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 होली की मस्ती के बाद सता रहा है भांग का हैंगओवर? इन आसान तरीकों से मिलेगी राहत

होली की मस्ती के बाद सता रहा है भांग का हैंगओवर? इन आसान तरीकों से मिलेगी राहत

होली की मस्ती के बाद सता रहा है भांग का हैंगओवर? इन आसान तरीकों से मिलेगी राहत


भांग वाली ठंडाई होली पर कई लोग खूब पसंद करते हैं, लेकिन बाद में हैंगओवर के कारण काफी परेशान होना पड़ सकता है। ...और पढ़ें




भांग का हैंगओवर कैसे उतारें? (Picture Courtesy: Freepik)


शरीर को हाइड्रेटेड रखें और खूब पानी पिएं


एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर पौष्टिक खाना खाएं


पर्याप्त नींद लें और हल्की शारीरिक गतिविधि करें


 होली का त्योहार पूरे देश में बड़े ही हर्षोल्लास और धूमधाम से मनाया जा रहा है। रंगों के इस उत्सव में गुजिया, रसमलाई और नमकपारे जैसे पकवानों की मिठास घुली होती है, लेकिन होली का एक मुख्य आकर्षण भांग भी है।


अक्सर भांग के पत्तों और फूलों के पेस्ट को ठंडाई में मिलाकर इसे होली के अवसर पर पिया जाता है, लेकिन जैसे ही इसका असर कम होता है, अगली सुबह यह अपने साथ एक भारी हैंगओवर लेकर आता है। अगर आप भी भांग के खुमार से परेशान हैं, तो घबराएं नहीं। यहां कुछ असरदार तरीके दिए गए हैं, जो भांग का हैंगओवर उतारने में आपकी काफी मदद कर सकते हैं।


भांग का हैंगओवर उतारना क्यों जरूरी है?

भांग के प्रभाव को शरीर से निकालना इसलिए जरूरी है, क्योंकि इसमें मौजूद तत्व शरीर में लंबे समय तक बने रह सकते हैं। अगर सही समय पर ध्यान न दिया जाए, तो इससे लगातार चक्कर आना और फोकस करने में परेशानी हो सकती है।

इसके अलावा, ज्यादा भांग से जी मिचलाना, एसिडिटी और पेट की समस्याएं भी बढ़ सकती है। यह शरीर को डिहाइड्रेट कर देती है, जिससे सिरदर्द और थकान बनी रहती है। डिटॉक्स करने से आपका मूड बेहतर होता है और स्लीप साइकिल भी वापस पटरी पर आ जाता है।



हैंगओवर उतारने के लिए टिप्सखुद को हाइड्रेटेड रखें- भांग को शरीर से बाहर निकालने के लिए खूब पानी पिएं। इसके अलावा नारियल पानी, हर्बल टी या ताजे फलों का जूस पीना बहुत फायदेमंद होता है। यह शरीर को हाइड्रेट भी करता है
पौष्टिक खाना- शरीर को रिकवर करने के लिए एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर खाना खाएं। अपनी डाइट में बेरीज, पत्तेदार सब्जियां और नट्स शामिल करें। ये शरीर के ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने में मदद करते हैं। खाना धीरे-धीरे चबाकर खाएं, ताकि पाचन बेहतर हो।
डिटॉक्स ड्रिंक्स पिएं- अपनी रिकवरी डाइट में अदरक, लहसुन, हल्दी और क्रूसिफेरस सब्जियों, जैसे- ब्रोकली को शामिल करें। ये लिवर को स्वस्थ रखते हैं और शरीर से गंदगी बाहर निकालने में मदद करते हैं।
हर्बल टी पिएं- डंडेलियन टी या कोई भी दूसरी हर्बल टी पाचन में सुधार करती है और नर्वस सिस्टम को शांत करती हैं। शरीर को अंदर से साफ करने का यह एक बेहतरीन तरीका है।
शारीरिक गतिविधि और भरपूर नींद- हल्की कसरत जैसे टहलना या योग करने से पसीना आता है, जिससे टॉक्सिंस बाहर निकलते हैं। इसके साथ ही, शरीर की सेल्स की मरम्मत और हार्मोन बैलेंस के लिए भरपूर नींद लेना सबसे जरूरी है।
रिलैक्सिंग बाथ- एप्सम साल्ट या एसेंशियल ऑयल डालकर गुनगुने पानी से नहाएं। इससे शरीर को आराम मिलता है और त्वचा के पोर्स भी साफ होते हैं।
आंखों में जलन या स्किन पर खुजली? होली पर केमिकल वाले रंगों से बचने के लिए अपनाएं डॉक्टर के बताए टिप्स

आंखों में जलन या स्किन पर खुजली? होली पर केमिकल वाले रंगों से बचने के लिए अपनाएं डॉक्टर के बताए टिप्स

आंखों में जलन या स्किन पर खुजली? होली पर केमिकल वाले रंगों से बचने के लिए अपनाएं डॉक्टर के बताए टिप्स


आर्टिफिशियल रंगों से आंखों, कान, त्वचा और बालों को हो सकते हैं गंभीर नुकसान। ...और पढ़ें







खुशियों से भरे त्योहार पर केमिकल रंगों का हुड़दंग कहीं आपके चेहरे को लाल न कर दें। यही नहीं, रंगों के साथ मस्ती के दौरान आपकी छोटी-सी लापरवाही पार्टनर की हंसती खेलती जिंदगी में भंग न डाल दे।


वर्षों से होली के दिन केमिकल रंगों की मस्ती तमाम लोगों को इतनी भारी पड़ी कि उनमें स्किन इन्फेक्शन, आंखों में जलन, जीभ पर छाले और अन्य गंभीर बीमारियों ने अपनी चपेट में ले लिया। आइए जानें इस बारे में दैनिक जागरण के वरिष्ठ संवाददाता सुमित शिशोदिया व जिला अस्पताल के त्वचा रोग विशेषज्ञ डॉ. अभिषेक दूबे के बीच बातचीत के अंश।
मौसम बदलने पर लोगों को तेज धूप से त्वचा को सुरक्षित रखने के लिए क्या सावधानी बरतनी चाहिए?

जवाब: धूप में लंबा समय बिताने से त्वचा को काफी नुकसान होता है, जिसे फोटोएजिंग कहते हैं सूर्य की अल्ट्रा वाइलेट किरणों से महीन और चेहरे पर मोटी झुर्रियां पड़ जाती हैं, जहां तहां पिगमेंट बढ़ जाते हैं। धूप में त्वचा सनबर्न का शिकार हो जाती है। और स्किन कैंसर का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। हालांकि, इनमें से तीन बेसल सेल कार्सिनोमा, स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा, मेलेनोमा सबसे आम हैं। बचाव के लिए लंबे समय तक धूप में बिल्कुल न रहें। पूरी बाजू के कपड़े पहनकर रखें।





(AI Generated Image)
होली के दिन रंग से खेलने पर शरीर में खुजली और लाल चकत्ते हो जाते हैं, क्या और भी समस्या हो सकती है?

जवाब: होली भले ही रंगों से खेलने के लिए पर्व है, लेकिन तेज धूप में केमिकल वाले रंगों से त्योहार न मनाए। करना केमिकल रंग लगने से शरीर पर लाल चकत्ते, खुजली, छोटे- छोटे दाने और अन्य परेशानी हो सकती है। शरीर पर लेंटिजिनीज होने से रंग पीला पड़ जाता है और त्वचा की सतह चमड़े जैसी खुरदरी हो जाती है।

कई लोग होली के दिन शरीर के अलग-अलग हिस्सों में ग्रीस भी लगा देते हैं। क्या बालों में ग्रीस लगने से दिक्कत भी हो सकती है?

जवाब: होली के दिन ग्रीस या वारनेस जैसी चीजें बालों के छिद्रों को बंद कर देते हैं। त्वचा में इंफेक्शन होने का खतरा बढ़ जाता है। बालों की ग्रोथ भी रूकने का खतरा रहता है। देखने में आता है कि केमिकल लगाने से आता है कि केमिकल लगाने से बालों की जड़ें कमजोर हो जाती हैं और इनके टूटने का खतरा बढ़ जाता है, जो व्यक्ति की सुंदरता को और खराब करता है। बचाव के लिए बालों में नारियल का तेल लगा लें। साथ ही सिर को टोपी या किसी कपड़े से कवर कर रखें।

आंखों पर रंग लगाने से लालीपन, खुजली और अन्य समस्या होने लगती हैं। क्या तुरंत राहत के लिए कोई दवा भी डाल सकते हैं?

जवाब: आंखों में केमिकल कलर और ग्रीस लगाने से जलन, लालीपन व खुजली हो जाती है। कई बार आंखों से ज्यादा दबाव देकर रंग लगाने से दर्द भी हो जाता है। होली पर रंग लगाने से पहले चश्मा लगा लें। कुछ समय बाद आंखों को पानी से साफ करते रहिए। तुरंत राहत के लिए आई लुब्रिकेंट या टियर ड्राप की दो-दो बूंद दिन में तीन - चार बार डालें। आंखों में कोई भी दिक्कत होने पर सबसे पहले डाक्टर से परामर्श जरूर लें।

होली मनाने के बाद जिला अस्पताल के अंदर ओपीडी में मरीजों की संख्या में इजाफा होता है?

जवाब: पिछले पांच-छह वर्षों के आंकड़े देखे तो होली पर अधिकांश लोग लापरवाही का शिकार होते हैं। विभिन्न रंग लगाने से शरीर में लोगों को एलर्जिक रिएक्शन हो जाता है। त्वचा इंफेक्शन होने के बाद मरीज जिला अस्पताल की ओपीडी में परामर्श लेने आते हैं।

होली का सुरक्षित त्योहार मनाने के लिए लोगों को क्या सावधानी बरतनी चाहिए?

जवाब: यदि आपको केमिकल या पक्के रंगों से खेलने का शौक है तो कोशिश करें कि इस बार पक्के रंग न लगाएं। बचाव के लिए सबसे पहले बाड़ी पर सनस्क्रीन लगाएं। मोइस्चराइजर का उपयोग करें, ताकि त्वचा पर धूप की पैरा बैंगनी किरणें का असर न पड़े। साथ ही सभी का त्योहार सुरक्षित तरीके से मन सके । मोइस्चराइजर का प्रयोग दिन में कम से कम दो-तीन बार करें।
हार्ट अटैक के खतरे को कम करते हैं ये खास फूड्स, नेचुरली बढ़ाते हैं आपका गुड कोलेस्ट्रॉल

हार्ट अटैक के खतरे को कम करते हैं ये खास फूड्स, नेचुरली बढ़ाते हैं आपका गुड कोलेस्ट्रॉल

हार्ट अटैक के खतरे को कम करते हैं ये खास फूड्स, नेचुरली बढ़ाते हैं आपका गुड कोलेस्ट्रॉल


फैटी फिश, अलसी, एक्स्ट्रा वर्जिन ऑलिव ऑयल और नट्स गुड, कोलेस्ट्रॉल (HDL) को बढ़ाने में मदद करते हैं। गुड कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ने से दिल की बीमारियों ...और पढ़ें






डाइट में शामिल करें ये चीजें, आसानी से बढ़ाएं गुड कोलेस्ट्रॉल का स्तर (Picture Credit- AI Generated)

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। हार्ट हेल्थ के लिए कोलेस्ट्रॉल का स्तर बेहद जरूरी है, खासकर गुड कोलेस्ट्रॉल कहे जाने वाले एचडीएल का स्तर ज्यादा होना और बैड कोलेस्ट्रॉल (LDL) का कम होना।

