंद्र में 'सल्फर-सल्फर बांड' हैं। ये बांड पेप्टाइड्स, प्रोटीन, दवा के अणुओं और वल्कनाइज्ड रबर जैसे पॉलिमर्स में मौजूद होते हैं। बता दें, ये प्रोटीन को उसकी संरचनात्मक मजबूती और स्थिरता देने के लिए बहुत जरूरी होते हैं।

अब तक, बिना किसी बाहरी रसायन या गर्मी के इन बांड्स को अपनी मर्जी से बनाना या तोड़ना बहुत मुश्किल माना जाता था, लेकिन यह नई प्रतिक्रिया इसे स्वचालित रूप से कर सकती है।



(Image Source: Freepik)
कैसे हुई यह खोज?

इस अनोखी खोज की शुरुआत ऑस्ट्रेलिया के फ्लिंडर्स विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जस्टिन चाल्कर और यूके के लिवरपूल विश्वविद्यालय के उनके सहयोगी टॉम हैसेल के काम से हुई।

उन्होंने शुरुआत में कुछ खास सॉल्वेंट्स में S-S बांड्स के अजीब और हैरान करने वाले व्यवहार पर ध्यान दिया।

इसके बाद, उन्होंने एक मॉडल तैयार किया जो यह समझाता है कि ये बांड कैसे टूटते हैं, कैसे फिर से बनते हैं और यह हमारे लिए कैसे उपयोगी हो सकता है।
भविष्य के लिए इसके शानदार उपयोग

फ्लिंडर्स विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने इस नई प्रतिक्रिया के कई बेहतरीन फायदे बताए हैं, जिनकी मदद से कई क्षेत्रों में क्रांति आ सकती है:कैंसर की दवाओं में सुधार: चाल्कर लैब के शोधकर्ता हर्षल पटेल के अनुसार, इस प्रतिक्रिया का सफलतापूर्वक इस्तेमाल कैंसर रोधी दवाओं और दवाइयों की खोज से जुड़े केमिकल को संशोधित करने के लिए किया गया है।
रीसायकल होने वाला प्लास्टिक: इस तकनीक से ऐसे नए और बेहतरीन प्लास्टिक बनाए जा सकते हैं जिन्हें आसानी से आकार दिया जा सकता है, इस्तेमाल किया जा सकता है और जरूरत पड़ने पर रीसायकल करने के लिए तोड़ा जा सकता है।
दवा और विज्ञान में तेज विकास: प्राकृतिक उत्पादों और दवाओं के अणुओं को बदलने में यह बेहद काम आ रही है। इसके उच्च प्रतिक्रिया दर की वजह से चिकित्सा से जुड़े यौगिकों को तेजी से तैयार किया जा सकता है।

फ्लिंडर्स विश्वविद्यालय के वरिष्ठ लेखक प्रोफेसर जस्टिन चाल्कर के शब्दों में कहें तो, किसी पूरी तरह से नई प्रतिक्रिया की खोज होना अपने आप में बहुत दुर्लभ है। और यह उससे भी ज्यादा दुर्लभ है कि एक ही खोज इतने सारे अलग-अलग क्षेत्रों में उपयोगी साबित हो। शोधकर्ताओं की टीम इस बात को लेकर बेहद उत्साहित है कि आने वाले समय में इस रसायन विज्ञान को उन तरीकों से भी इस्तेमाल किया जाएगा, जिनकी अभी हमने कल्पना भी नहीं की है।
भारत में भरपूर धूप, फिर भी लोगों में विटामिन-डी की कमी क्यों? जानिए इसके चौंकाने वाले कारण

भारत में भरपूर धूप, फिर भी लोगों में विटामिन-डी की कमी क्यों? जानिए इसके चौंकाने वाले कारण

भारत में भरपूर धूप, फिर भी लोगों में विटामिन-डी की कमी क्यों? जानिए इसके चौंकाने वाले कारण


भारत जैसे देश में धूप की कभी कमी नहीं होती, लेकिन फिर भी ज्यादातर भारतीयों में विटामिन-डी की कमी देखने को मिलती है। ...और पढ़ें







लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। भारत एक ऐसा देश है जहां साल के ज्यादातर महीनों में सूरज की भरपूर रोशनी रहती है। इसके बावजूद, ज्यादातर भारतीयों में विटामिन-डी की कमी देखने को मिलती है। यह चौंकाने वाला जरूरी है, लेकिन सच है।


