Showing posts with label Health. Show all posts
Showing posts with label Health. Show all posts
अब तक अनार के छिलके फेंकते आए हैं? इसकी चाय के फायदे जान लेंगे, तो आज से ही जमा करना शुरू कर देंगे

अब तक अनार के छिलके फेंकते आए हैं? इसकी चाय के फायदे जान लेंगे, तो आज से ही जमा करना शुरू कर देंगे

अब तक अनार के छिलके फेंकते आए हैं? इसकी चाय के फायदे जान लेंगे, तो आज से ही जमा करना शुरू कर देंगे


अनार के छिलके जितने साधारण लगते हैं, उतने ही औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं। इनसे बनी चाय शरीर को अंदर से डिटॉक्स करती है और कई बीमारियों से बचाती है। ...और पढ़ें





अनार को अक्सर उसके मीठे दानों के लिए खाया जाता है, लेकिन इसके छिलकों में भी भरपूर औषधीय गुण पाए जाते हैं। आयुर्वेद और आधुनिक रिसर्च दोनों ही बताते हैं कि अनार के छिलकों में एंटीऑक्सीडेंट्स, विटामिन और मिनरल्स मौजूद होते हैं जो सेहत को कई तरीकों से फायदा पहुंचाते हैं।


इन छिलकों से बनी चाय न सिर्फ टेस्टी होती है बल्कि शरीर को डिटॉक्स करने, इम्युनिटी बढ़ाने और कई बीमारियों से बचाने में मदद करती है।तो आइए जानते हैं हफ्ते में कम से कम दो बार अनार के छिलकों की चाय क्यों पीनी चाहिए और इसे बनाने की सही विधि के बारे में-

अनार के छिलकों की चाय पीने के 5 बड़े फायदे
डाइजेस्टिव सिस्टम को मजबूत बनाती है

अनार के छिलकों में मौजूद टैनिन्स और पॉलीफेनॉल्स गैस, अपच और डायरिया जैसी प्रॉब्लम्स से राहत दिलाते हैं। यह पेट की अंदरूनी लेयर को शांत करता है और हेल्दी डाइजेशन को बढ़ावा देता है।

इम्युनिटी बूस्टर

इस चाय में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स और विटामिन सी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाते हैं। नियमित सेवन से सर्दी-जुकाम, गले की खराश और इन्फेक्शन से बचाव होता है।
हार्ट को हेल्दी रखती है

अनार के छिलकों में फ्लेवोनॉयड्स और एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं जो कोलेस्ट्रॉल लेवल को कंट्रोल में रखते हैं और ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर बनाते हैं। इससे दिल की बीमारियों का खतरा कम होता है।
वेट लॉस करने में मददगार

इस चाय को पीने से मेटाबॉलिज्म तेज होता है और शरीर से टॉक्सिन्स बाहर निकलते हैं। यह भूख को संतुलित करती है और फैट बर्न करने में मदद करती है, जिससे धीरे-धीरे वजन कम होता है

स्किन और बालों के लिए फायदेमंद

अनार के छिलकों में एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-फंगल गुण होते हैं जो स्किन इन्फेक्शन और मुंहासों से बचाते हैं। साथ ही इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स झुर्रियों और समय से पहले बूढ़ेपन को रोकते हैं। बालों के लिए भी यह जड़ों को मजबूत बनाता है।

अनार के छिलकों की चाय बनाने की विधि

इंग्रीडिएंट्स अनार के सूखे छिलके– 2 चम्मच
पानी– 2 कप
शहद या नींबू– स्वादानुसार

बनाने का तरीका

सबसे पहले अनार के छिलकों को अच्छी तरह धोकर धूप में सुखा लें। सूख जाने के बाद इन्हें पीसकर पाउडर बना लें और एयरटाइट डिब्बे में रख लें। चाय बनाने के लिए एक पैन में 2 कप पानी डालें और उबालें। इसमें 2 चम्मच अनार के छिलकों का पाउडर डालकर 5–7 मिनट तक उबालें। गैस बंद कर इसे छान लें और चाहें तो शहद या नींबू मिलाकर गुनगुना पीएं।

खाने का सही तरीका

एक्सपर्ट के अनुसार हफ्ते में दो से तीन बार इस चाय का सेवन करना फायदेमंद होता है। इसे सुबह खाली पेट या शाम को हल्के नाश्ते के बाद पीना बेहतर रहता है।
रात 2 बजे बच्चे को चढ़ जाए तेज बुखार, तो घबराएं नहीं; डॉक्टर की यह सलाह आएगी काम

रात 2 बजे बच्चे को चढ़ जाए तेज बुखार, तो घबराएं नहीं; डॉक्टर की यह सलाह आएगी काम

रात 2 बजे बच्चे को चढ़ जाए तेज बुखार, तो घबराएं नहीं; डॉक्टर की यह सलाह आएगी काम



अक्सर ऐसा होता है कि रात के करीब 2 बजे, अचानक बच्चे को तेज बुखार आ जाता है। ऐसे समय में माता-पिता का घबराना स्वाभाविक है, लेकिन सही जानकारी से आप स्थि ...और पढ़ें







आधी रात को बच्चे को बुखार आए, तो पैनिक होने के बजाय करें ये काम (Image Source: AI-Generated)



बुखार कम करने का प्रभावी तरीका है गुनगुने पानी से स्पॉन्जिंग


माथे, गर्दन, बगल और जांघों पर विशेष ध्यान दें


ठंडे पानी से बचें; बुखार कम होने पर ढीले कपड़े पहनाएं


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। सोचिए रात के 2 बजे हैं, चारों तरफ सन्नाटा है और अचानक आपको महसूस होता है कि आपके बच्चे का शरीर बुखार से तप रहा है। ऐसे वक्त में, जब डॉक्टर उपलब्ध न हों, तो खासतौर से न्यू पेरेंट्स अक्सर घबरा जाते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपके घर में मौजूद सिर्फ थोड़ा-सा पानी और सूती कपड़ा इस मुश्किल स्थिति को संभाल सकता है?


जी हां, रेडिक्स हेल्थकेयर, निर्माण विहार, दिल्ली के चेयरमैन और वरिष्ठ सलाहकार बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. रवि मलिक की मानें, तो बच्चे का बुखार तेज हो, तो 'स्पॉन्जिंग' तापमान को नीचे लाने का सबसे असरदार तरीका है। आइए जानते हैं इसे सही तरीके से कैसे करें।


स्पॉन्जिंग करने का सही तरीका

बुखार उतारने के लिए सबसे पहले एक कटोरे में गुनगुना पानी लें। ध्यान रहे, पानी बहुत ठंडा नहीं होना चाहिए। इस पानी में एक साफ कपड़ा भिगोएं और इन स्टेप्स को फॉलो करें:माथे से करें शुरुआत: सबसे पहले भीगे हुए कपड़े से बच्चे का माथा पोंछें।
गर्दन की सफाई: इसके बाद बच्चे की गर्दन को पोंछें।
सबसे जरूरी जगहें: गर्दन के बाद बच्चे की बगलों और जांघों पर स्पॉन्जिंग करें। यह स्टेप सबसे जरूरी है क्योंकि शरीर में सबसे ज्यादा गर्मी यहीं से पैदा होती है।
हाथ और पैर: आखिर में, बच्चे के हाथों और पैरों को अच्छी तरह से स्पॉन्जिंग करें।
कब बदलें पानी?

स्पॉन्जिंग के दौरान कपड़े को बार-बार पानी में डुबोते रहें। जैसे ही कटोरे का पानी बच्चे के शरीर की गर्मी से गर्म हो जाए, उसे तुरंत बदल दें और ताजा गुनगुना पानी लें। यह प्रक्रिया तब तक दोहराते रहें जब तक कि बच्चे का शरीर का तापमान कम न हो जाए। जैसे ही तापमान नीचे आए, स्पॉन्जिंग बंद कर दें।

क्या सावधानियां रखें?

इस प्रक्रिया के दौरान कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है:कभी भी बर्फ वाले ठंडे पानी का इस्तेमाल न करें।
अगर किसी भी समय बच्चे को बहुत ज्यादा असुविधा महसूस हो, तो स्पॉन्जिंग तुरंत रोक दें और चिकित्सकीय सलाह लें।
बुखार कम होने के बाद क्या करें?