सामान्यतौर पर पुरुषों में जहां एचडीएल 40 से ऊपर होना चाहिए, वहीं महिलाओं में 50 से ऊपर। आइए, जानते हैं एचडीएल को बढ़ाने के लिए किस तरह के हेल्दी फैट्स और डाइट की जरूरत होती है।
ये फैट्स हैं जरूरी मोनोसैचुरेटेड फैट्स: इसे प्लांट बेस्ड चीजों से ले सकते हैं।
पॉलीसैचुरेटेड फैट्स: इसका मुख्य स्रोत ऑयली फिश और कई प्रकार की प्लांट बेस्ड चीजें होती हैं।
ओमेगा-3 फैटी एसिड्स: यह एचडीएल को बढ़ाने के साथ-साथ ट्राइग्लिसराइड को भी कम करता है, जो कि हार्ट के लिए एक और खतरा माना जाता है।
डाइट में शामिल करें ये चीजेंफैटी फिश: कुछ खास प्रकार की मछलियों में भरपूर मात्रा में ओमेगा-3 पाया जाता है। लेकिन ये फिश एचडीएल को बढ़ाने में भी मदद करती हैं। इसे हफ्ते में कम से कम दो बार जरूर लें। सैल्मन, हिल्सा, बांगड़ा और एंकोवी कुछ ऐसी मछलियां हैं, जिनमें ओमेगा-3 ज्यादा मात्रा में पाया जाता है, लेकिन मरक्यूरी का खतरा कम होता है।
अलसी के बीज: इन छोटे-छोटे बीजों में ओमेगा-3 की भरपूर मात्रा के साथ-साथ सॉल्यूबल फाइर्ब्स भी होता है, जोकि बैड कोलेस्ट्रॉल को कम करता है। इससे खून में एचडीएल और एलडीएल का एक हेल्दी बैलेंस बना रहता है।
नट्स: हेल्दी फैट्स के अच्छे स्रोत माने जाने वाले नट्स सीधे तौर पर एचडीएल को तो नहीं बढ़ाते, लेकिन रिचर्स बताती है कि इससे एचडीएल बेहतर काम करता है। यानी यह लिवर से बैड कोलेस्ट्रॉल को ज्यादा प्रभावी तरीके से बाहर निकालता है और उसका स्तर कम होने लगता है। अखरोट, बादाम और पिस्ता सबसे बेहतर नट्स माने जाते हैं।
एक्स्ट्रा वर्जिन ऑलिव ऑयल: यह कई रूपों में आपके हार्ट को फायदा पहुंचाता है। जैसे एचडीएल के स्तर को बढ़ाना और एलडीएल को कम करना। यदि आप कुकिंग में इसका इस्तेमाल नहीं कर रहे तो आप सलाद के ऊपर ड्रेसिंग के तौर पर ले सकते हैं।
सतरंगी फलों का टोकरा: वैसे तो गुड कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने के लिए हर रंग के फल और सब्जियों को खाने की सलाह दी जाती है। लेकिन सेब, बेरीज जैसे फाइबर युक्त फल ज्यादा फायदेमंद होते हैं। इसे आप शाम के स्नैक के तौर पर ले सकते हैं। इसके साथ ही हर रंग की शिमला मिर्च, शकरकंद, ग्रेपफ्रूट भी एचडीएल को बढ़ाने में मददगार माने जाते हैं।
जरूरी नहीं कि सीने में दर्द ही हो! हार्ट अटैक के इन 5 लक्षणों को गैस या थकान समझने की भूल न करें

जरूरी नहीं कि सीने में दर्द ही हो! हार्ट अटैक के इन 5 लक्षणों को गैस या थकान समझने की भूल न करें

जरूरी नहीं कि सीने में दर्द ही हो! हार्ट अटैक के इन 5 लक्षणों को गैस या थकान समझने की भूल न करें



सीने में दर्द के अलावा हार्ट अटैक के और भी संकेत होते हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ...और पढ़ें






लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। हार्ट अटैक का नाम सुनते ही दिमाग में सबसे पहली तस्वीर एक ऐसे व्यक्ति की आती है जो अचानक अपने सीने को पकड़कर जमीन पर गिर पड़ता है। फिल्मों और विज्ञापनों में हार्ट अटैक के इसी क्लासिक लक्षण को बार-बार दिखाया जाता है, लेकिन असल में इसके लक्षण इतने साफ नहीं होते।


हार्ट अटैक के कई मरीजों में सीने में दर्द होता ही नहीं है, बल्कि दूसरे लक्षण दिखाई देते हैं। समय पर इन लक्षणों को पहचानना जान बचाने के लिए बेहद जरूरी हैं। आइए जानें हार्ट अटैक के लक्षण, जिन्हें अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं।
सांस लेने में तकलीफ

अगर आपको बिना किसी भारी काम के या आराम करते समय भी सांस फूलने की समस्या हो रही है, तो यह दिल की बीमारी का संकेत हो सकता है। जब दिल शरीर के बाकी हिस्सों में ब्लड पंप नहीं कर पाता, तो फेफड़ों पर दबाव बढ़ता है, जिससे सांस लेने में परेशानी होती है।




(AI Geneated Image)
शरीर के अन्य हिस्सों में दर्द और बेचैनी

हार्ट अटैक का दर्द केवल सीने तक सीमित नहीं रहता। यह दर्द अक्सर कंधों, गर्दन, जबड़े, पीठ या हाथों में महसूस हो सकता है। कई बार लोग जबड़े के दर्द को दांत का दर्द समझ लेते हैं, जबकि वह हार्ट अटैक का संकेत होता है।

ज्यादा थकान और कमजोरी

अगर आप पिछले कुछ दिनों से बिना किसी कारण के बहुत ज्यादा थकान महसूस कर रहे हैं, तो सावधान हो जाएं। खासकर महिलाओं में, हार्ट अटैक से पहले हफ्तों तक बहुत ज्यादा कमजोरी महसूस हो सकती है। यह थकान इतनी ज्यादा होती है कि रोजमर्रा के छोटे काम करना भी दूभर हो जाता है।

ठंडा पसीना आना और चक्कर

बिना गर्मी या किसी मेहनत के अचानक ठंडा पसीना आना एक गंभीर चेतावनी है। अगर इसके साथ आपको चक्कर आ रहे हैं या ऐसा लग रहा है कि आप बेहोश होने वाले हैं, तो यह दिल तक ब्लड सर्कुलेशन में कमी का संकेत हो सकता है।

पेट में गड़बड़ी और जी मचलना

हार्ट अटैक के लक्षणों को अक्सर एसिडिटी या अपच समझ लिया जाता है। पेट के ऊपरी हिस्से में दबाव महसूस होना, जी मिचलाना या उल्टी होना भी इसके संकेत हो सकते हैं। अगर आपको बार-बार ऐसी समस्या हो रही है जो एंटासिड लेने से ठीक नहीं हो रही, तो डॉक्टर से सलाह जरूर लें।

क्या करें अगर ये लक्षण महसूस हों?तुरंत मदद मांगें- खुद गाड़ी चलाकर अस्पताल जाने की कोशिश न करें। एम्बुलेंस बुलाएं या किसी की मदद लें।
शांत रहें- घबराहट दिल पर दबाव बढ़ा सकती है। लंबी और गहरी सांसें लेने की कोशिश करें।
क्या आपको भी है दोपहर में सोने की आदत? डॉक्टर बता रहे हैं इसे 'साइलेंट किलर'

क्या आपको भी है दोपहर में सोने की आदत? डॉक्टर बता रहे हैं इसे 'साइलेंट किलर'

क्या आपको भी है दोपहर में सोने की आदत? डॉक्टर बता रहे हैं इसे 'साइलेंट किलर'



डॉ. अदितिज धमीजा ने बताया कि गलत समय ली गई दोपहर की झपकी दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ा देती है। ...और पढ़ें





दोपहर में सोने वाले हो जाएं अलर्ट (Image Source: AI-Generated)


गलत झपकी से दिल की बीमारी और डायबिटीज का जोखिम


गलत समय और ज्यादा देर तक सोना शरीर के लिए जहर है


डॉक्टर का कहन है कि सिर्फ 10 से 30 मिनट की ही झपकी लें


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। दोपहर के समय एक छोटी-सी झपकी लेना हममें से कई लोगों को बहुत पसंद होता है। दिनभर की थकान के बीच यह कुछ पल का सुकून जरूर देता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि डॉक्टर के अनुसार, दोपहर की नींद आपके लिए जानलेवा भी साबित हो सकती है?


हार्वर्ड की एक स्टडी ने यह चौंकाने वाला खुलासा किया है कि दोपहर में सोने की आदत दिल की बीमारियों, डायबिटीज और यहां तक कि समय से पहले मौत के खतरे को बढ़ा सकती है। आइए, डॉ. अदितिज धमीजा से डिटेल में जानते हैं इसके बारे में।
सोने से पहले जान लें ये 2 नियम

असल में, दोपहर की नींद अपने आप में बुरी नहीं है। खतरा तब पैदा होता है जब आप 'गलत समय' पर या 'गलत अवधि' के लिए सोते हैं। शरीर के लिए गलत समय या गलत तरीके से ली गई झपकी किसी जहर तरह काम करती है और आपकी सेहत को अंदर ही अंदर नुकसान पहुंचाती है।

घबराइए मत। डॉक्टर के मुताबिक, इसी हार्वर्ड स्टडी में यह भी बताया गया है कि आप खुद को इस खतरे से कैसे बचा सकते हैं। अगर आप दोपहर में सोना ही चाहते हैं और बीमारियों से भी बचना चाहते हैं, तो आपको बस इन दो आसान नियमों का पालन करना होगा:
सही अवधि: आपकी झपकी सिर्फ 10 से 30 मिनट के बीच की होनी चाहिए। इससे ज्यादा लंबी नींद आपके लिए नुकसानदायक हो सकती है।
सही समय: दोपहर की यह छोटी सी झपकी लेने का सबसे सुरक्षित समय सुबह 11 बजे से दोपहर 2 बजे के बीच का है। दोपहर 2 बजे के बाद भूलकर भी न सोएं।

सबसे जरूरी बात यह है कि आपको अपनी नींद का मुख्य हिस्सा रात में ही पूरा करना चाहिए। अगर आप रात में बिना किसी परेशानी के सुकून भरी नींद चाहते हैं, तो दोपहर में ज्यादा देर तक सोने से बचें।
सावधान! बार-बार खाने की आदत समय से पहले कर रही है आपको बूढ़ा, शरीर बन जाता है बीमारियों का घर

सावधान! बार-बार खाने की आदत समय से पहले कर रही है आपको बूढ़ा, शरीर बन जाता है बीमारियों का घर

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आजकल भारतीयों में बार-बार स्नैकिंग की आदत बढ़ गई है, जिससे स्वास्थ्य और उम्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। यह मेटाबॉलिज्म को बाधित करता है, इंसुलिन ...और पढ़ें







बार-बार खाने से मेटाबॉलिज्म और पाचन तंत्र प्रभावित होता है


बार-बार स्नैकिंग इंसुलिन असंतुलन, चर्बी जमा होने का कारण बनती है


यह आदत समय से पहले बुढ़ापा और गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ाती है


 आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम नाश्ते, दोपहर और रात के खाने के बीच भी अक्सर कुछ न कुछ खाते रहते हैं। पैकेट बंद चिप्स हों या बिस्किट, भारतीयों में स्नैकिंग का चलन तेजी से बढ़ा है।


ज्यादातर भारतीय दिन में कम से कम दो बार स्नैक्स खाते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि मामूली लगने वाली यह आदत आपकी सेहत और उम्र पर भारी पड़ रही है? आइए डॉ. मोहित शर्मा (सीनियर कंसल्टेंट, इंटरनल मेडिसिन, अमृता हॉस्पिटल, फरीदाबाद) से जानें कैसे।
मेटाबॉलिज्म के लिए रोलरकोस्टर है बार-बार खाना

अक्सर लोग मानते हैं कि थोड़ा-थोड़ा खाने से मेटाबॉलिज्म बढ़ता है, लेकिन हकीकत इसके उलट है। जब हम बार-बार खाते हैं, खासकर चिप्स और बिस्किट, तो हमारे शरीर को मेटाबॉलिक रेस्ट यानी पाचन तंत्र को आराम नहीं मिल पाता। इसके कारण शरीर में कई समस्याएं हो सकती हैं, जैसे-
इंसुलिन का असंतुलन- आप चाहे छोटा-सा बिस्कुट ही क्यों न खाएं, हर बार शरीर में इंसुलिन का रिस्पॉन्स ट्रिगर होता है।
फैट स्टोरेज- बार-बार खाने से शरीर को फैट बर्न करने का समय नहीं मिलता, जिससे चर्बी जमा होने लगती है। यही कारण है कि ज्यादा स्नैकिंग करने वालों में पॉट बेली यानी पेट के पास चर्बी जमा होने की समस्या ज्यादा देखी जाती है।
पाचन समस्याएं- पाचन तंत्र को आराम न मिलने के कारण एसिडिटी, ब्लोटिंग और मेटाबॉलिक फटीग जैसी समस्याएं पैदा होती हैं।

(AI Generated Image)
हम इतना ज्यादा क्यों खा लेते हैं?