इसलिए यह सवाल करना जरूरी है कि ऐसा क्यों है? जिस देश में धूप की कोई कमी नहीं है, वहां लोगों में विटामिन-डी की कमी क्यों पाई जा रही है। आइए जानें इसके पीछे छिपे कारणों के बारे में।
भारतीयों में विटामिन-डी की कमी के कारण



(AI Generated Image)मेलानिन- भारतीयों की त्वचा का रंग प्राकृतिक रूप से गेहुआं या गहरा होता है। हमारी त्वचा में मेलानिन नाम का पिगमेंट ज्यादा मात्रा में होता है। मेलानिन सूरज की अल्ट्रावायलेट किरणों के खिलाफ एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है, जो त्वचा को जलने से तो बचाता है, लेकिन विटामिन-डी के निर्माण की प्रक्रिया को धीमा कर देता है। गोरी त्वचा की तुलना में गहरी त्वचा को उतना ही विटामिन-डी बनाने के लिए धूप में ज्यादा समय बिताना पड़ता है।
बदलती लाइफस्टाइल- आज की ज्यादातर आबादी घर के अंदर रहने लगी है। सुबह 9 से शाम 6 की डेस्क जॉब, बंद दफ्तर और एसी के कमरों ने हमें सूरज से दूर कर दिया है। शहरी इलाकों में ऊंची इमारतों के कारण घरों तक सीधी धूप नहीं पहुंच पाती।
प्रदूषण- महानगरों में बढ़ता वायु प्रदूषण भी एक बड़ा कारण है। हवा में मौजूद धूल के कण और धुएं के कारण सूरज की अल्ट्रावायलेट किरणों हम तक पहुंच नहीं पाती हैं, जिसके कारण विटामिन-डी बनाने की प्रक्रिया रुक जाती है।
खान-पान में बदलाव- खान-पान में विटामिन-डी के नेचुरल सोर्स बहुत सीमित हैं, जैसे- फैटी फिश, अंडे की जर्दी और डेयरी प्रोडक्ट्स। भारत की एक बड़ी आबादी शाकाहारी है, जिससे खाने के जरिए इस विटामिन की पूर्ति करना मुश्किल हो जाता है।
विटामिन-डी की कमी के लक्षण हड्डियों और जोड़ों में लगातार दर्द रहना
हर वक्त थकान और कमजोरी महसूस होना
मांसपेशियों में खिंचाव
डिप्रेशन या चिड़चिड़ापन
बार-बार बीमार पड़ना

क्या है इसका समाधान?धूप का सही समय- सुबह 10 बजे से दोपहर 3 बजे के बीच कम से कम 15-20 मिनट धूप में बिताएं। इस समय UVB किरणें सबसे ज्यादा प्रभावी होती हैं।
खान-पान में बदलाव- अपने खाने में मशरूम, फोर्टिफाइड दूध, दही और पनीर शामिल करें।
जांच और सप्लीमेंट- अगर आप लगातार थकान महसूस करते हैं, तो एक बार ब्लड टेस्ट जरूर करवाएं। डॉक्टर की सलाह पर विटामिन-डी के सप्लीमेंट्स लेना भी कमी दूर करने का असरदार तरीका है।
किडनी डिजीज को साइलेंट किलर क्यों कहा जाता है? डॉक्टर ने बताए किन लक्षणों से रहना चाहिए सावधान

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किडनी डिजीज को साइलेंट किलर क्यों कहा जाता है? डॉक्टर ने बताए किन लक्षणों से रहना चाहिए सावधान


किडनी डिजीज का शुरुआती स्टेज में आसानी से पता नहीं लगता। इसलिए इसे साइलेंट किलर भी कहा जाता है। ...और पढ़ें






किडनी डिजीज के लक्षणों पर दें ध्यान (Picture Courtesy: Freepik)

किडनी रोग को 'साइलेंट किलर' कहा जाता है


शुरुआती लक्षण अक्सर अनदेखे रह जाते हैं


नियमित जांच और जागरूकता बचाव का उपाय है


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। किडनी हमारे शरीर में वेस्ट प्रोडक्ट्स को बाहर निकालने वाले फिल्टर की तरह काम करती है। इसलिए इसका हेल्दी होना पूरी सेहत के लिए जरूरी है, लेकिन क्या आप जानते हैं किडनी डिजीज को साइलेंट किलर कहा जाता है।