जब बच्चे का तापमान कम हो जाए और आप स्पॉन्जिंग बंद कर दें, तो बच्चे के शरीर को एक अच्छे सूती तौलिये से पोंछकर सुखा लें। इसके बाद बच्चे को हल्के और ढीले-ढाले सूती कपड़े पहनाएं, ताकि शरीर को हवा लगती रहे।
एंटीबायोटिक कोर्स के बाद क्यों खराब हो जाता है पेट? डॉक्टर ने समझाई वजह और बचाव के तरीके

एंटीबायोटिक कोर्स के बाद क्यों खराब हो जाता है पेट? डॉक्टर ने समझाई वजह और बचाव के तरीके

एंटीबायोटिक कोर्स के बाद क्यों खराब हो जाता है पेट? डॉक्टर ने समझाई वजह और बचाव के तरीके


क्या आपने कभी सोचा है कि इन्फेक्शन से लड़ने वाली जो दवा आपकी जान बचाती है, वही आपके शरीर के अंदर क्या उथल-पुथल मचा सकती है? एंटीबायोटिक्स ने बेशक मॉडर् ...और पढ़ें






एंटीबायोटिक्स ने बैक्टीरिया से होने वाले संक्रमणों से लड़कर अनगिनत जानें बचाई हैं, लेकिन इनका इस्तेमाल कभी-कभी हमारे शरीर, खासकर हमारी गट हेल्थ के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है।

डॉ. अमरीश साहनी (एसोसिएट डायरेक्टर, इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड डाइजेस्टिव डिजीज, बीएलके-मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल) बताते हैं कि हमारे पेट में ट्रिलियंस बैक्टीरिया, वायरस और फंगी रहते हैं, जिन्हें 'गट माइक्रोबायोम' कहा जाता है। यह पाचन, इम्युनिटी, विटामिन बनाने और यहां तक कि मेंटल हेल्थ के लिए भी बहुत जरूरी हैं।




(Image Source: AI-Generated)
पेट का संतुलन बिगड़ना

एंटीबायोटिक्स का सबसे बड़ा असर 'डिस्बायोसिस' के रूप में होता है, जिसका मतलब है पेट के बैक्टीरिया में असंतुलन।ब्रॉड-स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक्स का खतरा: ऐसी एंटीबायोटिक्स जो कई तरह के बैक्टीरिया को मारती हैं, वे सबसे ज्यादा नुकसान करती हैं। ये पेट में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया की पूरी आबादी को खत्म कर सकती हैं, जिससे उनकी विविधता कम हो जाती है।
तेजी से होता है असर: यह बदलाव बहुत तेजी से होता है, अक्सर इलाज शुरू होने के कुछ दिनों के अंदर ही।
लंबे समय तक प्रभाव: क्लिंडामाइसिन जैसी कुछ एंटीबायोटिक्स पेट के बैक्टीरिया में लंबे समय तक रहने वाले बदलाव कर सकती हैं, जिससे प्रतिरोधी बैक्टीरिया को पनपने का मौका मिल जाता है।
डायरिया और पाचन की समस्याएं

एंटीबायोटिक्स का एक बहुत ही आम दुष्प्रभाव है 'एंटीबायोटिक-एसोसिएटेड डायरिया'।


कितना आम है?

एंटीबायोटिक्स लेने वाले हर पांच में से एक व्यक्ति को यह समस्या हो सकती है।
क्यों होता है?

अच्छे बैक्टीरिया के कम होने से पाचन बिगड़ जाता है और Clostridium difficile जैसे हानिकारक बैक्टीरिया टॉक्सिन्स बनाने लगते हैं।लक्षण: पेट में ऐंठन, मतली, गैस और दस्त। यह इसलिए होता है क्योंकि फाइबर का पाचन सही से नहीं हो पाता और आंतों में पानी सोखने की प्रक्रिया बदल जाती है।
गंभीर मामले: अगर ध्यान न दिया जाए, तो यह कोलाइटिस या इरिटेबल बाउल सिंड्रोम (IBS) जैसी गंभीर बीमारियों का रूप ले सकता है।




(Image Source: AI-Generated)
लंबे समय तक रहने वाले खतरे

सिर्फ तुरंत होने वाली परेशानियां ही नहीं, एंटीबायोटिक्स का असर लंबे समय तक रह सकता है:एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस: बार-बार एंटीबायोटिक्स लेने से पेट में ऐसे बैक्टीरिया पनप सकते हैं जिन पर दवाओं का असर नहीं होता। इससे भविष्य में संक्रमण का इलाज करना मुश्किल हो सकता है।
मेटाबॉलिज्म पर असर: माइक्रोबायोम में बदलाव से पोषक तत्वों को सोखने की क्षमता और इम्यून सिस्टम पर असर पड़ सकता है।
बच्चों पर प्रभाव: बच्चे सबसे ज्यादा संवेदनशील होते हैं। बचपन में एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल उनके जीवन भर की पेट की सेहत को प्रभावित कर सकता है, जिसका संबंध एलर्जी या मोटापे जैसी समस्याओं से हो सकता है।
गट हेल्थ को कैसे करें ठीक?

अच्छी खबर यह है कि हमारा पेट काफी लचीला होता है और समय के साथ ठीक हो सकता है, हालांकि इसमें हफ्तों या महीनों लग सकते हैं। रिकवरी के लिए आप ये उपाय कर सकते हैं:

सही डाइट: लहसुन, प्याज और केले जैसे 'प्रीबायोटिक' फाइबर से भरपूर चीजें खाएं।
फर्मेंटेड फूड्स: दही या किमची जैसे फर्मेंटेड फूड्स लें, जो शरीर में प्रोबायोटिक्स पहुंचाते हैं।
सप्लीमेंट्स: प्रोबायोटिक सप्लीमेंट्स पेट में अच्छे बैक्टीरिया को वापस लाने में मदद कर सकते हैं। ध्यान रहे, इन्हें एंटीबायोटिक का कोर्स पूरा होने के बाद लेना चाहिए ताकि दवा का असर कम न हो।
हाइड्रेशन: खूब पानी पिएं और शरीर को हाइड्रेटेड रखें।
सावधानी: वायरल बीमारियों (जैसे सामान्य सर्दी-जुकाम) के लिए एंटीबायोटिक्स न लें। इनका इस्तेमाल तभी करें जब बहुत जरूरी हो।

एंटीबायोटिक्स जरूरी हैं, लेकिन इनका असर हमारी पेट की सेहत पर गहरा होता है। समझदारी इसी में है कि हम इनका इस्तेमाल सोच-समझकर करें।
डायबिटीज के मरीजों के लिए वरदान है 'दिन की रोशनी', शुगर कंट्रोल करने का नया वैज्ञानिक तरीका

डायबिटीज के मरीजों के लिए वरदान है 'दिन की रोशनी', शुगर कंट्रोल करने का नया वैज्ञानिक तरीका

डायबिटीज के मरीजों के लिए वरदान है 'दिन की रोशनी', शुगर कंट्रोल करने का नया वैज्ञानिक तरीका


अक्सर डायबिटीज के मरीज अपने खान-पान और दवाइयों पर तो बहुत ध्यान देते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि "दिन की रोशनी" भी आपकी शुगर को कंट्रोल करने में द ...और पढ़ें






ब्लड शुगर कंट्रोल करना है? तो दिन की रोशनी में बिताएं वक्त (Image Source: Freepik)



प्राकृतिक प्रकाश चयापचय और सर्कैडियन रिदम को बेहतर बनाता है


ब्लड शुगर को स्थिर करता है, इंसुलिन संवेदनशीलता बढ़ाता है


अध्ययन ने टाइप 2 मधुमेह रोगियों को लाभ की पुष्टि की


दिन का प्राकृतिक प्रकाश मधुमेह (डायबिटीज) रोगियों के लिए कई तरह से फायदेमंद है। यह विटामिन डी उत्पादन, मेटाबालिज्म और सर्केडियन रिदम (शरीर की आंतरिक घड़ी) को बेहतर बनाता है, जिससे ब्लड शुगर के नियंत्रण में मदद मिलती है, इंसुलिन संवेदनशीलता बढ़ती है और फैट आक्सीडेशन (वसा जलना) बढ़ता है, जो समग्र शर्करा संतुलन और एनर्जी मेटाबालिज्म को सुधारता है, साथ ही मूड और प्रतिरक्षा प्रणाली को भी मजबूत करता है।


एक अध्ययन के अनुसार, दिन की रोशनी का सेवन स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद करता है, जिससे टाइप 2 डायबिटीज से ग्रसित लोगों को बेहतर ग्लाइसेमिक नियंत्रण प्राप्त करने में मदद मिलती है। स्विट्जरलैंड की यूनिवर्सिटी आफ जिनेवा (यूएनआइजीई) और नीदरलैंड के मास्ट्रिच विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पाया कि जो लोग प्राकृतिक प्रकाश के संपर्क में थे, उनके ब्लड शुगर का स्तर दिन में ज्यादा घंटों तक सामान्य रेंज में रहता है और उनमें कम उतार-चढ़ाव होता है।




(Image Source: Freepik)
प्राकृतिक प्रकाश का लाभकारी प्रभाव

इसके अतिरिक्त उनके मेलाटोनिन स्तर, जो नींद का हार्मोन है शाम के समय थोड़ा अधिक था और वसा आक्सीडेटिव मेटाबालिज्म में भी सुधार हुआ। यह अध्ययन सेल मेटाबालिज्म नाम के जर्नल में प्रकाशित हुआ । इस स्थिति से ग्रसित लोगों पर प्राकृतिक प्रकाश के लाभकारी प्रभाव का पहला प्रमाण प्रस्तुत करता है। यूएनआइजीई में एसोसिएट प्रोफेसर चार्ना डिबनर ने कहा, यह कई सालों से पता है कि सर्केडियन रिदम में गड़बड़ी मेटाबालिक डिसआर्डर के विकास में एक बड़ी भूमिका निभाती है, जो पश्चिमी आबादी के बढ़ते हिस्से को प्रभावित कर रही है।

65 वर्ष से अधिक आयु के 13 लोगों पर अध्ययन

अध्ययन के लिए टीम ने 65 वर्ष और उससे अधिक आयु के 13 लोगों को भर्ती किया, ये सभी टाइप 2 मधुमेह से ग्रसित थे । उन्होंने विशेष रूप से डिजाइन किए गए रहने के स्थानों में 4.5 दिन बिताए, जो या तो बड़े खिड़कियों के माध्यम से प्राकृतिक प्रकाश से या कृत्रिम प्रकाश से रोशन थे। चार सप्ताह के कम से कम ब्रेक के बाद वे दूसरे सत्र के लिए लौटे, इस बार दूसरे प्रकाश वातावरण में थे।