ज्यादा खाने से होने वाले नुकसानों के बारे में लगभग हर कोई जानता है, लेकिन फिर भी हम बार-बार खाने से खुद को रोक क्यों नहीं पाते? कई बार तो हमें भूख भी नहीं लगी होती, लेकिन हम फिर भी खा लेते हैं। इसके पीछे क्या वजह है?
तनाव और बोरियत- कई लोग तनाव या बोरियत मिटाने के लिए खाते हैं। इसे स्ट्रेस ईटिंग कहा जाता है, जिसमें अक्सर लोग हाई-कैलोरी और अनहेल्दी फैट वाली चीजें चुनते हैं।
प्रोटीन की कमी- भारतीय खाने में अक्सर फाइबर और प्रोटीन की मात्रा कम होती है। जब खाने में जरूरी पोषक तत्व नहीं होते, तो पेट जल्दी खाली महसूस होता है और बार-बार खाने की इच्छा होती है।
आसान उपलब्धता- फूड डिलीवरी ऐप्स और बाजार में मिलने वाले सस्ते, पैकेट बंद स्नैक्स ने इस आदत को बढ़ावा दिया है।
सेहत पर गंभीर प्रभाव और समय से पहले बुढ़ापा

लगातार स्नैकिंग न केवल वजन बढ़ाती है, बल्कि यह हमारे शरीर को भीतर से भी नुकसान पहुंचाती है-

समस्या प्रभाव
बीमारियों का खतरा इंसुलिन रेजिस्टेंस, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारियां
जीन पर असर बार-बार खाने से शरीर के लॉन्गेविटी जींस ब्लॉक हो जाते हैं, जो डीएनए की मरम्मत और सूजन कम करने का काम करते हैं।
उम्र बढ़ना यह शरीर की ऑटोफैगी यानी सेल्स की सफाई की प्रक्रिया को रोकता है, जिससे उम्र बढ़ने की प्रक्रिया तेज हो जाती है।

कैसे बदलें यह आदत?

अपनी मेटाबॉलिक सेहत को वापस पटरी पर लाने के लिए कुछ आसान बदलाव किए जा सकते हैं, जैसे-हेल्दी और बैलेंस्ड डाइट- अपने खाने में प्रोटीन और फाइबर की मात्रा बढ़ाएं, ताकि आपको लंबे समय तक भूख न लगे।
फास्टिंग- रात के खाने और अगले दिन के नाश्ते के बीच 12 से 14 घंटे का अंतर रखने की कोशिश करें। इससे शरीर को फैट बर्न करने और रिकवरी का समय मिलता है।
जागरुकता- खाने से पहले खुद से पूछें कि क्या आपको वाकई भूख लगी है या आप सिर्फ तनाव या बोरियत के कारण खा रहे हैं।
लंबी फ्लाइट के बाद नींद से नहीं टूटेगा बदन, वैज्ञानिकों ने खोज निकाला थकान मिटाने का 'नया फॉर्मूला'

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सोचिए आप हजारों मील की हवाई यात्रा कर किसी दूसरे देश पहुंचते हैं, लेकिन आपका शरीर अभी भी पुराने समय में ही अटका हुआ है। दिन में भारी थकान और रात में आ ...और पढ़ें








क्या एक गोली खाते ही गायब होगी हवाई सफर की थकान? (Image Source: Freepik)


जापानी वैज्ञानिकों ने 'मिक 628' नामक क्रांतिकारी दवा खोजी


यह दवा शरीर की इंटरनल क्लॉक को तेजी से रीसेट करती है


चूहों पर सफल परीक्षण, अब इंसानों पर होगा अध्ययन


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। लंबी हवाई यात्रा के बाद होने वाली थकान या अलग-अलग शिफ्ट में काम करने की वजह से बिगड़ी हुई नींद अब बीते दिनों की बात हो सकती है। जापान के वैज्ञानिकों ने एक क्रांतिकारी दवा 'मिक 628' की खोज की है, जो शरीर की 'इंटरनल क्लॉक' को तेजी से आगे खिसकाने में मदद करती है। इस दवा की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह अनिद्रा और थकान से राहत दिलाने में बेहद असरदार साबित हो रही है।




(Image Source: Freepik)
चूहों पर सफल रहा प्रयोग

वैज्ञानिकों ने इस दवा का परीक्षण चूहों पर किया, जिसके नतीजे चौंकाने वाले रहे। शोध के दौरान चूहों के लिए दिन और रात के समय को 6 घंटे आगे बढ़ाकर 'जेट लैग' जैसी स्थिति पैदा की गई। जिन चूहों को 'मिक 628' की एक खुराक दी गई, वे सामान्य चूहों की तुलना में 3 दिन पहले ही नए समय के अनुसार ढल गए। इस प्रयोग से यह साफ हुआ कि यह दवा जेट लैग से उबरने के समय को लगभग आधा कर देती है।
कैसे काम करती है यह दवा?

यह महत्वपूर्ण शोध अमेरिका की राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी की पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। वैज्ञानिकों ने सबसे पहले शरीर की अंदरूनी घड़ी को नियंत्रित करने वाले एक खास जीन की पहचान की। 'मिक 628' दवा इसी जीन को सक्रिय करती है, जिससे शरीर का चक्र तेजी से बदल जाता है। इस दवा की एक और खास बात यह है कि इसे लेने के समय का इसके असर पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, जो इसे अन्य दवाओं से अलग बनाता है।

भारतीयों के लिए क्यों है खास?

आज के दौर में भारतीयों का विदेश दौरा काफी बढ़ गया है। आंकड़ों के अनुसार, साल 2024-25 में करीब 3.17 करोड़ भारतीयों ने लंबी हवाई यात्राएं कीं। इतनी बड़ी संख्या में यात्रियों को अक्सर समय के अंतर के कारण नींद न आने और थकान जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अगर यह दवा बाजार में आती है, तो इन करोड़ों यात्रियों को इसका सीधा लाभ मिलेगा।

अब इंसानों पर होगा परीक्षण

चूहों पर मिली बड़ी कामयाबी के बाद अब वैज्ञानिक इस दवा को इंसानों पर परखने की तैयारी कर रहे हैं। आने वाले समय में इसके सुरक्षा मानकों और प्रभाव का गहराई से अध्ययन किया जाएगा। अगर इंसानों पर होने वाले परीक्षण सकारात्मक रहते हैं, तो यह दवा न केवल यात्रियों के लिए, बल्कि शिफ्ट में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए भी एक बड़ी राहत लेकर आएगी।
क्या बिना किसी लक्षण के शरीर में बढ़ सकता है कोलेस्ट्रॉल? समझें कैसे बन सकता है साइलेंट किलर?

क्या बिना किसी लक्षण के शरीर में बढ़ सकता है कोलेस्ट्रॉल? समझें कैसे बन सकता है साइलेंट किलर?

क्या बिना किसी लक्षण के शरीर में बढ़ सकता है कोलेस्ट्रॉल? समझें कैसे बन सकता है साइलेंट किलर?


हाई कोलेस्ट्रॉल एक साइलेंट किलर है, क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण नहीं दिखते, जिससे समस्या गंभीर होने तक इसका पता नहीं चलता। यह ब्लड वेसल्स में प्लाक जमा ...और पढ़ें







कैसे लगाएं हाई कोलेस्ट्रॉल का संकेत? (Picture Courtesy: Freepik)


कोलेस्ट्रॉल अक्सर बिना किसी शुरुआती लक्षण के बढ़ता है


गंभीर होने पर हाथ-पैरों में झुनझुनी, आंखों पर पीले धब्बे जैसे संकेत दिखते हैं


नियमित लिपिड टेस्ट और स्वस्थ जीवनशैली से बचाव संभव है


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। हार्ट अटैक और दिल की बीमारियों का बड़ा कारण हाई कोलेस्ट्रॉल है, लेकिन अक्सर इसे साइलेंट किलर कहा जाता है। यह नाम इसे इसलिए मिला है, क्योंकि कोलेस्ट्रॉल बढ़ने के संकेत तब तक सामने नहीं आते जब तक स्थिति बहुत गंभीर न हो जाए।


ऐसे में यह समझना जरूरी है कि कैसे वक्त रहते कोलेस्ट्रॉल का पता लगा सकते हैं और यह कैसे साइलेंट किलर बन जाता है। आइए जानें इन सवालों के जवाब।
क्यों खतरनाक है कोलेस्ट्रॉल?

कोलेस्ट्रॉल एक मोम जैसा पदार्थ होता है जो हमारे ब्लड में पाया जाता है। शरीर को कुछ मात्रा में गुड कोलेस्ट्रॉल (HDL) की जरूरत होती है, लेकिन अगर बैड कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ जाती है, तो यह आर्टरीज में जमा होने लगता है।





(AI Generated Image)
क्या बढ़ते कोलेस्ट्रॉल के लक्षण दिखते हैं?

इसका सीधा जवाब है, नहीं। आमतौर पर हाई कोलेस्ट्रॉल का कोई लक्षण नहीं होते। व्यक्ति पूरी तरह स्वस्थ महसूस कर सकता है, जबकि उसकी आर्टरीज के अंदर धीरे-धीरे प्लाक जमा होता रहता है। हालांकि, जब स्थिति काफी बढ़ जाती है, तो शरीर कुछ संकेत दे सकता है, जैसे-
हाथ-पैरों में झुनझुनी- नसों में ब्लड फ्लो बाधित होने के कारण हाथ-पैरों में सुन्नता महसूस हो सकती है।
त्वचा पर पीले निशान- कुछ लोगों की आंखों के कोनों या पलकों पर पीले रंग के छोटे चकत्ते दिखने लगते हैं, जो कोलेस्ट्रॉल के जमाव का संकेत हैं।
सांस फूलना या थकान- दिल तक सही मात्रा में ऑक्सीजन न पहुंचने के कारण मामूली काम में भी थकान होने लगती है।
सीने में बेचैनी- अगर आर्टरीज ज्यादा ब्लॉक हो जाएं, तो सीने में दर्द की समस्या हो सकती है।
यह साइलेंट किलर कैसे बनता है?