इसके पीछे की वजह यह है कि किडनी की बीमारियों अक्सर तब तक पकड़ में नहीं आती, जब तक वे गंभीर रूप न ले लें। लेकिन ऐसा क्यों है? इस बारे में जानने के लिए हमनें डॉ. ऋितेष शर्मा (चेयरमैन, नेफ्रोलॉजी एंड किडनी ट्रांसप्लांट, यथार्थ सुपर स्पेशेलिटी हॉस्पिटल, फरीदाबाद) से यह सवाल किया। आइए जानें इस बारे में वे क्या बताते हैं।


डॉ. शर्मा बताते हैं कि किडनी हमारे शरीर में कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाती है। इसका मुख्य काम शरीर से गंदगी और फालतू फ्लूएड को बाहर निकालना है। इसके अलावा, यह ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने, शरीर में फ्लूएड बैलेंस बनाए रखने और इलेक्ट्रोलाइट्स के स्तर को रेगुलेट करने में मदद करती है।

बीमारी का पता क्यों नहीं चलता?

किडनी की बीमारी बहुत धीरे-धीरे बढ़ती है। हमारे शरीर की बनावट ऐसी है कि किडनी की काम करने की क्षमता कम होने के बावजूद, शरीर काफी लंबे समय तक सामान्य रूप से काम करता रहता है। यही वजह है कि इसके शुरुआती लक्षणों को पहचानना बहुत मुश्किल होता है।

शुरुआती लक्षणों को न करें नजरअंदाज

शुरुआती चरणों में इसके लक्षण बहुत मामूली होते हैं,जैसे- थकान महसूस होना, पैरों में हल्की सूजन, पेशाब की आदतों में बदलाव या भूख की कमी। अक्सर लोग इन संकेतों को बढ़ती उम्र, तनाव या खराब जीवनशैली मानकर अनदेखा कर देते हैं। इस लापरवाही के कारण लोग कई सालों तक बिना इलाज के ही इस बीमारी के साथ जीते रहते हैं।




(AI Generated Image)
जांच की कमी और दूसरे कारण

किडनी की बीमारी बढ़ने का एक बड़ा कारण नियमित जांच न कराना है। लोग अक्सर डॉक्टर के पास तभी जाते हैं जब उन्हें डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्या होती है, जो किडनी खराब होने के मुख्य कारण हैं। नॉर्मल रूटीन चेकअप में किडनी फंक्शन टेस्ट को आमतौर पर शामिल नहीं किया जाता, जिससे शुरुआती पहचान मुश्किल हो जाती है।

बचाव ही सबसे अच्छा समाधान है

किडनी को सुरक्षित रखने के लिए जागरूकता बहुत जरूरी है। खासतौर से उन लोगों को डॉक्टर से नियमित संपर्क में रहना चाहिए जिन्हें किडनी की बीमारी का खतरा ज्यादा है। समय पर पहचान होने से बीमारी को बढ़ने से रोका जा सकता है और किडनी को खराब होने से बचाया जा सकता है।


साथ ही, स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर, नियमित रूप से किडनी फंक्शन टेस्ट करवा कर और जरूरत पड़ने पर तुरंत मेडिकल हेल्प लेकर आप गंभीर समस्याओं से बच सकते हैं।
 मजबूत हेल्थ इंफ्रा के साथ आसान और सस्ता इलाज उपलब्ध कराने पर जोर, आयुष को मिलेगा बढ़ावा

मजबूत हेल्थ इंफ्रा के साथ आसान और सस्ता इलाज उपलब्ध कराने पर जोर, आयुष को मिलेगा बढ़ावा

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केंद्रीय बजट 2026-27 में भारत के स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने पर जोर दिया गया है। स्वास्थ्य क्षेत्र के बजट में 10% की वृद्धि हुई, आयुष्मान ...और पढ़ें