विश्लेषण में दिखे सकारात्मक बदलाव

शरीर के मेटाबालिज्म में देखे गए सकारात्मक परिवर्तनों को बेहतर ढंग से समझने के लिए विज्ञानियों ने लोगों से प्रत्येक प्रकाश उपचार से पहले, दौरान और बाद में रक्त और मांसपेशियों के नमूने लिए। उन्होंने कल्चर की गई कंकाल की मांसपेशी कोशिकाओं में आणविक घड़ियों के नियमन के साथ- साथ रक्त में लिपिड, मेटाबोलाइट्स और जीन ट्रांसक्रिप्ट्स का विश्लेषण किया।


कुल मिलाकर नतीजे साफ दिखाते हैं। कि प्राकृतिक रोशनी से आंतरिक घड़ी और मेटाबालिज्म प्रभावित होते हैं। डिबनर ने बताया, यह बेहतर ब्लड शुगर के बेहतर नियमन और दिमाग में सेंट्रल क्लाक और अंगों में मौजूद क्लाक के बीच बेहतर तालमेल का कारण हो सकता है।"
पैकेटबंद खाने का 'स्वाद' पड़ सकता है जान पर भारी, प्रिजर्वेटिव्स से बढ़ रहा डायबिटीज और कैंसर का खतरा

पैकेटबंद खाने का 'स्वाद' पड़ सकता है जान पर भारी, प्रिजर्वेटिव्स से बढ़ रहा डायबिटीज और कैंसर का खतरा

पैकेटबंद खाने का 'स्वाद' पड़ सकता है जान पर भारी, प्रिजर्वेटिव्स से बढ़ रहा डायबिटीज और कैंसर का खतरा


क्या आप जानते हैं कि पैकेट बंद खाने को लंबे समय तक खराब होने से बचाने के लिए जो केमिकल्स इस्तेमाल किए जाते हैं, वे आपकी सेहत के लिए भारी पड़ सकते हैं? ...और पढ़ें





मेडिकल जर्नल्स 'नेचर कम्युनिकेशंस' और 'द बीएमजे' में पब्लिश रिजल्ट्स के मुताबिक, प्रिजर्वेटिव्स के ज्यादा सेवन और गंभीर बीमारियों के बीच सीधा संबंध पाया गया है। शोधकर्ताओं ने 2009 से 2023 के बीच 1 लाख से ज्यादा फ्रांस के लोगों के खान-पान और हेल्थ डेटा का विश्लेषण किया। 14 साल तक चले इस 'न्यूट्रीनेट-सैंट' अध्ययन में यह देखा गया कि प्रिजर्वेटिव्स का हमारे शरीर पर क्या असर पड़ता है (Health Risks of Packaged Food)।




(Image Source: Freepik)
डायबिटीज का खतरा

'नेचर कम्युनिकेशंस' में प्रकाशित अध्ययन टाइप-2 डायबिटीज और प्रिजर्वेटिव्स के बीच संबंध खोजने वाला दुनिया का पहला अध्ययन है। इसके नतीजे बेहद चिंताजनक हैं:शोध में कुल 17 प्रिजर्वेटिव्स की जांच की गई, जिनमें से 12 का ज्यादा सेवन टाइप-2 डायबिटीज के खतरे को बढ़ाने वाला पाया गया।
जिन लोगों ने कुल मिलाकर प्रिजर्वेटिव्स का हाई इनटेक किया, उनमें डायबिटीज होने का खतरा 47% तक ज्यादा था।
नॉन-एंटीऑक्सीडेंट प्रिजर्वेटिव्स के मामले में यह खतरा 49% और एंटीऑक्सीडेंट एडिटिव्स के मामले में 40% ज्यादा पाया गया।

स्टडी की कोऑर्डिनेटर मैथिल्ड टौवियर ने कहा कि हालांकि इन नतीजों की पुष्टि के लिए अभी और शोध की जरूरत है, लेकिन यह पहले से मौजूद उन एक्सपेरिमेंट्स से मेल खाते हैं जो बताते हैं कि ये केमिकल्स हानिकारक हो सकते हैं।




(Image Source: Freepik)
कैंसर से जुड़ा खतरा

'द बीएमजे' में प्रकाशित कैंसर से जुड़े अध्ययन में पाया गया कि हालांकि सभी प्रिजर्वेटिव्स कैंसर का कारण नहीं बनते, लेकिन कुछ विशेष रसायनों का ज्यादा सेवन खतरे को बढ़ा सकता है:पोटैशियम सॉर्बेट (Potassium Sorbate): इसका ज्यादा सेवन ओवरऑल कैंसर के खतरे को 14% और ब्रेस्ट कैंसर के खतरे को 26% तक बढ़ा सकता है।
सोडियम नाइट्राइट (Sodium Nitrite): यह प्रोस्टेट कैंसर के खतरे को 32% तक बढ़ा सकता है।
पोटैशियम नाइट्रेट (Potassium Nitrate): इससे ब्रेस्ट कैंसर का खतरा 22% ज्यादा पाया गया।
सल्फाइट्स (Sulfites): इनका संबंध ओवरऑल कैंसर के खतरे में 12% की बढ़ोतरी से पाया गया।
एसीटेट्स और एसिटिक एसिड: इनका संबंध भी कैंसर के बढ़ते जोखिम से जुड़ा हुआ मिला।

शोधकर्ताओं का मानना है कि ये केमिकल्स हमारे शरीर के इम्यून सिस्टम और सूजन संबंधी रास्तों को बदल सकते हैं, जिससे कैंसर पनपने की संभावना बढ़ जाती है।

क्या रहते हैं एक्सपर्ट्स?

यूनिवर्सिटी कॉलेज डबलिन के प्रोफेसर विलियम गैलाघर ने कहा कि भले ही कैंसर की दर में यह बढ़ोतरी मामूली लग सकती है, लेकिन जब हम पूरी आबादी के स्तर पर इसे देखते हैं, तो यह एक महत्वपूर्ण और गंभीर मामला है।


चूंकि यह एक 'ऑब्जर्वेशनल स्टडी' थी, इसलिए शोधकर्ता सीधे तौर पर कारण और प्रभाव का दावा नहीं कर रहे हैं, लेकिन यह नतीजे काफी महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में, उपभोक्ताओं को सलाह दी गई है कि वे पैकेट बंद या अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड के बजाय ताजा और कम से कम प्रोसेस्ड फूड्स को ही डाइट में शामिल करें।
न्यूट्रिशनिस्ट ने बताईं 5 'जादुई' हरी सब्जियां, सेहत से जुड़ी 5 गंभीर परेशानियों का हैं रामबाण इलाज

न्यूट्रिशनिस्ट ने बताईं 5 'जादुई' हरी सब्जियां, सेहत से जुड़ी 5 गंभीर परेशानियों का हैं रामबाण इलाज

न्यूट्रिशनिस्ट ने बताईं 5 'जादुई' हरी सब्जियां, सेहत से जुड़ी 5 गंभीर परेशानियों का हैं रामबाण इलाज


क्या आप जानते हैं सेहत से जुड़ी कई गंभीर समस्याओं का इलाज हमारी रसोई में छिपा है? जी हां, इस बारे में न्यूट्रिशनिस्ट ने एक वीडियो शेयर करके 5 सब्जियों ...और पढ़ें





लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी और खराब खान-पान के कारण बीमारियां शरीर को जल्दी घेर लेती हैं। ऐसे में हम अक्सर महंगी दवाइयों और सप्लीमेंट्स की ओर भागते हैं, जबकि समाधान हमारी रसोई और सब्जी (Green Vegetables to Fight Disease) की टोकरी में ही छिपा होता है।


हाल ही में न्यूट्रिशनिस्ट्स दीपशिखा जैन ने 5 ऐसी हरी सब्जियों और जड़ी-बूटियों के फायदों पर जोर दिया है, जो सामान्य लेकिन गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को जड़ से खत्म करने में मदद कर सकती हैं। आइए जानते हैं इन 5 जादुई हरी सब्जियों (Vegetables for Common Disease Prevention) के बारे में।


डायबिटीज के लिए रामबाण- मेथी

डायबिटीज के मरीजों के लिए मेथी किसी दवा से कम नहीं है। दरअसल, मेथी के पत्तों में फाइबर होता है, जो ब्लड में शुगर के अब्जॉर्प्शन को धीमा कर देता है। इसके अलावा, इसमें मौजूद अमीनो एसिड इंसुलिन के सीक्रेशन को बढ़ाने में मदद करते हैं। मेथी की सब्जी या मेथी दाने का पानी ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल रखने का एक प्राकृतिक और असरदार तरीका है।

आयरन की कमी दूर करे- लाल चौलाई

शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी या एनीमिया एक बड़ी समस्या है, खासकर महिलाओं में। लाल चौलाई आयरन का बेहतरीन सोर्स है। इसमें पालक की तुलना में कहीं ज्यादा मात्रा में आयरन और विटामिन-सी पाया जाता है। विटामिन-सी की उपस्थिति शरीर को आयरन अब्जॉर्प्शन में मदद करती है। अगर आप थकान और कमजोरी महसूस करते हैं, तो अपनी डाइट में लाल चौलाई को जरूर शामिल करें।
हड्डियों को बनाए फौलादी- शेपू

कमजोर हड्डियां और जोड़ों का दर्द अब केवल बुढ़ापे की समस्या नहीं रही। 'शेपू' या सुआ की सब्जी कैल्शियम का खजाना है। हड्डियों की डेंसिटी को बनाए रखने के लिए शरीर को भरपूर मात्रा में कैल्शियम और फास्फोरस की जरूरत होती है, जो शेपू में भरपूर मात्रा में मिलता है। इसे नियमित रूप से खाने से ऑस्टियोपोरोसिस जैसी बीमारियों के खतरे को कम किया जा सकता है और दांतों को भी मजबूती मिलती है।