कोलेस्ट्रॉल शरीर को कई तरीकों से नुकसान पहुंचा सकता है, जैसे-
प्लाक जमना- जब ब्लड में बैड कोलेस्ट्रॉल की मात्रा ज्यादा होती है, तो यह आर्टरीज की दीवारों पर चिपकने लगता है। समय के साथ यह सख्त होकर प्लाक बन जाता है।
आर्टरीज संकरी होना- जैसे-जैसे प्लाक बढ़ता है, आर्टरीज संकरी और सख्त हो जाती हैं। इससे ब्लड फ्लो के लिए कम जगह मिलती है और ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है
ब्लड सर्कुलेशन में रुकावट- यह प्रक्रिया सालों तक बिना किसी दर्द के चलती रहती है। शरीर इस बदलाव के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश करता है, इसलिए मरीज को कुछ महसूस नहीं होता।
हार्ट अटैक या स्ट्रोक- जब आर्टरीज पूरी तरह बंद हो जाती है या ब्लड फ्लो के लिए बहुत कम रास्ता बचता है, तो यह हार्ट अटैक या स्ट्रोक का कारण बनता है।
कैसे लगाएं पता?

क्योंकि इसके लक्षण दिखाई नहीं देते, इसलिए एकमात्र रास्ता नियमित लिपिड प्रोफाइल टेस्ट है, खासकर अगर आपके परिवार में हाई कोलेस्ट्रॉल का इतिहास रहा है। इसके अलावा-
सैचुरेटेड और ट्रांस फैट से बचें। ओमेगा-3 और फाइबर से भरपूर डाइट लें
एक्सरसाइज गुड कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने में मदद करती है, जो बैड कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मददगार है।
बढ़ता वजन सीधे तौर पर कोलेस्ट्रॉल के स्तर को प्रभावित करता है। इसलिए सही वजन मेंटेन करने की कोशिश करें।
दौरा पड़ने पर मुंह में चम्मच डाल देनी चाहिए? एक्सपर्ट ने बताया एपिलेप्सी से जुड़े ऐसे ही 5 मिथकों का सच

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मिर्गी एक न्यूरोलॉजिकल स्थिति है, न कि मानसिक बीमारी। समाज में इससे जुड़ी कई गलतफहमियां फैली हैं, जो दौरे के दौरान मरीज के लिए जानलेवा साबित हो सकती ह ...और पढ़ें







मिर्गी से जुड़ी इन गलतफहमियों को दूर करना है जरूरी (Picture Courtesy: Freepik)


दौरे में मुंह में चम्मच डालना जानलेवा हो सकता है।


मिर्गी मरीज को जबरदस्ती पकड़ने से चोट लग सकती है।


मिर्गी एक न्यूरोलॉजिकल स्थिति है, मानसिक बीमारी नहीं।


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। एपिलेप्सी एक ऐसी कंडीशन है, जिसे लेकर समाज में आज भी कई गलत जानकारियां फैली हुई हैं। जागरूकता की कमी के कारण अक्सर लोग दौरे पड़ने पर सही मदद करने के बजाय ऐसी गलतियां कर बैठते हैं, जो मरीज के लिए जानलेवा साबित हो सकती हैं।


अमृता अस्पताल, फरीदाबाद के न्यूरोसाइंसेज, न्यूरोलॉजी और स्ट्रोक मेडिसिन विभाग के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. अमित कुमार अग्रवाल बताते हैं कि मिर्गी कोई मानसिक बीमारी नहीं, बल्कि एक न्यूरोलॉजिकल स्थिति है जिसे सही जानकारी और इलाज से मैनेज किया जा सकता है। आइए डॉ. अग्रवाल से जानते हैं एपिलेप्सी से जुड़े उन 5 बड़े मिथकों की सच्चाई, जिन पर लोग आज भी यकीन करते हैं।


मिथक 1- जीभ कटने से बचाने के लिए मुंह में चम्मच, वॉलेट या लकड़ी डाल देनी चाहिए।सच्चाई- यह सबसे खतरनाक मिथकों में से एक है। दौरा पड़ने पर मरीज के मुंह में कभी भी कुछ नहीं डालना चाहिए। ऐसा करने से मरीज के दांत टूट सकते हैं, जबड़े में चोट लग सकती है या सांस की नली ब्लॉक हो सकती है, जिससे दम घुटने का खतरा बढ़ जाता है। लोग अक्सर डरते हैं कि मरीज अपनी जीभ निगल जाएगा, लेकिन यह संभव नहीं है। अगर जीभ पर हल्की चोट आती भी है, तो वह उतनी खतरनाक नहीं होती जितना कि बाहरी वस्तु डालने से होने वाली सांस की रुकावट।
क्या करें- जब झटके रुक जाएं, तब व्यक्ति को धीरे से करवट दिलाएं ताकि सांस की नली खुली रहे।


मिथक 2- झटकों को रोकने के लिए व्यक्ति को जोर से पकड़ लेना चाहिए।सच्चाई- दौरे के दौरान किसी को जबरदस्ती पकड़ना या दबाना बहुत जोखिम भरा है। दरअसल, पकड़ने से दौरा नहीं रुकता, बल्कि इससे मरीज की मांसपेशियों में खिंचाव, फ्रैक्चर या जोड़ों के खिसकने का खतरा बढ़ जाता है।
क्या करें- आसपास की नुकीली या सख्त चीजों को हटा दें, सिर के नीचे मुलायम कपड़ा रखें और दौरे को अपने आप शांत होने दें।
मिथक 3- सभी दौरों में मरीज जमीन पर गिरकर हिंसक रूप से कांपने लगता है।सच्चाई- फिल्मों में अक्सर यही दिखाया जाता है, लेकिन हकीकत अलग है। डॉ. अग्रवाल बताते हैं कि ज्यादातर दौरे काफी सूक्ष्म होते, जैसे- अचानक एक जगह टकटकी लगाकर देखना, होंठ चबाना, अचानक भ्रमित होना या हाथ-पैर की अजीब सी हरकतें। इन्हें अक्सर लोग पहचान नहीं पाते, जिससे इलाज में देरी होती है। सही समय पर पहचान और डॉक्टरी सलाह बहुत जरूरी है।
मिथक 4- चमकती लाइट्स हर मिर्गी के मरीज के लिए दौरा पैदा करती हैं।सच्चाई- फोटोसेंसिटिव एपिलेप्सी केवल 5% से भी कम मरीजों में पाई जाती है। डॉ. अग्रवाल के मुताबिक, ज्यादातर मरीजों के लिए नींद की कमी, दवा छोड़ना, तनाव, इन्फेक्शन या शराब जैसे कारण ट्रिगर बनते हैं। इसलिए बिना डॉक्टर की सलाह के हर मरीज के लिए स्क्रीन या लाइट से परहेज करना जरूरी नहीं है।
मिथक 5- मिर्गी एक मानसिक बीमारी या बौद्धिक अक्षमता है।सच्चाई- एपिलेप्सी एक न्यूरोलॉजिकल स्थिति है, न कि कोई मनोरोग। इसका व्यक्ति की बुद्धिमत्ता या मानसिक क्षमता से कोई सीधा संबंध नहीं है। दुनिया भर में मिर्गी से प्रभावित लाखों लोग सफल छात्र, डॉक्टर, पेशेवर और माता-पिता के रूप में एक सामान्य और स्वतंत्र जीवन जी रहे हैं।
सीसीटीवी' की तरह 24 घंटे आपकी सेहत पर रहेगी डॉक्टर की नजर, जानिए कैसे काम करेगी नई AI तकनीक

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सीसीटीवी' की तरह 24 घंटे आपकी सेहत पर रहेगी डॉक्टर की नजर, जानिए कैसे काम करेगी नई AI तकनीक



जिस तरह हम अपने घर की सुरक्षा के लिए सीसीटीवी कैमरे लगाते हैं, ठीक उसी तरह अब आपकी सेहत की निगरानी के लिए भी एक क्रांतिकारी तकनीक आ गई है। भारत ने दुन ...और पढ़ें




एआई प्लेटफार्म 24 घंटे करता है देखभाल और निगरानी (Image Source: AI-Generated)


भारत ने लॉन्च किया दुनिया का पहला डॉक्टर-नेतृत्व वाला AI सिस्टम


'आइलाइव कनेक्ट' 24/7 सेहत निगरानी के लिए बायोसेंसर पैच का यूज करता है


यह AI बीमारी के शुरुआती संकेतों को पहचानकर पुनः भर्ती कम करता है


प्रेट्र, नई दिल्ली। जब आप घर से बाहर जाते हैं, तो सीसीटीवी कैमरों के जरिए अपने घर पर नजर रखते हैं, लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि अस्पताल से बाहर आने के बाद आपकी सेहत पर कौन नजर रखता है? इसी बड़ी चिंता को खत्म करने के लिए भारत ने चिकित्सा की दुनिया में एक क्रांतिकारी कदम उठाया है।


दुनिया में पहली बार, भारत ने 'डॉक्टर के नेतृत्व वाला' एक ऐसा अनोखा एआई (AI) सिस्टम लॉन्च किया है, जो अस्पताल से दूर रहने पर भी आपकी सेहत की पहरेदारी करेगा। अब आपको अपनी बीमारी से डरने की जरूरत नहीं है, क्योंकि यह नई तकनीक 24 घंटे सातों दिन एक 'अदृश्य डॉक्टर' की तरह आपका ख्याल रखेगी।




(Image Source: AI-Generated)
क्या है आइलाइव कनेक्ट और यह कैसे काम करता है?

'आइलाइव कनेक्ट' इस पूरे इकोसिस्टम का मुख्य हिस्सा है। यह एक छोटा सा वायरलेस 'बायोसेंसर पैच' है, जो एक कलाई बैंड के साथ जुड़ा होता है। इसे मरीज को पहनना होता है। यह डिवाइस लगातार शरीर की महत्वपूर्ण गतिविधियों को रिकॉर्ड करता है।
यह छोटी-सी मशीन आपके शरीर की कई अहम जांचें करती रहती है, जैसे:
हार्ट रेट और ईसीजी
सांस लेने की गति और ऑक्सीजन की मात्रा
शरीर का तापमान
ब्लड प्रेशर का उतार-चढ़ाव
शारीरिक गतिविधि और दिल की धड़कन में बदलाव
24 घंटे डॉक्टर रहते हैं तैनात

कार्डियोसर्जन और इस तकनीक के संस्थापक डॉ. राहुल चंदोला के अनुसार, यह डिवाइस मरीज का सारा डाटा वायरलेस तरीके से एक सुरक्षित 'क्लाउड प्लेटफॉर्म' पर भेजता है। वहाँ से यह जानकारी सीधे एक 'मेडिकल कमांड सेंटर' तक पहुंचती है। सबसे खास बात यह है कि इस कमांड सेंटर में विशेषज्ञ डॉक्टर 24 घंटे मौजूद रहते हैं, जो रियल-टाइम में मरीज की सेहत पर नजर रखते हैं।

बीमारी होने से पहले ही मिल जाएगी चेतावनी

पुरानी मशीनों के मुकाबले यह नई तकनीक बहुत आगे है। इसमें एआई (AI) आधारित 'पूर्वानुमानात्मक विश्लेषण' का इस्तेमाल किया गया है। इसका मतलब है कि यह सिस्टम शरीर में होने वाले उन बहुत छोटे बदलावों को भी पकड़ लेता है, जो बीमारी की शुरुआत का संकेत देते हैं।


डॉ. चंदोला बताते हैं कि कई बार बीमारी के लक्षण बाहर दिखने से पहले ही शरीर के अंदर बदलाव शुरू हो जाते हैं। यह मशीन उन्हें पकड़ लेती है, जिससे डॉक्टर समय रहते इलाज शुरू कर सकते हैं। इससे मरीज की हालत गंभीर होने से बच जाती है और उन्हें दोबारा अस्पताल में भर्ती नहीं होना पड़ता।

क्यों पड़ी इस तकनीक की जरूरत?