स्वास्थ्य क्षेत्र के बजट में 10% की वृद्धि हुई


नई दिल्ली, जागरण प्राइम । देश में बेहतर हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास सरकार की प्राथमिकता है। बजट में भी इसकी झलक साफ तौर पर दिखाई दी। वित्त मंत्री ने बजट 2026-27 में हेल्थ सेक्टर के बजट में लगभग 10 फीसदी की बढ़ोतरी की है। इस साल स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए लगभग 1.06 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए। वहीं वित्त वर्ष 2026-27 के लिए प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन के बजट में 67.66 फीसदी की बढ़ोतरी की गई है। ये साफ तौर पर दर्शाता है कि सरकार देश में बेहतर हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास पर जोर दे रही है। सरकार हेल्थ सेक्टर को सामाजिक दायित्व के साथ ही राष्ट्रीय उत्पादकता और आर्थिक विकास का आधार मान रही है। वित्त मंत्री ने देश में पांच क्षेत्रीय मेडिकल हब, और हेल्थकेयर के क्षेत्र में मानव संसाधन को मजबूत करने के लिए कदम उठाने का ऐलान किया है। बजट में मानसिक स्वास्थ्य के लिए NIMHANS-2.0 और राष्ट्रीय स्तर के नए संस्थानों की घोषणा भी है।



वित्त वर्ष 2026-27 के लिए प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के बजट में 407 करोड़ की बढ़ोतरी की गई है। इस योजना के तहत नए एम्स, मौजूदा संस्थानों और मेडिकल कॉलेजों के विकास के लिए काम किया जाएगा। पीपुल्स हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन एंड ऑर्गेनाइज्ड मेडिसिन अकेडेमिक गिल्ड के सेक्रेटरी जनरल डॉ ईश्वर गिलाडा कहते हैं कि इस बार बजट में हेल्थ सेक्टर का बजट बढ़ा है, रिसर्च और इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास पर जोर दिया गया है जो अच्छा कदम है। लेकिन बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए हमें अपनी जीडीपी का कम से कम 2 फीसदी हेल्थ सेक्टर पर खर्च करना चाहिए। आज हमें पूरे देश में प्राइमरी हेल्थकेयर को और बेहतर बनाने की आवश्यकता है ताकि सेकेंडरी और बड़े अस्पतालों पर दबाव कम किया जा सके। इससे लोगों को जल्द और बेहतर इलाज भी उपलब्ध हो सकेगा।
आज हमारे देश में प्रजनन दर लगातार गिर रही है। आज देश की प्रजनन दर 1.9 पर है। यूपी और बिहार के योगदान को हटा दें तो ये 1.6 तक पहुंच जाती है। ऐसे ही हालात रहे तो जल्द ही हमारे देश में भी बुजुर्ग लोगों की संख्या ज्यादा हो जाएगी। ऐसे में हेल्थकेयर सिस्टम पर भारी दबाव पड़ेगा। सरकार को इस ओर ध्यान देने की जरूरत है। देश युवा रहे इसके लिए जरूरी है कि कम से कम प्रजनन दर को 2.1 पर मेंटेन किया जाए।
नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन के बजट में में 30.64 फीसदी की बढ़ोतरी की गई है। इस संस्था का बजट लगभग 3,477 करोड़ तक बढ़ गया है। ये एक अच्छा कदम है। दरअसल सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में लगभग 25 लाख लोग एचआईवी से पीड़ित है। इनमें से लगभग 16 लाख लोगों को ही इलाज मिल पा रहा है। सरकार के इस कदम से इस बीमारी से पीड़ित लोगों की पहचान और उनके इलाज में मदद मिलेगी।


रिसर्च को मिलेगा बढ़ावा
केंद्रीय बजट 2026-27 से चिकित्सा के क्षेत्र में रिसर्च को बढ़ावा देने के लिए भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के लिए आवंटन को बजट 2026-27 में बढ़ाकर रुपये 4,000 करोड़ कर दिया गया है। इसके बजट में लगभग 26.98 फीसदी की बढ़ोतरी की गई है। फार्मा में रिसर्च को प्रोत्साहित करने के लिए लगभग 10 हजार करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। इससे देश में नई दवाओं की खोज और विकास को बढ़ावा मिलेगा। इंडियन मेडिकल काउंसिल की एएमआर कमेटी के अध्यक्ष नरेंद्र सैनी कहते हैं कि सरकार की ओर से रिसर्च पर जोर दिया जाना अच्छा कदम है। आज देश में एंटी माइक्रोबियल रजिस्टेंस बड़ी समस्या बन गई है। कई एंटीबायोटिक दवाएं काम नहीं कर रही हैं। ऐसे में नई एंटीबायोटिक दवाओं की रिसर्च पर जोर दिए जाने की जरूरत है। वहीं देश में बढ़ती कैंसर की बीमारी के चलते इसकी रिसर्च पर भी काफी काम किए जाने की जरूरत है।
आई ड्रॉप डालने के बाद कहीं आप भी तो नहीं झपकाते बार-बार पलकें? डॉक्टर ने बताया इस्तेमाल का सही तरीका