पाचन तंत्र की सफाई- पुदीना

खराब पाचन, गैस और ब्लोटिंग के लिए पुदीना सबसे आसान और असरदार उपाय है। पुदीने की पत्तियों में मेंथॉल होता है, जो पेट की मांसपेशियों को आराम देता है और डाइजेस्टिव एंजाइम्स को एक्टिव करता है। खाने के साथ पुदीने की चटनी या पुदीने का पानी पीने से इरिटेबल बाउल सिंड्रोम के लक्षणों में भी राहत मिलती है। यह पेट को ठंडक पहुंचाता है और मेटाबॉलिज्म को भी एक्टिव रखता है।

सफेद बाल और कोलेजन के लिए- कढ़ी पत्ता

असमय सफेद होते बाल और त्वचा पर नजर आती झुर्रियां कोलेजन की कमी का संकेत हैं। कढ़ी पत्ता केवल तड़के के लिए नहीं है; यह एंटी-ऑक्सीडेंट्स और विटामिन-बी से भरपूर होता है। यह बालों के नेचुरल पिगमेंट को बनाए रखने में मदद करता है, जिससे बाल काले रहते हैं। साथ ही, कढ़ी पत्ता शरीर में कोलेजन के स्तर को बढ़ावा देता है, जिससे त्वचा में कसाव बना रहता है और उम्र का असर कम दिखता है।
एंटीबायोटिक दवाएं लेने पर भी क्यों बार-बार लौट आता है इन्फेक्शन? वैज्ञानिकों ने सुलझाई गुत्थी

एंटीबायोटिक दवाएं लेने पर भी क्यों बार-बार लौट आता है इन्फेक्शन? वैज्ञानिकों ने सुलझाई गुत्थी

एंटीबायोटिक दवाएं लेने पर भी क्यों बार-बार लौट आता है इन्फेक्शन? वैज्ञानिकों ने सुलझाई गुत्थी


क्या आपने कभी सोचा है कि एंटीबायोटिक दवाएं लेने के बाद भी कई बार इन्फेक्शन पूरी तरह खत्म क्यों नहीं होता या कुछ समय बाद बीमारी दोबारा क्यों लौट आती है ...और पढ़ें






वैज्ञानिकों ने ढूंढ निकाली एंटीबायोटिक बेअसर होने की असली वजह (Image Source: Freepik)


एएनआई/टीपीएस, तेल अवीब। एक नए इजराइली अध्ययन ने माइक्रोबायोलाजी की सबसे पक्की मान्यताओं में से एक को चुनौती दे रही है कि बैक्टीरिया मुख्य रूप से निष्क्रिय होकर एंटीबायोटिक्स से बचते हैं। अध्ययन से पता चलता है कि एंटीबायोटिक स्थिरता एक अकेली बायोलाजिकल घटना नहीं है बल्कि यह दो मौलिक रूप से भिन्न विकास रोकने वाले अवस्थाओं से पैदा होती है, यह खोज सालों के विरोधाभासी नतीजों को सुलझाने में मदद करती है और बार-बार होने वाले इन्फेक्शन को रोकने के नए रास्ते खोलती है।


एंटीबायोटिक्स को विकास और विभाजन से जुड़े प्रक्रियाओं को बाधित करके बैक्टीरिया को खत्म करने के लिए डिजाइन किया गया है। फिर भी कई इन्फेक्शन में बैक्टीरियल कोशिकाओं का एक छोटा सा हिस्सा इलाज के बाद भी बच जाता है और बाद में बीमारी को फिर से शुरू कर देता है। यह घटना, जिसे एंटीबायोटिक स्थिरता के नाम से जाना जाता है। यह इलाज की विफलता और बीमारी के दोबारा होने का एक बड़ा कारण है, भले ही बैक्टीरिया दवाओं के प्रति कोई आनुवंशिक प्रतिरोध न दिखाएं।





(Image Source: Freepik)
वास्तविकता के एक हिस्से को ही पकड़ती है

दशकों से लगातार बने रहने का श्रेय ज्यादातर निष्क्रियता को दिया जाता था, यह विचार कि बैक्टीरिया एक नियंत्रित तरीके से विकास को बंद कर देते हैं, एक स्थिर, नींद जैसी अवस्था में प्रवेश करते हैं जो उन्हें एंटीबायोटिक्स से बचाती है। लेकिन यरूशलेम के हिब्रू विश्वविद्यालय में पीएचडी छात्र आदि रोतेम के नेतृत्व में किए गए नए शोध ने दिखाया है कि यह व्याख्या केवल वास्तविकता के एक हिस्से को ही पकड़ती है।


अध्ययन दर्शाता है कि एंटीबायोटिक्स तहत उच्च जीवित रहने की दर दो भिन्न शारीरिक अवस्थाओं से पैदा हो सकती है, न कि केवल निष्क्रियता के भिन्नताओं से। एक अवस्था नियंत्रित विकास रोकने के क्लासिक माडल के अनुरूप हैं, जिसमें बैक्टीरिया सक्रिय रूप से अपने मेटाबोलिज्म को धीमा करते हैं और आंतरिक स्थिरता बनाए रखते हैं। दूसरी स्थिति मौलिक रूप से अलग है: एक बाधित, अव्यवस्थित विकास रोकना, जिसमें कोशिकाएं नियंत्रित बंद होने के बजाय खराब स्थिति में जाकर जीवित रहती हैं। ये निष्कर्ष हाल ही में पीयर रिव्यूड साइंस एडवांसेज जर्नल में प्रकाशित हुए थे।

निष्क्रिय कोशिकाओं को मारना मुश्किल

बालाबन ने कहा, हमने पाया कि बैक्टीरिया दो बहुत अलग-अलग तरीकों से एंटीबायोटिक्स से बच सकते हैं। एक बार जब आप यह पहचान लेते हैं कि ये अलग-अलग स्थितियां हैं, तो कई विरोधाभास अचानक समझ में आने लगते हैं।


नियंत्रित अवस्था में बैक्टीरिया जानबूझकर एक संरक्षित स्थिति में प्रवेश करते हैं। चूंकि कई एंटीबायोटिक्स प्रभावी होने के लिए एक्टिव ग्रोथ पर निर्भर करते हैं, इसलिए इन निष्क्रिय कोशिकाओं को मारना मुश्किल होता है। यह मैकेनिज्म लंबे समय से स्थिरता के बारे में सोचने का प्रमुख तरीका रहा है और इस क्षेत्र में प्रयोगात्मक दृष्टिकोणों को आकार दिया है। हालांकि, बाधित अवस्था उस धारणा को चुनौती देती है।
सर्दी-जुकाम में संतरा खाना सही या गलत? डॉक्टर ने बताया इसके पीछे का चौंकाने वाला सच

सर्दी-जुकाम में संतरा खाना सही या गलत? डॉक्टर ने बताया इसके पीछे का चौंकाने वाला सच

सर्दी-जुकाम में संतरा खाना सही या गलत? डॉक्टर ने बताया इसके पीछे का चौंकाने वाला सच


क्या आपने कभी सोचा है कि संतरा सर्दियों में ही क्यों आता है? दरअसल, इसके पीछे प्रकृति की एक खास प्लानिंग है। प्रकृति ने इस फल को इसी मौसम में इसलिए उग ...और पढ़ें





क्या आप भी जुकाम होते ही संतरा खाना छोड़ देते हैं? (Image Source: AI-Generated)


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। सर्दियों का मौसम आते ही बाजारों में संतरे दिखाई देने लगते हैं, लेकिन हम में से बहुत से लोग इस डर से संतरा खाने से बचते हैं कि इससे सर्दी या जुकाम हो जाएगा। क्या यह डर सही है? क्या वाकई सर्दी में संतरा नुकसान करता है (Does Eating Orange Increase Cough)? आइए डॉक्टर तरंग कृष्णा जानते हैं इसके पीछे का सच।




(Image Source: AI-Generated)
सर्दियों में इस फल को बनाएं अपना साथी

सर्दियों में आने वाले संतरे में विटामिन-सी की भरपूर मात्रा होती है। यह विटामिन आपके इम्यून सिस्टम को मजबूत और स्वस्थ रखने का काम करता है। जब आपका इम्यून सिस्टम मजबूत होता है, तो वह आपको ठंड और सर्दी से बचाता है। इसलिए, अगर आप सर्दियों में नियमित रूप से ताजे संतरों डाइट में शामिल करते हैं, तो आप बीमार नहीं पड़ेंगे।



क्या संतरा खाने से बीमार पड़ते हैं?


यह एक बहुत बड़ा भ्रम है। अक्सर कहा जाता है कि संतरा नहीं खाना चाहिए क्योंकि इससे सर्दी और खांसी हो सकती है। लेकिन, यह सच नहीं है। हकीकत तो यह है कि अगर आप नियमित रूप से संतरा खाते हैं, तो आप सर्दियों में बीमार नहीं पड़ेंगे। डॉक्टर बताते हैं कि यही नियम आंवला पर भी लागू होता है। अगर आप आंवले का सेवन करते हैं, तो आपको कभी सर्दी नहीं पकड़ेगी और आप बीमार नहीं होंगे।
क्यों बीमार पड़ते हैं लोग?