अक्सर देखा गया है कि मरीज के अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद घर पर उसकी निगरानी नहीं हो पाती। डॉ. चंदोला का कहना है कि ज्यादातर गंभीर मेडिकल घटनाएं अस्पताल के अंदर नहीं, बल्कि घर पर होती हैं जब मरीज बिना डॉक्टरी देखरेख के होता है। 'आइलाइव कनेक्ट' इसी कमी को पूरा करता है। यह मरीज की गिरती हुई सेहत का पहले ही पता लगा लेता है, जिससे समय पर मेडिकल मदद मिल जाती है।

अध्ययन में सामने आए चौंकाने वाले नतीजे

इस तकनीक की क्षमता को परखने के लिए एक अध्ययन किया गया। 10 सप्ताह तक चले इस कार्यक्रम में 410 से ज्यादा मरीजों के डाटा की जांच की गई। नतीजे बेहद सकारात्मक रहे:
मरीजों को दोबारा अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत में 76 प्रतिशत की कमी आई।
दिल से जुड़ी समस्याओं, ब्लड प्रेशर में गड़बड़ी और मेटाबॉलिज्म से जुड़ी बीमारियों के जोखिम को पहले ही पहचान लिया गया।
किन लोगों के लिए है सबसे ज्यादा फायदेमंद?

आइलाइव कनेक्ट की सह-संस्थापक और वरिष्ठ इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. विवेका कुमार के अनुसार, यह तकनीक उन बुजुर्गों के लिए वरदान है जो अकेले रहते हैं। इसके अलावा, पुरानी बीमारियों से जूझ रहे मरीज और हाल ही में अस्पताल से डिस्चार्ज हुए लोगों को इससे बहुत फायदा मिल रहा है। यह तकनीक एआई और डॉक्टरों की निगरानी का एक बेहतरीन मेल है, जो जान बचाने में अहम भूमिका निभा रही है।
कैंसर के इलाज में बड़ी कामयाबी: IIT बॉम्बे ने खोजा टी-सेल्स को सुरक्षित रखने का नया तरीका

कैंसर के इलाज में बड़ी कामयाबी: IIT बॉम्बे ने खोजा टी-सेल्स को सुरक्षित रखने का नया तरीका

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कैंसर के खिलाफ लड़ाई में भारतीय वैज्ञानिकों ने एक नई उम्मीद जगाई है। अक्सर इलाज के दौरान सबसे बड़ी चुनौती शरीर के रक्षक सैनिकों यानी 'इम्यून सेल्स' को ...और पढ़ें







कैंसर इलाज को और भी कारगर बनाएगी IIT बॉम्बे की यह नई तकनीक (Image Source: Freepik)


आईएएनएस, नई दिल्ली। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) बॉम्बे के शोधकर्ताओं ने कैंसर के उपचार की दिशा में एक बहुत ही महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। उन्होंने प्रयोगशाला में तैयार की गई 'इम्यून सेल्स' को सुरक्षित रूप से रिकवर करने के लिए एक बेहद सरल और प्रभावी विधि विकसित की है। यह नई तकनीक विशेष रूप से टी-सेल आधारित कैंसर उपचार के लिए बहुत मददगार साबित हो सकती है।




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क्या होती है टी-सेल थेरेपी?

कैंसर से लड़ने के लिए इम्यूनोथेरेपी, जैसे कि 'कार टी-सेल' (CAR-T) का इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रक्रिया में सबसे पहले मरीज के खून से टी-सेल्स (जो एक खास तरह की इम्यून सेल्स हैं) को निकाला जाता है। इसके बाद, प्रयोगशाला में इन सेल्स को मॉडिफाई किया जाता है और उनकी संख्या बढ़ाई जाती है। अंत में, इन शक्तिशाली सेल्स को वापस मरीज के ब्लडस्ट्रीम (रक्त प्रवाह) में डाल दिया जाता है, ताकि वे कैंसर की कोशिकाओं से लड़ सकें और उन्हें खत्म कर सकें।
सेल्स को जीवित रखना सबसे बड़ी चुनौती

चूँकि इन टी-सेल्स को शरीर के बाहर विकसित किया जाता है, इसलिए इन्हें बहुत सावधानी से इकट्ठा करना पड़ता है। यह सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है कि जब इन्हें मरीज के शरीर में वापस भेजा जाए, तो ये जीवित हों और पूरी तरह से अपना काम कर सकें। इस थेरेपी की सफलता इसी बात पर निर्भर करती है कि हम इन सेल्स को विकसित करने के बाद उन्हें सुरक्षित तरीके से वापस कैसे प्राप्त करते हैं।

शोधकर्ताओं ने क्या नया किया?

प्रोफेसर प्रकृति तयालिया और उनकी टीम ने इस चुनौती को स्वीकार किया। उन्होंने शरीर के अंदर के प्राकृतिक वातावरण की हूबहू नकल करने के लिए एक विशेष तकनीक अपनाई। टीम ने 'इलेक्ट्रोस्पिनिंग' नामक प्रक्रिया का उपयोग करके एक खास तरह का ढांचा तैयार किया, जो इन सेल्स को बेहतर तरीके से रिकवर करने में मदद करता है।


प्रोफेसर तयालिया ने इस बारे में कहा कि "सेल रिकवरी सुनने में तो बहुत आसान लगती है, लेकिन असल में यह इस प्रक्रिया की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।" उन्होंने बताया कि अगर हमारे पास पर्याप्त मात्रा में स्वस्थ कोशिकाएं नहीं होंगी, तो हम न तो उनका सही परीक्षण कर पाएंगे और न ही उनका उपयोग मरीज के इलाज के लिए कर पाएंगे। IIT बॉम्बे की यह नई खोज कैंसर उपचार को और अधिक सफल बनाने में अहम भूमिका निभाएगी।
क्या पैसे की तरह नींद भी हो सकती है जमा? क्या है अमेरिका के वायरल स्लीप बैंकिंग ट्रेंड का सच

क्या पैसे की तरह नींद भी हो सकती है जमा? क्या है अमेरिका के वायरल स्लीप बैंकिंग ट्रेंड का सच

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आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में नींद की कमी एक आम समस्या है, जिससे निपटने के लिए अमेरिका में स्लीप बैंकिंग का चलन बढ़ रहा है। इसका मतलब है कि आने वाले बि ...और पढ़ें




आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में नींद की कमी एक आम समस्या बन गई है। अक्सर हमें पता होता है कि आने वाला हफ्ता ऑफिस के काम या किसी प्लान की वजह से बहुत बिजी रहने वाला है और हमें सोने का कम समय मिलेगा। ऐसे में अमेरिका में एक दिलचस्प ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है, जिसे 'स्लीप बैंकिंग' कहा जाता है।


अपनी नींद पूरी करने और प्रोडक्टिविटी बढ़ाने के लिए लोग इस ट्रेंड को अपना रहे हैं। आइए जानें क्या है स्लीप बैंकिंग और क्या सचमुच इससे आपको फायदा मिल सकता है।
क्या है स्लीप बैंकिंग का कॉन्सेप्ट?

साधारण शब्दों में कहें तो स्लीप बैंकिंग का मतलब है, आने वाले व्यस्त दिनों की थकान से बचने के लिए पहले से ही ज्यादा नींद लेकर स्टॉक जमा करना। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर आप जानते हैं कि भविष्य में आपको कम सोने को मिलेगा, तो उससे कुछ दिन पहले एक्स्ट्रा नींद लेकर आप अपने शरीर को तैयार कर सकते हैं।
यह कॉन्सेप्ट अमेरिका के वॉल्टर रीड आर्मी इंस्टीट्यूट ऑफ रिसर्च में हुई एक स्टडी के बाद चर्चा में आया। रिसर्चर ट्रेसी रूप की टीम ने 24 सैनिकों पर स्टडी किया। इसमें पाया गया कि जिन सैनिकों ने व्यस्त दिनों से पहले ज्यादा नींद ली थी, उनकी अलर्टनेस और फोकस करने की क्षमता दूसरों के मुकाबले कहीं बेहतर रही।




(Picture Courtesy: Freepik)
रिसर्च के चौंकाने वाले नतीजे

नींद के इस बैंक को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने कई समूहों पर स्टडी की-सैनिकों पर असर- रिसर्च में एक ग्रुप को 10 घंटे और दूसरे को 7 घंटे सोने दिया गया। बाद में जब दोनों ग्रुप्स की नींद में भारी कटौती की गई, तो 10 घंटे सोने वाले सैनिक ज्यादा एनर्जेटिक और मेंटली एलर्ट पाए गए।
डॉक्टर्स और नाइट शिफ्ट- साल 2023 में मियामी के एक अस्पताल में डॉक्टर्स पर हुई स्टडी के अनुसार, नाइट शिफ्ट से पहले तीन दिन तक 90 मिनट एक्स्ट्रा सोने से उनके काम की गुणवत्ता में सुधार देखा गया।
खिलाड़ियों का परफॉर्मेंस- टेनिस, बास्केटबॉल और रग्बी के खिलाड़ियों ने जब कुछ हफ्तों तक रोज 9-10 घंटे की नींद ली, तो उनकी मैदान पर 
आप कैसे कर सकते हैं स्लीप बैंकिंग?

एक्सपर्ट्स के अनुसार, स्लीप बैंकिंग का फायदा उठाने के लिए आपको बहुत ज्यादा बदलाव करने की जरूरत नहीं है। अगर आपको लग रहा है कि आने वाले दिनों में नींद कम मिलेगी, तो-
एक या दो हफ्ते पहले से रोज 30 से 60 मिनट ज्यादा सोना शुरू करें।
इसके लिए या तो आप रात को जल्दी सो सकते हैं या सुबह थोड़ा देर से उठ सकते हैं।
दिन में छोटी झपकी लेना भी फायदेमंद है, लेकिन ध्यान रहे कि यह 45 मिनट से ज्यादा की न हो।
नींद क्यों है जरूरी?

न्यूरोलॉजिस्ट माइकल हॉवेल बताते हैं कि नींद केवल आराम के लिए नहीं है। दिनभर हमारे शरीर और दिमाग में जो कचरा बनता है, उन्हें नींद के दौरान ही साफ किया जाता है। जब दिमाग साफ रहता है, तभी वह नई चीजें सीखने और 

क्या वाकई नींद जमा हो सकती है?