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आई ड्रॉप डालने के बाद आंखों में धुंधलापन आना सामान्य है, जो आमतौर पर 5-15 मिनट में ठीक हो जाता है। ...और पढ़ें






आई ड्रॉप्स डालने के बाद धुंधला दिखना- क्या यह सामान्य है? (Image Source: AI-Generated)

आई ड्रॉप से धुंधलापन सामान्य, 5-15 मिनट में ठीक


लंबे धुंधलेपन, दर्द या लालिमा पर डॉक्टर से मिलें


ड्रॉप डालने के बाद धीरे से आंखें बंद करें, न झपकाएं


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि आंखों में आई ड्रॉप डालते ही अचानक सब कुछ धुंधला क्यों दिखने लगता है? यह अनुभव हम में से लगभग हर किसी को होता है और अक्सर मन में यह सवाल उठता है कि क्या आंखों के साथ कुछ गलत हो रहा है?


ग्वालियर के रतन ज्योति नेत्रालय के संस्थापक और डायरेक्टर, आई सर्जन डॉ. पुरेंद्र भसीन के मुताबिक आपको घबराने की बिल्कुल जरूरत नहीं है, क्योंकि ज्यादातर मामलों में यह पूरी तरह से एक सामान्य प्रक्रिया है। आइए समझते हैं कि ऐसा क्यों होता है और आपको किन स्थितियों में सावधान रहने की जरूरत है।



(Image Source: AI-Generated)
रोशनी का डगमगाता फोकस

जब आप आई ड्रॉप डालते हैं, तो दवा की एक लिक्विड परत आपकी आंख की ऊपरी सतह पर फैल जाती है। यह पानी जैसी परत कुछ देर के लिए आपकी आंखों में जाने वाली रोशनी के फोकस को प्रभावित कर देती है, जिसके कारण चीजें स्पष्ट नहीं दिखतीं। आमतौर पर यह धुंधलापन 5 से 15 मिनट के अंदर अपने आप पूरी तरह ठीक हो जाता है।

क्या धुंधलापन ज्यादा देर तक भी रह सकता है?

हां, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस तरह की दवा का इस्तेमाल कर रहे हैं।अगर आप ड्राई आई को नमी देने वाले लुब्रिकेटिंग ड्रॉप्स का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो धुंधलापन थोड़ी अधिक देर तक रह सकता है।
इसी तरह, आंखों की जांच के लिए पुतली फैलाने वाली (डाइलेटिंग) ड्रॉप्स डालने पर कई घंटों तक हल्का धुंधलापन रह सकता है और तेज रोशनी आंखों में चुभ सकती है। यह भी दवा के असर का ही एक सामान्य हिस्सा है।
डॉक्टर के पास कब जाएं?

वैसे तो, यह स्थिति बिल्कुल सामान्य है, लेकिन आपको इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए यदि धुंधलापन बहुत लंबे समय तक बना रहे। अगर आपको ड्रॉप डालने के बाद नीचे दिए गए लक्षणों में से कुछ भी महसूस हो, तो यह एलर्जी, इन्फेक्शन या दवा के रिएक्शन का संकेत हो सकता है:
आंखों में तेज दर्द या जलन शुरू हो जाना।
आंखों का अचानक लाल हो जाना या सूजन आना।
आंखों से लगातार पानी बहना।
ऐसी कोई भी स्थिति होने पर बिना देरी किए तुरंत अपने नेत्र विशेषज्ञ से संपर्क करें।
आई ड्रॉप डालने का सही तरीकादवा का पूरा फायदा आंखों को मिले, इसके लिए उसे सही तरीके से डालना बहुत जरूरी है।
ड्रॉप डालने के बाद अपनी आंखों को एकदम हल्के से बंद करें और 1 से 2 मिनट तक आराम दें।
ध्यान रहे कि दवा डालने के तुरंत बाद बार-बार पलकें न झपकाएं, वरना दवा बाहर निकल सकती है।