अब सवाल यह उठता है कि अगर मौसमी फल अच्छे हैं, तो लोग बीमार क्यों पड़ते हैं? आप तब बीमार पड़ते हैं जब आप उन फलों का सेवन करते हैं जो कोल्ड स्टोरेज में रखे गए होते हैं और सर्दियों में बाजार में बिकते हैं।


डॉक्टर कहते हैं, सर्दियों में मिलने वाले सभी मौसमी फलों का सेवन बेझिझक करना चाहिए। संतरा और आंवला जैसे फल आपको बीमार करने के लिए नहीं, बल्कि आपको सर्दी-जुकाम से बचाने और स्वस्थ रखने के लिए बने हैं।
क्या 40 के बाद आपके पैर भी हो रहे हैं पतले और कमजोर? अगर हां, तो आज से शुरू कर दें ये 5 एक्सरसाइज

क्या 40 के बाद आपके पैर भी हो रहे हैं पतले और कमजोर? अगर हां, तो आज से शुरू कर दें ये 5 एक्सरसाइज

क्या 40 के बाद आपके पैर भी हो रहे हैं पतले और कमजोर? अगर हां, तो आज से शुरू कर दें ये 5 एक्सरसाइज


40 की उम्र के बाद मांसपेशियों की कमजोरी से बचने और पैरों को मजबूत बनाने के लिए कुछ खास एक्सरसाइज, जैसे- स्क्वॉट्स, काफ रेजेस, लंजेस, स्टेप-अप्स और वॉल ...और पढ़ें







कैसे बनाएं पैरों की मांसपेशियां फिर से मजबूत? (Picture Courtesy: Freepik)



40 के बाद मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं


इसका सबसे ज्यादा असर पैरों पर नजर आता है


पैरों की मांसपेशियों को मजबूत बनाने के लिए एक्सरसाइज करना जरूरी है


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। 40 की उम्र पार करते ही हमारे शरीर में कई हार्मोनल और शारीरिक बदलाव आने लगते हैं। इनमें से सबसे प्रमुख है सार्कोपेनिया, यानी मांसपेशियों की डेंसिटी और ताकत में धीरे-धीरे कमी आना। अगर ध्यान न दिया जाए, तो इसका सबसे ज्यादा असर पैरों में नजर आता है।


अगर पैर कमजोर हो जाएं, तो घुटनों में दर्द, बैलेंस बिगड़ने और जल्दी थकान होने जैसी समस्याएं शुरू हो जाती हैं। लेकिन अच्छी खबर यह है कि सही एक्सरसाइज की मदद से आप न केवल इस गिरावट को रोक सकते हैं, बल्कि अपने पैरों को दोबारा मजबूत बना सकते हैं। आइए जानें इन एक्सरसाइज के बारे में।


बॉडीवेट स्क्वॉट्स (Bodyweight Squats)



(Picture Courtesy: Freepik)स्क्वॉट्स पैरों के लिए काफी फायदेमंद होता है, क्योंकि यह एक साथ आपकी जांघों, कूल्हों और हैमस्ट्रिंग पर काम करता है।
कैसे करें- पैरों को कंधों की चौड़ाई के बराबर खोलकर खड़े हों। अब धीरे-धीरे ऐसे नीचे बैठें जैसे आप किसी कुर्सी पर बैठ रहे हों। ध्यान रहे कि आपके घुटने पंजों से आगे न निकलें। फिर वापस सामान्य स्थिति में आएं।
फायदा- यह पैरों की मांसपेशियों को टोन करता है और घुटनों के जोड़ों को सहारा देता है।
काफ रेजेस (Calf Raises)




(Picture Courtesy: Freepik)पिंडलियों की मांसपेशियां हमारे शरीर के 'दूसरे दिल' की तरह काम करती हैं, क्योंकि ये ब्लड को वापस दिल तक पंप करने में मदद करती हैं।
कैसे करें- सीधे खड़े हो जाएं और धीरे-धीरे अपनी एड़ियों को जमीन से ऊपर उठाएं, ताकि पूरा वजन पंजों पर आ जाए। दो सेकंड रुकें और फिर एड़ियों को वापस नीचे ले जाएं। संतुलन के लिए आप दीवार का सहारा ले सकते हैं।
फायदा- यह टखनों को मजबूती देता है और चलने-दौड़ने की क्षमता बढ़ाता है।
वॉकिंग लंजेस (Walking Lunges)




(Picture Courtesy: Freepik)लंजेस बैलेंस और फ्लेक्सिबिलिटी के लिए बेहतरीन एक्सरसाइज है। यह पैरों के बीच के तालमेल को सुधारती है।
कैसे करें- एक पैर को आगे बढ़ाएं और घुटने को 90 डिग्री के एंगल तक मोड़ें। पीछे वाला घुटना जमीन के करीब होना चाहिए। फिर खड़े होकर दूसरे पैर से यही प्रक्रिया दोहराएं।
फायदा- यह कूल्हों के जोड़ों के लचीलेपन को बढ़ाता है और शरीर का बैलेंस बेहतर करता है।
स्टेप-अप्स (Step-Ups)सीढ़ियां चढ़ना पैरों की स्ट्रेंथ बढ़ाने का सबसे नेचुरल तरीका है।
कैसे करें- किसी मजबूत बेंच या सीढ़ी के पहले पायदान का इस्तेमाल करें। एक पैर ऊपर रखें और शरीर को ऊपर उठाएं, फिर धीरे से वापस नीचे आएं। 10-12 बार एक पैर से करने के बाद दूसरे पैर से करें।
फायदा- यह एक्सरसाइज घुटनों के आसपास की छोटी मांसपेशियों को मजबूत करती है, जिससे बुढ़ापे में गठिया का खतरा कम होता है।
वॉल सिट (Wall Sit)




(Picture Courtesy: Freepik)यह एक ऐसी एक्सरसाइज है, जो बिना हिले-डुले मांसपेशियों की सहनशक्ति बढ़ाती है।
कैसे करें- दीवार से पीठ सटाकर खड़े हों और धीरे-धीरे नीचे झुकें जैसे आप कुर्सी पर बैठे हों। आपकी जांघें जमीन के पैरेलल होनी चाहिए। इस स्थिति में 20 से 30 सेकंड तक रुकने की कोशिश करें।
फायदा- यह जांघों की मांसपेशियों को बिना जोड़ों पर दबाव डाले गहरा तनाव देती है।
सावधानियां

40 के बाद स्ट्रेंथ ट्रेनिंग सिर्फ बॉडी बनाने के लिए नहीं, बल्कि मोबिलिटी बनाए रखने के लिए जरूरी है। इन एक्सरसाइज को हफ्ते में कम से कम 3 बार करें। शुरुआत हमेशा वॉर्म-अप से करें और अगर आपको घुटने या पीठ में कोई पुरानी चोट है, तो विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।
अपनी सेहत पर शक करना छोड़िए! मामूली दिखने वाली ये 7 आदतें हैं एक 'सुपर हेल्दी' शरीर की निशानी

अपनी सेहत पर शक करना छोड़िए! मामूली दिखने वाली ये 7 आदतें हैं एक 'सुपर हेल्दी' शरीर की निशानी

अपनी सेहत पर शक करना छोड़िए! मामूली दिखने वाली ये 7 आदतें हैं एक 'सुपर हेल्दी' शरीर की निशानी


क्या आप भी दिन-रात अपनी सेहत को लेकर चिंता में रहते हैं? क्या आपको लगता है कि फिट होने का मतलब सिर्फ जिम जाना और उबला हुआ खाना खाना है? अगर हां, तो यह ...और पढ़ें




ये 7 छोटी-छोटी आदतें सबूत हैं कि आप अंदर से 'सुपर फिट' हैं (Image Source: AI-Generated)


 हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां 'सेहत' का मतलब इंस्टाग्राम के मॉडल्स और जिम की सेल्फी बनकर रह गया है। अक्सर हम शीशे के सामने खड़े होकर अपनी थोड़ी-सी बढ़ी हुई तोंद को देखते हैं और खुद को कोसते हैं। हमें लगता है कि जब तक हम उबली हुई सब्जियां नहीं खाएंगे और जिम में पसीना नहीं बहाएंगे, हम हेल्दी नहीं हैं।


ऐसे में, क्या हो अगर हम आपसे कहें कि आप 'सेहत' की गलत परिभाषा के पीछे भाग रहे हैं? जी हां, सच्ची सेहत का मतलब 'सिक्स पैक एब्स' या जीरो फिगर नहीं होता। असली फिटनेस वो है जो दिखाई नहीं देती, बल्कि महसूस होती है। कभी-कभी आपका शरीर आपको चुपके से सिग्नल दे रहा होता है कि "दोस्त, सब कुछ बिल्कुल ठीक है", लेकिन हम उन इशारों को नजरअंदाज कर देते हैं। आज इस आर्टिकल में हम उन 7 मामूली दिखने वाले संकेतों (Signs You Are Healthier Than You Think) की ही बात करेंगे।




(Image Source: AI-Generated)
सुबह उठते ही तरोताजा महसूस करना

क्या आप अलार्म बजते ही उठ जाते हैं और आपको थकान महसूस नहीं होती? अगर आपकी नींद गहरी है और सुबह उठकर आपको चाय-कॉफी की जरूरत नहीं पड़ती अपना दिन शुरू करने के लिए, तो यह संकेत है कि आपका शरीर और दिमाग दोनों बेहतरीन तरीके से रेस्ट कर रहे हैं।

सीढ़ियां चढ़ते वक्त सांस न फूलना

लिफ्ट की जगह सीढ़ियां लेना एक छोटा टेस्ट है। अगर आप दो-तीन मंजिल सीढ़ियां बिना रुके और बिना बुरी तरह हांफे चढ़ सकते हैं, तो इसका मतलब है कि आपका दिल और फेफड़े बहुत मजबूत हैं। थोड़ा सांस चढ़ना नॉर्मल है, लेकिन अगर आप बात कर पा रहे हैं, तो आप फिट हैं।