हालांकि, स्लीप बैंकिंग काफी ट्रेंड कर रही है, लेकिन कुछ वैज्ञानिक इससे पूरी तरह सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि नींद को बहुत ज्यादा जमा नहीं किया जा सकता, क्योंकि अगर शरीर थका हुआ न हो, तो ज्यादा नींद नहीं ली जा सकती।
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क्या आप भी अपनी सुबह की शुरुआत एक कप गरमा-गर्म कॉफी के साथ करते हैं? अगर हां, तो आपके लिए एक बहुत अच्छी खबर है। हाल ही में हुई कई बड़ी और लंबे समय तक च ...और पढ़ें







कॉफी पीने से कम होता है डिप्रेशन का खतरा (Image Source: AI-Generated)

HIGHLIGHTS

कॉफी डिप्रेशन के जोखिम को काफी कम करती है


पार्किंसंस और डायबिटीज से बचाव में भी मददगार


कैफीन नहीं, बायोएक्टिव एंजाइम्स हैं हेल्थ बेनिफिट्स के लिए जिम्मेदार


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो कॉफी को सिर्फ 'नींद भगाने का जरिया' मानते हैं? अगर हां, तो विज्ञान के पास आपके लिए कई हैरान करने वाली जानकारियां हैं। असल में, कॉफी उम्मीद से कहीं ज्यादा खास और गुणकारी होती है।


यह सिर्फ आपको जगाए नहीं रखती, बल्कि बड़े-बड़े शोध यह साबित करते हैं कि यह आपको लंबी उम्र देने और गंभीर बीमारियों से बचाने में एक ढाल का काम करती है। यह केवल एक साधारण ड्रिंक नहीं है, बल्कि नियमित रूप से इसका सेवन आपकी मेंटल और फिजिकल हेल्थ का सबसे मजबूत साथी बन सकता है। आइए, विस्तार से जानते हैं इसके फायदों के बारे में।


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लम्बी उम्र और मानसिक शांति

रिसर्च में लगातार यह बात सामने आई है कि जो लोग नियमित रूप से कॉफी पीते हैं, उनमें असमय मृत्यु का खतरा कम होता है, लेकिन सबसे चौंकाने वाले नतीजे मेंटल हेल्थ को लेकर हैं।


आंकड़े बताते हैं कि कॉफी पीने से डिप्रेशन का खतरा 20 से 25 प्रतिशत तक कम हो सकता है (Coffee Linked to Lower Depression Risk)। इससे भी बड़ी बात यह है कि मध्यम मात्रा में कॉफी पीने वालों में आत्महत्या का जोखिम 40 से 50 प्रतिशत तक कम पाया गया है। यह लाभ तब भी देखा गया जब शोधकर्ताओं ने धूम्रपान, शराब, व्यायाम और आर्थिक स्थिति जैसे अन्य कारकों को ध्यान में रखा।




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दिमागी सेहत को भी फायदा

कॉफी हमारे दिमाग के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करती है। आपको जानकर हैरानी होगी कि नियमित कॉफी पीने से पार्किंसंस डिजीज का खतरा काफी कम हो जाता है। हालांकि, अल्जाइमर और डिमेंशिया जैसी बीमारियों पर इसका प्रभाव 'न्यूट्रल' यानी सामान्य पाया गया है। यह फर्क महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताता है कि कॉफी दिमाग के कुछ विशिष्ट हिस्सों और कार्यों को ही लाभ पहुंचाती है, न कि केवल सामान्य दावों पर आधारित है।




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शरीर और मेटाबॉलिज्म के लिए फायदे

कॉफी का असर सिर्फ दिमाग तक सीमित नहीं है। इसका सेवन कई शारीरिक बीमारियों के जोखिम को भी कम करता है, जैसे:टाइप 2 डायबिटीज
मेटाबॉलिक सिंड्रोम
दिल से जुड़ी बीमारियां
स्ट्रोक

ये फायदे शायद इसलिए होते हैं क्योंकि कॉफी इंसुलिन सिग्नलिंग को बेहतर बनाती है, शरीर में सूजन को कम करती है और माइटोकॉन्ड्रिया के काम करने की क्षमता को सुधारती है।




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सिर्फ कैफीन का नहीं है कमाल

बहुत से लोग सोचते हैं कि कॉफी का सारा असर 'कैफीन' की वजह से है, लेकिन ऐसा नहीं है। कई अध्ययनों में देखा गया है कि डिकैफ कॉफी यानी बिना कैफीन वाली कॉफी पीने से भी ये फायदे मिलते हैं।


कॉफी बायोएक्टिव कंपाउंड्स का एक कॉम्प्लेक्स कॉम्बिनेशन है। इसमें पॉलीफेनोल्स, क्लोरोजेनिक एसिड और डाइटरपेन जैसे तत्व होते हैं। ये तत्व हमारे नर्वस सिस्टम, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और Gut-Brain Axis पर पॉजिटिव असर डालते हैं।
कितनी कॉफी है सही?

बायोलॉजी में हर चीज की एक सही मात्रा होती है, और कॉफी भी इसका अपवाद नहीं है। शोध के अनुसार, दिन में लगभग 2 से 4 कप कॉफी पीना सबसे ज्यादा फायदेमंद माना गया है। यह ध्यान रखना जरूरी है कि बहुत अधिक कैफीन का सेवन कुछ लोगों में घबराहट को बढ़ा सकता है, लेकिन कुल मिलाकर अगर सही मात्रा में पी जाए, तो कॉफी के फायदे इसके नुकसान से कहीं ज्यादा हैं।
क्यों 'सीढ़ियां चढ़ना' है दुनिया की सबसे बेहतरीन एक्सरसाइज? डॉक्टर ने बताया इसे लंबी उम्र का शॉर्टकट

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क्या आप यकीन करेंगे कि कोई 10 मिनट से भी कम समय में 34 मंजिल सीढ़ियां चढ़ सकता है? बता दें, अपोलो हॉस्पिटल के सीनियर न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. सुधीर कुमार ने ...और पढ़ें






सीढ़ियां चढ़ने से सेहत को क्या-कुछ फायदे मिलते हैं? डॉक्टर ने किया खुलासा (Image Source: Freepik)


रोज सीढ़ियां चढ़ने से सेहत को कई फायदे मिल सकते हैं


डॉक्टर इस एक्सरसाइज को लंबी उम्र का रास्ता बताते हैं


हार्ट को हेल्दी रखने के लिहाज से भी सीढ़ियां चढ़ना फायदेमंद है


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। फिटनेस के लिए हम अक्सर जिम और महंगे सप्लीमेंट्स के पीछे भागते हैं, जबकि अपोलो हॉस्पिटल के सीनियर न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. सुधीर कुमार कहते हैं कि रोज 'सीढ़ियां चढ़ने' से ही आपके शरीर को कई हैरतअंगेज फायदे मिल सकते हैं। आइए जानें कैसे यह साधारण-सी दिखने वाली एक्सरसाइज आपकी सेहत के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।




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हा के लिए जबरदस्त वर्कआउट

सीढ़ियां चढ़ने के लिए आपके शरीर को मेहनत करनी पड़ती है। यह एक हाई इंटेंसिटी एक्सरसाइज है, जिससे बहुत कम समय में आपके लंग्स और हार्ट हेल्थ में सुधार होता है।
ब्रेन और मेटाबॉलिज्म को फायदा

कई लोग सीढ़ियां चढ़ने को सिर्फ पैरों की कसरत से जोड़कर देखते हैं, जो कि सही नहीं है। बता दें, सीढ़ियां चढ़ने से ब्रेन में ब्लड फ्लो बेहतर होता है। साथ ही, यह इंसुलिन सेंसिटिविटी को सुधारता है और खाना खाने के बाद ब्लड शुगर को अचानक बढ़ने से भी रोकता है।

ताकत और सहनशक्ति एक साथ

साधारण पैदल चलने की बजाय, सीढ़ियां चढ़ना एक साथ कई मांसपेशियों को टारगेट करता है। यह आपकी जांघों, हिप्स, पिंडलियों और पेट की मांसपेशियों को स्ट्रॉन्ग बनाता है। इससे एक यह ऐसी ताकत मिलती है, जो आपको रोजमर्रा के कामों में फुर्तीला बनाती है।




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हड्डियों की मजबूती

यह एक 'वेट-बेयरिंग' एक्सरसाइज है, जिसका मतलब है कि यह हड्डियों पर सकारात्मक दबाव डालती है। इससे हड्डियों का घनत्व बना रहता है और भविष्य में फैक्चर का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है।
समय की बचत

अगर आप घंटों जिम में नहीं बिता सकते, तो सीढ़ियां चुनें। केवल कुछ मिनट सीढ़ियां चढ़ना, लंबी और धीमी कसरत के बराबर कार्डियो बेनिफिट दे सकता है। यानी कम समय में ज्यादा फायदा।
कितनी सीढ़ियां चढ़ना है काफी?

हेल्दी एडल्ट्स के लिए डॉक्टर की सलाह है:हफ्ते में 3 से 5 दिन: सिर्फ 10-15 मिनट सीढ़ियां चढ़ना काफी है।
ब्रेक है जरूरी: दिन भर में अगर आप बार-बार 2-3 मंजिल भी चढ़ते हैं, तो इसका फायदा जुड़ता जाता है।
रफ्तार नहीं, नियम है जरूरी: आपको दौड़कर चढ़ने की जरूरत नहीं है; बस इसे अपनी आदत बनाएं।

सावधानी: जिन लोगों को दिल की बीमारी, घुटनों में गंभीर समस्या या बैलेंस बनाने में दिक्कत हो, उन्हें डॉक्टर की सलाह लेने के बाद ही यह शुरू करना चाहिए।
 जोड़ों में दर्द और सुबह की अकड़न को न करें नजरअंदाज, हो सकता है आर्थराइटिस; डॉक्टर ने बताए बचाव के तरीके

जोड़ों में दर्द और सुबह की अकड़न को न करें नजरअंदाज, हो सकता है आर्थराइटिस; डॉक्टर ने बताए बचाव के तरीके

जोड़ों में दर्द और सुबह की अकड़न को न करें नजरअंदाज, हो सकता है आर्थराइटिस; डॉक्टर ने बताए बचाव के तरीके


रूमेटॉइड आर्थराइटिस जोड़ों के दर्द, सूजन और जलन पैदा करने के साथ शरीर के अन्य हिस्सों को भी नुकसान पहुंचा सकती है। यह एक आटो इम्यून विकार हैं, लेकिन स ...और पढ़ें







कैसे होते हैं रूमेटॉइड आर्थराइटिस के लक्षण? (Picture Courtesy: Freepik)

HIGHLIGHTS

रूमेटॉइड आर्थराइटिस एक ऑटो इम्यून डिजीज है


इसके कारण जोड़ों में दर्द और अकड़न की समस्या हो सकती है


आर्थराइटिस की समस्या को नियंत्रित करने के लिए सही लाइफस्टाइल जरूरी है


सीमा झा, नई दिल्ली। क्या आपको भी सुबह उठने के बाद घुटने और जोड़ों में दर्द या अकड़न रहती है। क्या आप दिनभर थकान महसूस करते हैं और आपको भूख कम लगती है। अगर ऐसा है तो ये आर्थराइटिस के लक्षण हो सकते हैं। इसमें कभी-कभी बुखार भी हो सकता है।


यदि समय रहते इन लक्षणों का निदान नहीं हुआ, तो वह हाथों-पैरों, कोहनी, कूल्हे, घुटने समेत अनेक जोड़ों के लिए मुसीबत बन सकता है। अक्सर किसी भी बीमारी की शुरुआत में लोग थकान या दर्द को हल्का लक्षण मानकर अनदेखा कर देते हैं। समय बीतने के बाद बीमारी विकृत रूप ले लेती है।


कैसा हो खानपान?साल्मन, टूना अदि मछलियां सूजन नियंत्रित करने में मदद कर सकती हैं।
फलों सब्जियों का सेवन भी सूजन कम करता है। इनमें मटर और बस फैट रहित होते हैं। इनमें एंटीआक्सीडेंट्स, फैलिक एसिड, मैग्नीशियम, आयरन और जिंक भी पाए जाते हैं।
रिफाइंड अनाज की तुलना में साबुत अनाज का इस्तेमाल ज्यादा करना चाहिए। इनमें पोषक तत्त्व और फाइबर की मात्रा अधिक होती है
लेबल पढ़कर ही ब्रेड, अनाज और अन्य खाने का सामान खरीदना चाहिए।

सूजन बढ़ाने वाले आहार से बचें अधिक तले-भुने ग्रिल्ड आहार।
चीनी और रिफाइंड कार्ब्स।
अधिक मात्रा में डेरी उत्पाद
शराब व तंबाकू का सेवन
नमक व प्रिजर्वेटिव वाले खाद्य पदार्थ आदि।
इन बातों का रहे ध्यानअगर दर्द हो तो भी शरीरिक सक्रियता बनाकर रखनी चाहिए। हाथों-पैरों को चलाते रहना चाहिए।
योग और ध्यान से सूजन कम करने में मदद मिलती है।
प्रदूषण में बाहर निकलने से परहेज करें, मास्क का प्रयोग करें।
नींद से समझौता न हो, इसका ध्यान रहे। खराब नींद से मोटापा, अवसाद जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।
अगर आप लगातार तनाव में रहते हैं, तो यह रोग को और बढ़ा सकता है, यह ध्यान रखें।
पुरुषों की तुलना में यह बीमारी महिलाओं में ज्यादा पाई जाती है।
अपनाएं स्वस्थ जीवन शैली