अगर डॉक्टर ने आपको एक से ज्यादा तरह की आई ड्रॉप्स लगाने की सलाह दी है, तो दो अलग-अलग ड्रॉप्स डालने के बीच कम से कम 5 से 10 मिनट का गैप जरूर रखें।
 होली की मस्ती के बाद सता रहा है भांग का हैंगओवर? इन आसान तरीकों से मिलेगी राहत

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भांग वाली ठंडाई होली पर कई लोग खूब पसंद करते हैं, लेकिन बाद में हैंगओवर के कारण काफी परेशान होना पड़ सकता है। ...और पढ़ें




भांग का हैंगओवर कैसे उतारें? (Picture Courtesy: Freepik)


शरीर को हाइड्रेटेड रखें और खूब पानी पिएं


एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर पौष्टिक खाना खाएं


पर्याप्त नींद लें और हल्की शारीरिक गतिविधि करें


 होली का त्योहार पूरे देश में बड़े ही हर्षोल्लास और धूमधाम से मनाया जा रहा है। रंगों के इस उत्सव में गुजिया, रसमलाई और नमकपारे जैसे पकवानों की मिठास घुली होती है, लेकिन होली का एक मुख्य आकर्षण भांग भी है।


अक्सर भांग के पत्तों और फूलों के पेस्ट को ठंडाई में मिलाकर इसे होली के अवसर पर पिया जाता है, लेकिन जैसे ही इसका असर कम होता है, अगली सुबह यह अपने साथ एक भारी हैंगओवर लेकर आता है। अगर आप भी भांग के खुमार से परेशान हैं, तो घबराएं नहीं। यहां कुछ असरदार तरीके दिए गए हैं, जो भांग का हैंगओवर उतारने में आपकी काफी मदद कर सकते हैं।


भांग का हैंगओवर उतारना क्यों जरूरी है?

भांग के प्रभाव को शरीर से निकालना इसलिए जरूरी है, क्योंकि इसमें मौजूद तत्व शरीर में लंबे समय तक बने रह सकते हैं। अगर सही समय पर ध्यान न दिया जाए, तो इससे लगातार चक्कर आना और फोकस करने में परेशानी हो सकती है।

इसके अलावा, ज्यादा भांग से जी मिचलाना, एसिडिटी और पेट की समस्याएं भी बढ़ सकती है। यह शरीर को डिहाइड्रेट कर देती है, जिससे सिरदर्द और थकान बनी रहती है। डिटॉक्स करने से आपका मूड बेहतर होता है और स्लीप साइकिल भी वापस पटरी पर आ जाता है।



हैंगओवर उतारने के लिए टिप्सखुद को हाइड्रेटेड रखें- भांग को शरीर से बाहर निकालने के लिए खूब पानी पिएं। इसके अलावा नारियल पानी, हर्बल टी या ताजे फलों का जूस पीना बहुत फायदेमंद होता है। यह शरीर को हाइड्रेट भी करता है
पौष्टिक खाना- शरीर को रिकवर करने के लिए एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर खाना खाएं। अपनी डाइट में बेरीज, पत्तेदार सब्जियां और नट्स शामिल करें। ये शरीर के ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने में मदद करते हैं। खाना धीरे-धीरे चबाकर खाएं, ताकि पाचन बेहतर हो।
डिटॉक्स ड्रिंक्स पिएं- अपनी रिकवरी डाइट में अदरक, लहसुन, हल्दी और क्रूसिफेरस सब्जियों, जैसे- ब्रोकली को शामिल करें। ये लिवर को स्वस्थ रखते हैं और शरीर से गंदगी बाहर निकालने में मदद करते हैं।
हर्बल टी पिएं- डंडेलियन टी या कोई भी दूसरी हर्बल टी पाचन में सुधार करती है और नर्वस सिस्टम को शांत करती हैं। शरीर को अंदर से साफ करने का यह एक बेहतरीन तरीका है।
शारीरिक गतिविधि और भरपूर नींद- हल्की कसरत जैसे टहलना या योग करने से पसीना आता है, जिससे टॉक्सिंस बाहर निकलते हैं। इसके साथ ही, शरीर की सेल्स की मरम्मत और हार्मोन बैलेंस के लिए भरपूर नींद लेना सबसे जरूरी है।
रिलैक्सिंग बाथ- एप्सम साल्ट या एसेंशियल ऑयल डालकर गुनगुने पानी से नहाएं। इससे शरीर को आराम मिलता है और त्वचा के पोर्स भी साफ होते हैं।