सही समय पर भूख लगना

बहुत से लोग भूख न लगने की शिकायत करते हैं, लेकिन अगर आपको सुबह, दोपहर और रात के खाने के समय अपने आप अच्छी भूख लगती है, तो यह खुशखबरी है। इसका मतलब है कि आपका मेटाबॉलिज्म बहुत अच्छा है और आपका शरीर खाने को सही से पचाकर एनर्जी बना रहा है।

पेशाब का रंग साफ होना

यह पढ़ने में अजीब लग सकता है, लेकिन यह आपकी सेहत का सबसे बड़ा इंडिकेटर है। अगर आपके यूरिन का रंग हल्का पीला या पानी जैसा साफ है, तो आप खुद को बहुत अच्छे से हाइड्रेटेड रख रहे हैं। गहरा पीला रंग ही डिहाइड्रेशन या किडनी पर दबाव का संकेत होता है।



घाव या चोट का जल्दी ठीक होना

कभी-कभी सब्जी काटते वक्त उंगली कट जाए या छोटी-मोटी खरोंच आ जाए, तो गौर करें कि वह कितनी जल्दी भरती है। एक स्वस्थ शरीर में 'हीलिंग पावर' तेज होती है। अगर आपका घाव जल्दी भर जाता है, तो आपका ब्लड सर्कुलेशन और इम्यून सिस्टम शानदार काम कर रहा है।

पेट का हर सुबह साफ होना

यह एक ऐसा टॉपिक है जिस पर हम बात करने से कतराते हैं, लेकिन यह सेहत की नींव है। अगर आप नियमित रूप से फ्रेश होते हैं और आपको कब्ज या भारीपन महसूस नहीं होता, तो समझ लीजिए कि आप कई बीमारियों से पहले ही सुरक्षित हैं। अच्छी पाचन शक्ति ही अच्छे सेहत की कुंजी है।

इमोशनल स्टेबिलिटी

सेहत सिर्फ शरीर की नहीं होती, दिमाग की भी होती है। क्या आप दिन भर के तनाव के बाद भी शाम को मुस्कुरा सकते हैं? अगर आप अपनी फीलिंग्स को काबू में रख पाते हैं और छोटी-छोटी बातों पर बहुत ज्यादा घबराते नहीं हैं, तो आप मानसिक रूप से भी 'सुपर हेल्दी' हैं।


अगली बार शीशे के सामने खड़े होकर खुद में कमियां निकालने के बजाय, इन खूबियों पर ध्यान दें। अगर ये 7 इशारे आपके साथ हैं, तो यकीन मानिए, आपका शरीर आपका सबसे अच्छा दोस्त है।
क्या अब लाइलाज नहीं रहेगा अल्जाइमर? सालों पुरानी मान्यता को वैज्ञानिकों ने दी चुनौती

क्या अब लाइलाज नहीं रहेगा अल्जाइमर? सालों पुरानी मान्यता को वैज्ञानिकों ने दी चुनौती

क्या अब लाइलाज नहीं रहेगा अल्जाइमर? सालों पुरानी मान्यता को वैज्ञानिकों ने दी चुनौती


चिकित्सा जगत से एक बेहद राहत भरी खबर सामने आई है। अमेरिकी शोधकर्ताओं ने एक नई स्टडी में दावा किया है कि अल्जाइमर जैसी गंभीर बीमारी को न केवल रोका जा स ...और पढ़ें




अल्जाइमर के मरीजों के लिए नई उम्मीद, अमेरिकी शोधकर्ताओं ने खोजा इलाज का रास्ता 



आइएएनएस, नई दिल्ली। कल्पना कीजिए एक ऐसी दुनिया की जहां अल्जाइमर जैसी गंभीर बीमारी को न सिर्फ रोका जा सके, बल्कि पूरी तरह ठीक भी किया जा सके। पढ़ने में यह किसी चमत्कार जैसा लगता है, क्योंकि पिछले 100 सालों से चिकित्सा विज्ञान इस बीमारी को 'लाइलाज' मानकर हार मान चुका था, लेकिन अब अमेरिकी वैज्ञानिकों ने एक ऐसी क्रांतिकारी खोज की है जिसने उम्मीद की एक नई मशाल जला दी है। एक नई स्टडी में दावा किया गया है कि दिमाग के एक खास 'बैलेंस' को ठीक करके याददाश्त को वापस लाया जा सकता है।




(Image Source: AI-Generated)
क्या है यह नई खोज?

'सेल रिपोर्ट्स मेडिसिन' जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि अल्जाइमर का मुख्य कारण 'नैड प्लस' (NAD+) नामक एक सेल्यूलर एनर्जी मॉलिक्यूल का असंतुलन होना है।


वैज्ञानिकों ने अपने शोध में देखा कि अल्जाइमर से पीड़ित इंसानों और इस बीमारी के मॉडल वाले चूहों, दोनों के ही दिमाग में 'नैड प्लस' का स्तर तेजी से गिर जाता है।
चूहों पर किया गया सफल प्रयोग

इस सिद्धांत को परखने के लिए वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में विशेष रूप से तैयार किए गए चूहों पर अध्ययन किया। इन चूहों को जेनेटिक इंजीनियरिंग के जरिए ऐसा बनाया गया था कि उनमें इंसानों की तरह अल्जाइमर के लक्षण विकसित हों। इसमें दो तरह के चूहे शामिल थे:
एक जिनमें एमीलोइड प्रोसेसिंग में म्यूटेशन था।
दूसरे जिनमें टाऊ प्रोटीन का म्यूटेशन था।

जब शोधकर्ताओं ने इन चूहों के दिमाग में गिरते हुए 'नैड प्लस' स्तर को वापस संतुलित किया, तो नतीजे चौंकाने वाले थे।
एडवांस स्टेज में भी बीमारी हुई ठीक

यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल्स के हैरिंगटन डिस्कवरी इंस्टीट्यूट के डॉ. एंड्रयू ए. पाइपर और उनकी टीम ने 'PC3-20' नामक एक औषधीय एजेंट का उपयोग करके चूहों के दिमाग में नैड प्लस का बैलेंस दोबारा बनाया। इसके परिणाम बेहद उत्साहजनक रहे:
बीमारी से बचाव: जिन चूहों में अभी बीमारी शुरू नहीं हुई थी, उनमें नैड प्लस बैलेंस बनाए रखने से उन्हें अल्जाइमर हुआ ही नहीं।
रिकवरी: सबसे बड़ी बात यह थी कि जिन चूहों में बीमारी बहुत आगे बढ़ चुकी थी (एडवांस स्टेज), उनका इलाज करने पर उनके दिमाग की कार्यक्षमता में सुधार हुआ।
याददाश्त लौटी: इलाज के बाद चूहों की दोनों नस्लों ने अपनी सोचने-समझने की क्षमता पूरी तरह वापस पा ली।
भविष्य के लिए नई उम्मीद

डॉ. एंड्रयू ए. पाइपर ने बताया कि दिमाग की ऊर्जा को बहाल करके बीमारी की वजह से होने वाले नुकसान को ठीक किया जा सकता है। यह अध्ययन इस विचार को मजबूती देता है कि अगर दिमाग में नैड प्लस का संतुलन सही कर दिया जाए, तो मरीज रिकवर कर सकते हैं।


हालांकि यह प्रयोग अभी जानवरों (प्रीक्लिनिकल मॉडल) तक सीमित है, लेकिन इसने भविष्य में इंसानों पर होने वाले परीक्षणों के लिए एक बड़ा दरवाजा खोल दिया है। यह निश्चित रूप से चिकित्सा विज्ञान के लिए एक बहुत बड़ी सफलता है।
सावधान! ठंड में अलाव तापने की आदत पड़ सकती है भारी, सांस और स्किन को होते हैं ये 5 बड़े नुकसान

सावधान! ठंड में अलाव तापने की आदत पड़ सकती है भारी, सांस और स्किन को होते हैं ये 5 बड़े नुकसान

सावधान! ठंड में अलाव तापने की आदत पड़ सकती है भारी, सांस और स्किन को होते हैं ये 5 बड़े नुकसान


सर्दियों में आग तापना एक आम बात है, लेकिन यह आदत सहत के लिए हानिकारक हो सकती है। लकड़ी या कोयले के धुएं में मौजूद कण रेस्पिरेटरी सिस्टम को नुकसान पहुं ...और पढ़ें




ठंड में हाथ सेंकने की है आदत, तो जान लीजिए इसके भारी नुकसान (Picture Credit- Canva)


सांस से जुड़ी समस्याएं होने का खतरा बढ़ जाता है


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। सर्दियों में कड़ाके की ठंड से बचने के लिए आग तापना आम बात है। सुबह-शाम लोग खुले या बंद कमरों में आग जलाकर ठंड दूर करने की कोशिश करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह आदत आपकी सेहत को अनजाने में कितना बड़ा नुकसान पहुंचा सकती है? जी हां, आग तापना कई गंभीर बीमारियों की वजह बन सकता है।




(Picture Credit- Canva)

अक्सर लोग कोयला या लड़की की आग जलाकर बैठते हैं और माहौल का आनंद लेते हैं, लेकिन इससे निकलते धुएं में लाखों छोटे-छोटे कण होते हैं, जो रेस्पिरेटरी सिस्टम और सेहत पर बुरा प्रभाव डालता है। आइए जानते हैं कि आग तापने से कौन-सी बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है।

सांस से जुड़ी समस्याएं



(Picture Credit- Canva)