डॉ. उमा कुमार (प्रोफेसर एवं विभागाध्या, रुमेटोलॉजी, एम्स, नई दिल्ली) रूमेटॉइड आर्थराइटिस एक आटोइम्यून बीमारी है। यह तेजी से बढ़ रही है। इसके लिए पर्यावरण व जीवनशैली भी जिम्मेदार है। किसी भी बीमारी का 30 से 40 प्रतिशत कारक जीन होता है, शेष बाहरी कारण होते हैं।


स्वस्थ शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली ऊतकों और कोशिकाओं पर हमला करने वाले वायरस, बैक्टीरिया आदि बचाव करती है, लेकिन बाहरी कारकों के प्रभाव में आकर जब इन कोशिकाओं में मौजूद प्रोटीन के स्वरूप में बदलाव होता है तो प्रतिरक्षा प्रणाली अपने ही शरीर की कोशिकाओं को नष्ट करने लगती है।


इससे शरीर में सूजन उत्पन्न होने लगता है और आटोइम्यून बीमारियां पैदा होती हैं। वायु प्रदूषण, केमिकल पेस्टिसाइड, खराब खानपान आदि की इसमें बड़ी भूमिका है। बेहतर जीवनशैली से ही आर्थराइटिस जैसी बीमारी से बचाव संभव है।
सर्दी में गर्माहट के लिए आप भी जलाते हैं लकड़ी? जानें कैसे समय से पहले मौत की वजह बन रहा इसका धुआं

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सर्दियों के मौसम में अलाव या घर में लकड़ी जलाकर गर्मी हासिल करना बहुत सुकून भरा लगता है, लेकिन एक नई रिसर्च ने इसे लेकर गंभीर चेतावनी जारी की है। साइं ...और पढ़ें






लकड़ी का धुआं बढ़ा रहा है हार्ट अटैक और समय से पहले मौत का खतरा (Image Source: AI-Generated)



लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। ठंड की ठिठुरती रातों में अलाव या अंगीठी के पास बैठकर गर्मी लेना किसे अच्छा नहीं लगता? लेकिन क्या आपको मालूम है कि जिसे आप सुकून का जरिया मानते हैं, वह असल में एक 'साइलेंट किलर' साबित हो रहा है?


एक नए अध्ययन में यह बात सामने आई है कि घर में जलने वाली लकड़ी सिर्फ धुआं ही नहीं फैला रही, बल्कि यह हजारों लोगों की समय से पहले मौत का कारण भी बन रही है। आइए, इस आर्टिकल में विस्तार से जानते हैं इस बारे में।





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सर्दियों में प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण

नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए इस अध्ययन में पाया गया है कि सर्दियों के दौरान हवा में मौजूद PM2.5 प्रदूषण का लगभग 22 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ घरों में लकड़ी जलाने से आता है। इसका मतलब है कि ठंड के महीनों में यह महीन कणों वाले प्रदूषण का सबसे बड़ा सिंगल सोर्स है।

दिल की बीमारियों का खतरा

शोधकर्ताओं ने पाया कि लकड़ी जलाने से निकलने वाला धुआं हवा में महीन कणों की मात्रा को बढ़ा देता है। यह सीधे तौर पर दिल से जुड़ी बीमारियों (Cardiovascular Diseases) के खतरे को बढ़ाता है।


नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर डैनियल हॉर्टन का कहना है, "हम अक्सर जंगल की आग के धुएं के बुरे प्रभावों के बारे में सुनते हैं, लेकिन हम अपने घरों में गर्मी के लिए लकड़ी जलाने के परिणामों पर ज्यादा ध्यान नहीं देते।"




(Image Source: AI-Generated)
हर साल हो रहीं हजारों मौतें

स्टडी के मॉडल से पता चला है कि अमेरिका में आवासीय लकड़ी जलाने से होने वाला प्रदूषण हर साल लगभग 8,600 समय से पहले होने वाली मौतों से जुड़ा हुआ है। यह आंकड़ा बताता है कि यह समस्या कितनी गंभीर हो सकती है।


शहरों और उपनगरों पर असर लकड़ी जलाने का असर सिर्फ उसी घर तक सीमित नहीं रहता जहां वह जलाई जा रही है। शोधकर्ताओं ने एक हाई-रेजोल्यूशन मॉडल का उपयोग किया जिसमें मौसम, हवा, तापमान और इलाके की बनावट को शामिल किया गया था।


उन्होंने पाया कि:लकड़ी जलाने से निकलने वाला धुआं उपनगरों से बहकर घनी आबादी वाले शहरी इलाकों में चला जाता है।
भले ही शहर के मुख्य इलाकों में लकड़ी कम जलाई जाती हो, लेकिन हवा के साथ आने वाला धुआं वहां की हवा को भी जहरीला बना देता है।
गर्म जलवायु वाले शहरों में भी ठंड के दौरान या मजे के लिए जलाई गई लकड़ी प्रदूषण फैलाती है।
क्या है समाधान?

अच्छी बात यह है कि इस समस्या का समाधान भी मुमकिन है। प्रोफेसर हॉर्टन के अनुसार, बहुत कम घर ही गर्मी के लिए पूरी तरह लकड़ी पर निर्भर होते हैं। इसलिए, अगर हम लकड़ी जलाने वाले चूल्हों या अंगीठियों की जगह घर को गर्म करने के लिए स्वच्छ उपकरणों या बिना जलने वाले स्रोतों का इस्तेमाल करें, तो हवा की गुणवत्ता में भारी सुधार हो सकता है।


शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि लकड़ी के स्टोव, बॉयलर और फायरप्लेस की जगह मॉडर्न हीटिंग टूल्स को अपनाना चाहिए। यह छोटा-सा बदलाव हवा में खतरनाक कणों को कम करने में बड़ी भूमिका निभा सकता है।
सर्दियों की ये 5 सब्जियां हैं 'कैंसर की दुश्मन', न्यूट्रिशनिस्ट ने कहा- शरीर को अंदर से करती हैं साफ

सर्दियों की ये 5 सब्जियां हैं 'कैंसर की दुश्मन', न्यूट्रिशनिस्ट ने कहा- शरीर को अंदर से करती हैं साफ

सर्दियों की ये 5 सब्जियां हैं 'कैंसर की दुश्मन', न्यूट्रिशनिस्ट ने कहा- शरीर को अंदर से करती हैं साफ



न्यूट्रिशनिस्ट शिल्पी अरोड़ा ने सर्दियों की 5 ऐसी सब्जियों के बारे में बताया है जो सेहत के लिए बेहद फायदेमंद हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि ये सब्जिया ...और पढ़ें







कैंसर से बचाव और बॉडी क्लींजिंग में फायदेमंद हैं ये 5 सब्जियां (Image Source: AI-Generated)



न्यूट्रिशनिस्ट ने बताईं कैंसर से लड़ने वाली 5 सर्दियों की सब्जियां


काली गाजर, शकरकंद और बथुआ शरीर को अंदर से साफ करते हैं


ये सब्जियां इम्युनिटी मजबूत कर गंभीर बीमारियों से बचा सकती हैं


 सर्दियों का मौसम अपने साथ कई तरह की बीमारियों का खतरा लेकर आता है, लेकिन कुदरत ने हमें इस मौसम में कुछ ऐसी बेहतरीन सब्जियां भी दी हैं जो हमारी सेहत की ढाल बन सकती हैं।


न्यूट्रिशनिस्ट शिल्पी अरोड़ा की मानें, तो सर्दियों में आने वाली कुछ खास सब्जियां न सिर्फ स्वाद में बेहतरीन होती हैं, बल्कि ये शरीर को डिटॉक्स करने और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से लड़ने में भी मदद करती हैं। आइए जानते हैं ऐसी 5 सब्जियों (Anti-Cancer Foods) के बारे में।



काली गाजर

सर्दियों में बाजार में दिखने वाली काली गाजर को साधारण समझने की भूल न करें। न्यूट्रिशनिस्ट इसे सेहत के लिए बेहद फायदेमंद मानती हैं। यह सब्जी शरीर को अंदर से साफ करने में मदद करती है और इसे 'कैंसर का दुश्मन' माना जाता है। इसका गहरा रंग इसमें मौजूद शक्तिशाली गुणों को दर्शाता है जो आपकी इम्युनिटी को मजबूत बनाता है।

लाल मिर्च

भारतीय खाने में स्वाद का तड़का लगाने वाली लाल मिर्च सिर्फ तीखापन ही नहीं बढ़ाती, बल्कि सेहत को भी फायदा पहुंचाती है। डॉ. शिल्पी के मुताबिक, लाल मिर्च में ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो शरीर को बीमारियों से लड़ने की ताकत देते हैं। सर्दियों में इसका सही मात्रा में सेवन शरीर को गर्म रखने और टॉक्सिन्स को बाहर निकालने में मददगार हो सकता है।

शकरकंद

सर्दियों की धूप में शकरकंद खाने का मजा ही अलग है। यह न केवल खाने में मीठा और स्वादिष्ट होता है, बल्कि न्यूट्रिशनिस्ट इसे कैंसर से बचाव के लिए एक बेहतरीन सुपरफूड बता रही हैं। यह शरीर की गंदगी को साफ करने और ऊर्जा बनाए रखने के लिए एक शानदार ऑप्शन है।
कद्दू

कद्दू एक ऐसी सब्जी है जिसे अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन इसके फायदे आपको चौंका देंगे। यह सब्जी शरीर को अंदर से डिटॉक्स करने में बहुत कारगर है। न्यूट्रिशनिस्ट्स की राय में, कद्दू का सेवन कैंसर जैसी बीमारियों के खतरे को कम करने में मददगार हो सकता है। इसे सूप या सब्जी के रूप में अपनी डाइट का हिस्सा जरूर बनाएं।

बथुआ का साग

सर्दियों में हरी पत्तेदार सब्जियों का राजा 'बथुआ' है। बथुआ का साग शरीर को प्राकृतिक रूप से साफ करने का काम करता है। यह उन 5 खास सब्जियों में शामिल है जिन्हें कैंसर से लड़ने में मददगार बताया गया है। सर्दियों में बथुआ का सेवन करना पाचन और ओवरऑल हेल्थ के लिए अमृत समान है।


अगर आप इस सर्दी में खुद को हेल्दी रखना चाहते हैं और गंभीर बीमारियों से बचना चाहते हैं, तो इन 5 चीजों को अपनी थाली में जगह जरूर दें। न्यूट्रिशनिस्ट की सलाह है कि शरीर की अंदरूनी सफाई और बेहतर सेहत के लिए ये सब्जियां कुदरत का अनमोल तोहफा हैं।
डिमेंशिया को न्योता देती हैं ये 3 आदतें, एम्स न्यूरोलॉजिस्ट की सलाह- आज ही इनसे बना लें दूरी

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क्या आप जानते हैं आपकी ही कुछ आदतें आपके दिमाग को उम्र से पहले बूढ़ा बना रही हैं? जी हां, हमारी मॉडर्न लाइफस्टाइल में हम अनजाने में ही ऐसी कई आदतें अप ...और पढ़ें






डिमेंशिया का खतरा बढ़ाती हैं ये आदतें (Picture Courtesy: Freepik)


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। यह सच है कि उम्र बढ़ने के साथ याददाश्त का कम होना या शरीर में कंपन महसूस होना सामान्य माना जाता था। लेकिन एक सच यह भी है कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में डिमेंशिया और पार्किंसंस जैसी बीमारियां समय से पहले दस्तक दे रही हैं।