लकड़ी जलाने से निकलने वाला धुआं फेफड़ों के लिए बेहद नुकसानदायक होता है। इससे खांसी, सांस फूलना, अस्थमा और एलर्जी जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं।
फेफड़ों के लिए हानिकारक



(Picture Credit- Canva)

लंबे समय तक धुएं के संपर्क में रहने से फेफड़ों के काम करने की क्षमता कम हो जाती है। इससे लंग इन्फेक्शन और अन्य गंभीर बीमारियों का खतरा बन सकता है।
इम्युनिटी कमजोर होना



(Picture Credit- Canva)

बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों पर आग का धुआं ज्यादा असर डालता है। उनकी इम्युनिटी कमजोर होती है, जिससे इन्फेक्शन और सांस की बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
हार्ट हेल्थ पर असर



(Picture Credit- Canva)

दिल के मरीजों के लिए अचानक ज्यादा गर्मी में बैठना और भी अधिक जोखिम भरा माना जाता है, क्योंकि शरीर का तापमान तेजी से बदलता है। साथ ही, आग से निकलता धुआं हार्ट अटैक, स्ट्रोक, असामान्य दिल की धड़कन और अचानक मौत का खतरा काफी बढ़ा देता है।

आंख और नाक में जलन



(Picture Credit- Canva)

आग के पास ज्यादा देर बैठने से आंखों में जलन, पानी आना और रेडनेस जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। वहीं, लड़की से निकलने वाली गर्म हवा और धुएं से नाक सूखना, जलन, नाक बहना और छींकें जैसी अन्य परेशानियां हो सकती हैं।

याददाश्त कमजोर होना



लकड़ी के धुएं के लगातार संपर्क में रहने से यह हमारे शरीर के साथ दिमाग को भी कमजोर कर देता है, जिससे सिरदर्द हो सकता है और याददाश्त पर भी बुरा असर दिख सकता है।
कहीं आप भी तो नहीं कर रहे ये गलती? दवाओं के साइड इफेक्ट्स पर विशेषज्ञों की चेतावनी

कहीं आप भी तो नहीं कर रहे ये गलती? दवाओं के साइड इफेक्ट्स पर विशेषज्ञों की चेतावनी

कहीं आप भी तो नहीं कर रहे ये गलती? दवाओं के साइड इफेक्ट्स पर विशेषज्ञों की चेतावनी

संजय गांधी स्नातकोत्तर चिकित्सा विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआइ) के एक नए अध्ययन के अनुसार, एंटी माइक्रोबियल, एंटी वायरल, एंटी फंगल, एंटीबायोटिक, टीबी और ...और पढ़ें



राहत देने वाली दवाइयां ही न बन जाएं मुसीबत (Picture Courtesy: Freepik)


 दवाइयां कई बीमारियों से राहत दे सकती हैं तो हो सकते हैं इसके साइड इफेक्ट यानी दुष्प्रभाव भी संजय गांधी स्नातकोत्तर विज्ञान चिकित्सा संस्थान के एसजीपीजीआइ अस्पताल प्रशासन विभाग लखनऊ की एडवर्स ड्रग रिएक्शन (दवा से होने वाले कुप्रभाव) निगरानी इकाई द्वारा किए गए एक अध्ययन में ऐसी कई बातें सामने आई हैं।


शोध टीम में शामिल डॉ. शालिनी त्रिवेदी के के अनुसार, अनुसार, माइक्रोबियल, टीवी और कैंसर की दवाएं देते समय मरीजों की निगरानी आवश्यक है ताकि इन दुष्प्रभावों को समय रहते पहचाना जा सके और इलाज को सुरक्षित बनाया जा सके।


बता दें कि यह शोध वर्ष 2024 (जनवरी से दिसंबर) के दौरान संस्थान की एडवर्स ड्रग रिएक्शन निगरानी इकाई में दर्ज मामलों के विश्लेषण पर आधारित है । अध्ययन में कुल 213 एडवर्स ड्रग रिएक्शन के मामले दर्ज किए गए। इनमें से 155 मामले एसजीपीजीआइ के विभिन्न विभागों से सामने आए, जबकि शेष मामले प्रदेश के अन्य चिकित्सा केंद्रों से रिपोर्ट किए गए। यह

शोध एडवर्स ड्रग रिएक्शन

ए रेट्रोस्पेक्टिव आब्जर्वेशनल स्टडी विषय पर किया गया। शोध दल में प्रो. आर. हर्षवर्धन (चिकित्सा अधीक्षक एवं प्रोफेसर ), डॉ. सौरभ सिंह, डॉ. शालिनी त्रिवेदी, डॉ. अमोल जैन, डॉ. वैष्णवी आनंद, डॉ. अक्षिता बंसल और डॉ. अंकित कुमार सिंह शामिल रहे।

युवाओं में बढ़ती जागरूकता

अध्ययन में यह भी सामने आया कि 20 से 30 वर्ष आयुवर्ग के मरीजों में दवाओं से होने वाले कुप्रभाव के मामले सबसे अधिक दर्ज किए गए। इसका प्रमुख कारण युवाओं में स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता मानी जा रही है, जो दवा लेने के बाद होने वाली परेशानी को तुरंत डाक्टरों या स्वास्थ्य कर्मियों को बताते हैं वहीं इससे अधिक आयु वर्ग के लोग कई बार दुष्प्रभाव को सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, और एलर्जी को ध्यान में रखे बिना दवा देना जिससे स्थिति गंभीर हो सकती है। दुष्प्रभाव का बड़ा कारण है।

पाचन तंत्र पर दुष्यभाव

उक्त अध्ययन में यह भी पाया गया कि नसों के जरिये दी जाने वाली दवाइयों से कुप्रभाव की आशंका अधिक रहती है। 35 प्रतिशत मामलों में त्वचा और चमड़ी से जुड़ी समस्याएं जैसे रैशेज, खुजली और एलर्जी सामने आईं, जबकि लगभग 30 प्रतिशत मामलों में पेट और पाचन तंत्र से जुड़ी परेशानियां जैसे उल्टी, दस्त और पेट दर्द दर्ज किए गए।

दुष्प्रभाव के सामान्य कारण

उम्र, वजन, किडनी - लिवर की कार्यक्षमता, पुरानी बीमारियों और एलर्जी को ध्यान रखे बिना दवा देना दुष्प्रभाव का बड़ा कारण है। हर दवा की खुराक तय होती है। इससे अधिक खुराक लेने पर उल्टी, चक्कर, सुस्ती, ब्लड प्रेशर गिरना, किडनी या लिवर पर असर जैसे दुष्प्रभाव हो सकते हैं। कई मरीज एक साथ कई दवाएं लेते हैं या अलग-अलग डाक्टरों से इलाज कराते हैं। इससे भी दवाओं के बीच प्रतिक्रिया हो सकती है। भर्ती मरीजों में यह खतरा ज्यादा होता है, क्योंकि उन्हें इंजेक्शन, एंटीबायोटिक, दर्द निवारक और अन्य दवाएं एक साथ दी जाती हैं।

इन गलतियों से बचें

दवा समय पर न लेना, बीच में दवा छोड़ देना, खुद से खुराक बदलना, पुरानी बची दवा दोबारा लेना या दूसरों की दवा लेना। भर्ती मरीजों या उनके परिजनों द्वारा घर से लाई गई दवा बिना बताए लेना भी खतरनाक हो सकता है। यदि दवा लेने के बाद तेज खुजली, सांस लेने में दिक्कत, चेहरे या होंठों में सूजन, अत्यधिक नींद, उलझन, लगातार उल्टी-दस्त, पेशाब कम होना या त्वचा पर चकते दिखें तो इसे नजरअंदाज न करें। घर पर इलाज कर रहे मरीज तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें और भर्ती मरीज बिना देर किए नर्स या डाक्टर को जानकारी दें।

बचाव के उपायदवाइयां पर्चे के अनुसार लें।
सभी चल रही दवाओं और एलर्जी की जानकारी डाक्टर को जरूर दें।
बिना पूछे कोई दवा न लें और दुष्प्रभाव दिखने पर तुरंत बताएं।
डिस्चार्ज के समय दवाओं की सूची और खुराक ठीक से समझ लेना जरूरी है।
सही जानकारी, सतर्कता और निगरानी से घर और अस्पताल दोनों जगह दवाओं के दुष्प्रभाव से काफी हद तक बचा जा सकता है।
दिल्ली की जहरीली हवा का 'जेंडर' कनेक्शन, महिलाओं से ज्यादा पुरुषों के फेफड़ों में भर रहा है जहर

दिल्ली की जहरीली हवा का 'जेंडर' कनेक्शन, महिलाओं से ज्यादा पुरुषों के फेफड़ों में भर रहा है जहर

दिल्ली की जहरीली हवा का 'जेंडर' कनेक्शन, महिलाओं से ज्यादा पुरुषों के फेफड़ों में भर रहा है जहर


दिल्ली में वायु प्रदूषण (Air Pollution) एक गंभीर समस्या है। एक अध्ययन के अनुसार, पुरुषों के फेफड़ों में महिलाओं की तुलना में ज्यादा प्रदूषक कण जमा होत ...और पढ़ें




महिलाओं से ज्यादा पुरुषों को नुकसान पहुंचा रहा है प्रदूषण (Picture Courtesy: Freepik)

 दिल्ली जैसे महानगरों में वायु प्रदूषण (Delhi Air Pollution) एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या बन चुका है। राजधानी में फैली जहरीली हवा से बच्चे हों या युवा हर किसी की सेहत को नुकसान पहुंच रहा है। ऐसे में हाल की एक स्टडी में पता चला है कि महिलाओं की तुलना में पुरुषों के फेफड़ों में ज्यादा मात्रा में प्रदूषक कण जमा हो रहे हैं।


नेताजी सुभाष यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी, दिल्ली और नोएडा स्थित एक पर्यावरण परामर्श संस्था के एक अध्ययन (2019–2023) में यह बात सामने आई है कि पुरुष प्रदूषण के ज्यादा संपर्क में हैं और इसका असर उनके स्वास्थ्य पर गहरा पड़ रहा है।





(Picture Courtesy: AI Generated Image)
पुरुषों में प्रदूषण का ज्यादा असर क्यों?