ये दोनों ही बीमारियां हमारे दिमाग की काम करने की क्षमता को प्रभावित करती हैं। इसके पीछे डॉक्टरों का मानना है कि जेनेटिक्स के अलावा हमारी लाइफस्टाइल भी इन बीमारियों को न्योता देने में बड़ी भूमिका निभाती है। इसलिए अगर आप अपने दिमाग को बुढ़ापे तक स्वस्थ रखना चाहते हैं, तो एम्स की न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. प्रियंका सहरावत बताती हैं कि तीन आदतों को आज ही छोड़ना जरूरी है। ये तीन आदतें कौन-सी हैं आइए जानें।



7-8 घंटे से कम की नींद लेना

नींद केवल शरीर की थकान मिटाने के लिए नहीं, बल्कि दिमाग की सफाई के लिए भी जरूरी है। जब हम सोते हैं, तो हमारा दिमाग 'ग्लाइम्फैटिक सिस्टम' के जरिए टॉक्सिन्स को बाहर निकालता है। इनमें एमिलॉयड-बीटा प्रोटीन भी शामिल है, जिसका सीधा संबंध अल्जाइमर और डिमेंशिया से है।


इसलिए जो लोग नियमित रूप से 6 घंटे से कम सोते हैं, उनके दिमाग में हानिकारक प्रोटीन जमा होने लगते हैं, जो ब्रेन सेल्स को नष्ट कर देते हैं। पूरी नींद के लिए रात को एक ही समय पर सोने की आदत डालें और सोने से 1-2 घंटा पहले मोबाइल का इस्तेमाल बंद कर दें।


ब्रेकफास्ट स्किप करना

सुबह का नाश्ता हमारे दिमाग के लिए फ्यूल की तरह काम करता है। रात भर की फास्टिंग के बाद, दिमाग को ग्लूकोज की जरूरत होती है ताकि वह अपना काम सही से कर सके। इसलिए लोग नाश्ता नहीं करते, उनमें पोषक तत्वों की कमी हो जाती है जिससे 'ब्रेन एट्रोफी' यानी दिमाग के सिकुड़ने का खतरा बढ़ जाता है। यह डिमेंशिया की शुरुआत हो सकती है।

ऐसे में जरूरी है कि आप अपने नाश्ते में ओमेगा-3 फैटी एसिड, नट्स और ताजे फल शामिल करें। ये दिमाग के सेल्स की मरम्मत में मदद करते हैं।

एक्सरसाइज न करना

शरीर की सुस्ती दिमाग की सुस्ती का कारण बनती है। एक्सरसाइज करने से शरीर में ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है, जिससे दिमाग को भरपूर ऑक्सीजन और पोषक तत्व मिलते हैं। लेकिन एक्सरसाइज की कमी से मोटापे और हाई ब्लड प्रेशर का खतरा बढ़ता है, जो पार्किंसंस और डिमेंशिया के दो बड़े रिस्क फैक्टर्स हैं। शारीरिक रूप से एक्टिव न रहने पर दिमाग में डोपामाइन का स्तर गिर सकता है, जो पार्किंसंस की मुख्य वजह है। इसलिए रोजाना कम से कम 30 मिनट की ब्रिस्क वॉकिंग, योग या कोई भी एक्सरसाइज जरूर करें।
क्या होगा अगर रोज सुबह चाय की जगह पिएंगे एक गिलास संतरे का जूस? फायदे देख, खुद भी चौंक जाएंगे आप

क्या होगा अगर रोज सुबह चाय की जगह पिएंगे एक गिलास संतरे का जूस? फायदे देख, खुद भी चौंक जाएंगे आप

क्या होगा अगर रोज सुबह चाय की जगह पिएंगे एक गिलास संतरे का जूस? फायदे देख, खुद भी चौंक जाएंगे आप


क्या आप जानते हैं अगर आप एक महीने तक रोज सुबह चाय की जगह ऑरेंज जूस पिएंगे, तो आपकी सेहत में क्या बदलाव होंगे? आपको बता दें, संतरे का जूस विटामिन-सी का ...और पढ़ें






क्या होगा अगर 30 दिनों तक रोज पिएंगे संतरे का जूस? (Picture Courtesy: Freepik)




सुबह की चाय की जगह ऑरेंज जूस पीने से सेहत में काफी सुधार हो सकता है


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। ज्यादातर भारतीय अपनी सुबह की शुरुआत गर्मागर्म चाय से करते हैं। लेकिन सुबह-सुबह खाली पेट चाय पीने की आदत सेहत के लिहाज से बहुत अच्छी नहीं है। ऐसे में अगर आप सुबह की शुरुआत एक गिलास ऑरेंज जूस (Orang Juice in Morning Benefits) से करें, तो जानते हैं आपके शरीर में कैसे बदलाव हो सकते हैं?


सुबह-सुबह विटामिन-सी से भरपूर ऑरेंज जूस पीने से आपके शरीर में कई कमाल के बदलाव हो सकते हैं। आइए जानें 30 दिनों तक रोज सुबह संतरे का जूस पीने से आपके शरीर में कैसे बदलाव (Benefits of Drinking Orange Juice) दिखाई दे सकते हैं।

विटामिन-सी का पावर हाउस

चाय में कैफीन और टैनिन होता है, जबकि संतरे का जूस विटामिन-सी, फोलेट और पोटेशियम का भंडार है। एक महीने तक रोज ऑरेंज जूस पीने से आपका इम्यून सिस्टम काफी मजबूत हो जाएगा। आप महसूस करेंगे कि आपको मौसमी सर्दी-खांसी और थकान कम हो रही है। विटामिन-सी शरीर में व्हाइट ब्लड सेल्स बनाने में मदद करता है, जो बीमारियों से लड़ने में मदद करते हैं।







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त्वचा में प्राकृतिक चमक

चाय कभी-कभी डिहाइड्रेशन का कारण बनता है, जिससे त्वचा बेजान दिख सकती है। वहीं, संतरे के जूस में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स और पानी की मात्रा आपकी त्वचा को अंदर से हाइड्रेट करती है। विटामिन-सी कोलेजन बनाने में मददगार है, जो झुर्रियों को कम करता है और त्वचा को जवां और चमकदार बनाता है।

पाचन तंत्र में सुधार

सुबह खाली पेट दूध वाली चाय पीने से कई लोगों को एसिडिटी या ब्लोटिंग की समस्या होती है। संतरा फाइबर से भरपूर होता है, जो पाचन क्रिया को दुरुस्त करता है। यह शरीर को डिटॉक्स करने और कब्ज जैसी समस्याओं से राहत दिलाने में मदद करता है। हालांकि, अगर आपको बहुत ज्यादा एसिडिटी रहती है, तो इसे खाली पेट लेने से पहले थोड़ा सावधान रहना चाहिए।

एनर्जी लेवल में बदलाव

चाय पीने से आपको कैफीन की वजह से तुरंत किक मिलती है, लेकिन वह उतनी ही जल्दी खत्म भी हो जाती है। संतरा नेचुरल शुगर से भरपूर होता है, जो धीरे-धीरे एनर्जी रिलीज करता है। इससे आप दोपहर तक खुद को ज्यादा एक्टिव और एनर्जेटिक महसूस करेंगे।

इन बातों का जरूर ध्यान रखेंचीनी न मिलाएं- बाजार के डिब्बाबंद जूस की जगह घर का निकला ताजा जूस पिएं। डिब्बाबंद जूस में एडेड शुगर होती है जो फायदे की जगह नुकसान कर सकती है।
दांतों का ख्याल- संतरे के रस में साइट्रिक एसिड होता है, जो दांतों के इनेमल को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए जूस पीने के तुरंत बाद सादे पानी से कुल्ला जरूर करें।
अब तक अनार के छिलके फेंकते आए हैं? इसकी चाय के फायदे जान लेंगे, तो आज से ही जमा करना शुरू कर देंगे

अब तक अनार के छिलके फेंकते आए हैं? इसकी चाय के फायदे जान लेंगे, तो आज से ही जमा करना शुरू कर देंगे

अब तक अनार के छिलके फेंकते आए हैं? इसकी चाय के फायदे जान लेंगे, तो आज से ही जमा करना शुरू कर देंगे


अनार के छिलके जितने साधारण लगते हैं, उतने ही औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं। इनसे बनी चाय शरीर को अंदर से डिटॉक्स करती है और कई बीमारियों से बचाती है। ...और पढ़ें





अनार को अक्सर उसके मीठे दानों के लिए खाया जाता है, लेकिन इसके छिलकों में भी भरपूर औषधीय गुण पाए जाते हैं। आयुर्वेद और आधुनिक रिसर्च दोनों ही बताते हैं कि अनार के छिलकों में एंटीऑक्सीडेंट्स, विटामिन और मिनरल्स मौजूद होते हैं जो सेहत को कई तरीकों से फायदा पहुंचाते हैं।


इन छिलकों से बनी चाय न सिर्फ टेस्टी होती है बल्कि शरीर को डिटॉक्स करने, इम्युनिटी बढ़ाने और कई बीमारियों से बचाने में मदद करती है।तो आइए जानते हैं हफ्ते में कम से कम दो बार अनार के छिलकों की चाय क्यों पीनी चाहिए और इसे बनाने की सही विधि के बारे में-

अनार के छिलकों की चाय पीने के 5 बड़े फायदे
डाइजेस्टिव सिस्टम को मजबूत बनाती है

अनार के छिलकों में मौजूद टैनिन्स और पॉलीफेनॉल्स गैस, अपच और डायरिया जैसी प्रॉब्लम्स से राहत दिलाते हैं। यह पेट की अंदरूनी लेयर को शांत करता है और हेल्दी डाइजेशन को बढ़ावा देता है।

इम्युनिटी बूस्टर

इस चाय में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स और विटामिन सी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाते हैं। नियमित सेवन से सर्दी-जुकाम, गले की खराश और इन्फेक्शन से बचाव होता है।
हार्ट को हेल्दी रखती है

अनार के छिलकों में फ्लेवोनॉयड्स और एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं जो कोलेस्ट्रॉल लेवल को कंट्रोल में रखते हैं और ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर बनाते हैं। इससे दिल की बीमारियों का खतरा कम होता है।
वेट लॉस करने में मददगार

इस चाय को पीने से मेटाबॉलिज्म तेज होता है और शरीर से टॉक्सिन्स बाहर निकलते हैं। यह भूख को संतुलित करती है और फैट बर्न करने में मदद करती है, जिससे धीरे-धीरे वजन कम होता है

स्किन और बालों के लिए फायदेमंद

अनार के छिलकों में एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-फंगल गुण होते हैं जो स्किन इन्फेक्शन और मुंहासों से बचाते हैं। साथ ही इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स झुर्रियों और समय से पहले बूढ़ेपन को रोकते हैं। बालों के लिए भी यह जड़ों को मजबूत बनाता है।

अनार के छिलकों की चाय बनाने की विधि

इंग्रीडिएंट्स अनार के सूखे छिलके– 2 चम्मच
पानी– 2 कप
शहद या नींबू– स्वादानुसार

बनाने का तरीका

सबसे पहले अनार के छिलकों को अच्छी तरह धोकर धूप में सुखा लें। सूख जाने के बाद इन्हें पीसकर पाउडर बना लें और एयरटाइट डिब्बे में रख लें। चाय बनाने के लिए एक पैन में 2 कप पानी डालें और उबालें। इसमें 2 चम्मच अनार के छिलकों का पाउडर डालकर 5–7 मिनट तक उबालें। गैस बंद कर इसे छान लें और चाहें तो शहद या नींबू मिलाकर गुनगुना पीएं।

खाने का सही तरीका

एक्सपर्ट के अनुसार हफ्ते में दो से तीन बार इस चाय का सेवन करना फायदेमंद होता है। इसे सुबह खाली पेट या शाम को हल्के नाश्ते के बाद पीना बेहतर रहता है।