इस अध्ययन में पीएम2.5 और पीएम10 जैसे खतरनाक कणों की रेस्पिरेटरी डिपॉजिशन डोज यानी सांस के जरिए फेफड़ों में जमा होने वाली प्रदूषक मात्रा को मापा गया। नतीजों के अनुसार, पीएम2.5 के मामले में बैठने की स्थिति में पुरुषों की RDD महिलाओं की तुलना में 1.4 गुना ज्यादा पाई गई, जबकि चलने की स्थिति में यह करीब 1.2 गुना ज्यादा रहा। इसी तरह पीएम10 के लिए भी बैठने पर पुरुषों की RDD 1.34 गुना और चलने पर 1.15 गुना ज्यादा दर्ज की गई।


इसके पीछे एक बड़ा कारण पुरुषों की लाइफस्टाइल और काम की प्रकृति है। अध्ययन से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार, पुरुषों की संख्या ज्यादा है जो बाहर काम करते हैं, जैसे कंस्ट्रक्शन साइट, फैक्ट्रियां, सड़क किनारे की नौकरियां और दैनिक मजदूरी। सुबह और शाम के व्यस्त समय में यात्रा करने वाले कामकाजी लोग और छात्र भी प्रदूषण के ज्यादा संपर्क में आते हैं।

शारीरिक अंतर भी निभाता है भूमिका

शोध में यह भी बताया गया कि पुरुषों और महिलाओं की रेस्पिरेटरी प्रोसेस अलग होता है। पुरुषों का टाइडल वॉल्यूम यानी एक सांस में अंदर जाने वाली हवा की मात्रा ज्यादा होती है, जिससे प्रदूषक कण फेफड़ों के अंदर ज्यादा गहराई तक पहुंच जाते हैं।


वहीं, महिलाओं की सांस लेने की फ्रीक्वेंसी ज्यादा होती है, लेकिन बाहरी प्रदूषण के संपर्क में कम रहने के कारण कुल जमा प्रदूषण पुरुषों में ज्यादा पाया गया। एक्सपर्ट्स का यह भी कहना है कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में ज्यादा समय घर के अंदर रहती हैं, जहां उन्हें इनडोर पॉल्यूशन का सामना करना पड़ता है।

सबसे ज्यादा खतरे वाले इलाके

स्टडी में इंडस्ट्रियल एरिया को सबसे ज्यादा प्रदूषित बताया गया, जहां पीएम2.5 और पीएम10 की RDD सबसे ज्यादा दर्ज की गई। इसके बाद व्यावसायिक और रिहायशी इलाके आते हैं। इंडस्ट्रियल एरिया में पुरुषों भी पुरुष महिलाओं की तुलना में ज्यादा प्रदूषण के संपर्क में आए। चिंताजनक बात यह है कि चलने की स्थिति में पुरुषों की RDD राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों (NAAQS) और WHO के स्तर से 10 से 40 गुना तक ज्यादा पाई गई।

स्वास्थ्य पर गंभीर दुष्परिणाम

फेफड़ों में प्रदूषक कणों का ज्यादा जमाव अस्थमा, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) और अन्य सांस संबंधी बीमारियों के खतरे को बढ़ाता है। लंबे समय तक यह स्थिति गंभीर स्वास्थ्य और आर्थिक बोझ का कारण बन सकती है। कुल मिलाकर, यह स्टडी बताती है कि प्रदूषण सभी को प्रभावित करता है, लेकिन इसका बोझ समान नहीं है।
क्या आप भी दिमाग तेज करने के लिए ले रहे हैं सप्लीमेंट्स? डॉक्टर ने कहा 2 चीजों का तालमेल है बेहद जरूरी

क्या आप भी दिमाग तेज करने के लिए ले रहे हैं सप्लीमेंट्स? डॉक्टर ने कहा 2 चीजों का तालमेल है बेहद जरूरी

क्या आप भी दिमाग तेज करने के लिए ले रहे हैं सप्लीमेंट्स? डॉक्टर ने कहा 2 चीजों का तालमेल है बेहद जरूरी


आजकल हर कोई अपने दिमाग को तेज और याददाश्त को दुरुस्त रखना चाहता है। बाजार में ऐसे कई सप्लीमेंट्स और एंटीऑक्सीडेंट्स मौजूद हैं जो बढ़ती उम्र में भी दिमा ...और पढ़ें



दिमागी सेहत का असली राज सप्लीमेंट्स नहीं, आपका लाइफस्टाइल है; जानें कैसे (Image Source: AI-Generated)

 लंबे समय तक यही माना जाता रहा कि उम्र बढ़ने के साथ मानसिक कमजोरी आना एक सामान्य बात है, लेकिन नई मेडिकल रिसर्च बताती है कि अगर हम 'ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस' को कम करें, तो दिमाग को नुकसान से बचाया जा सकता है।


हमारा दिमाग शरीर की बहुत ज्यादा ऑक्सीजन का इस्तेमाल करता है, जिससे यह बाहरी नुकसान के प्रति बहुत संवेदनशील हो जाता है। प्रदूषण, खराब नींद, तनाव और ज्यादा चीनी वाला भोजन हमारे दिमाग की कोशिकाओं को कमजोर कर देता है, जिससे याददाश्त कमजोर होने और अल्जाइमर जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।


आइए, डॉ. शीतला प्रसाद पाठक (प्रिंसिपल कंसल्टेंट, न्यूरोसाइंसेस और न्यूरोलॉजी, मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, वैशाली) से इस बारे में विस्तार से जानते हैं।



(Image Source: AI-Generated)
नेचुरल एंटीऑक्सीडेंट्स का जादू

डॉक्टर के अनुसार, विटामिन C, E, बीटा-कैरोटीन और सेलेनियम जैसे एंटीऑक्सीडेंट्स दिमाग की सुरक्षा के लिए जरूरी हैं। इनके लिए गोलियों या सप्लीमेंट्स पर निर्भर रहने के बजाय प्राकृतिक स्रोतों को चुनना सबसे बेहतर है।बेहतरीन स्रोत: बेरीज, मेवे, पत्तेदार सब्जियां और जैतून का तेल।
खास डाइट: रिसर्च से पता चला है कि 'MIND' डाइट और 'मेडिटेरेनियन' डाइट लेने वाले लोगों में मानसिक गिरावट बहुत धीमी होती है।
कब जरूरी हैं सप्लीमेंट्स?

डॉक्टर बताते हैं कि सप्लीमेंट्स तभी लेने चाहिए जब शरीर में किसी खास पोषक तत्व की कमी हो।
ओमेगा-3 फैटी एसिड: यह दिमाग की कोशिकाओं के बीच संचार को बेहतर बनाता है।
विटामिन B-कॉम्प्लेक्स: B12 और फोलेट नसों को नुकसान से बचाते हैं। यह खासकर बुजुर्गों और शाकाहारी लोगों के लिए फायदेमंद हो सकते हैं।
सावधानी जरूरी है: बहुत से लोग सोचते हैं कि ज्यादा सप्लीमेंट्स लेने से ज्यादा फायदा होगा, लेकिन यह खतरनाक हो सकता है।

उदाहरण के तौर पर, विटामिन E की बहुत ज्यादा मात्रा शरीर में ब्लीडिंग का खतरा बढ़ा सकती है। बिना डॉक्टरी सलाह के कोई भी सप्लीमेंट लेना आपकी सेहत पर भारी पड़ सकता है।




(Image Source: AI-Generated)
हेल्दी लाइफस्टाइल है सबसे बड़ी दवा

डॉक्टर का साफ कहना है कि एंटीऑक्सीडेंट्स अकेले जादू नहीं कर सकते। ऐसे में, अगर आपका लाइफस्टाइल खराब है, तो कोई भी सप्लीमेंट काम नहीं करेगा। जी हां, दिमाग को स्वस्थ रखने के लिए ये 4 बातें बेहद जरूरी हैं:
भरपूर और गहरी नींद
रेगुलर फिजिकल एक्टिविटी
स्ट्रेस का सही मैनेजमेंट
ब्लड प्रेशर और शुगर लेवल पर कंट्रोल

दिमाग को तेज रखने का भविष्य केवल दवाओं में नहीं, बल्कि संतुलित भोजन और सही आदतों में छिपा है। सप्लीमेंट्स केवल एक सहारा हो सकते हैं, लेकिन वे हेल्दी लाइफस्टाइल का विकल्प नहीं हैं। इसलिए, किसी भी सप्लीमेंट को शुरू करने से पहले हमेशा अपने डॉक्टर से सलाह लें ताकि वे आपकी व्यक्तिगत जरूरतों के हिसाब से सही मार्गदर्शन दे सकें।
सर्दी में हेल्दी रहने के लिए एक्सपर्ट ने बताया क्या न खाएं, आपका फेवरेट च्यवनप्राश और आंवला कैंडी भी हैं शामिल

सर्दी में हेल्दी रहने के लिए एक्सपर्ट ने बताया क्या न खाएं, आपका फेवरेट च्यवनप्राश और आंवला कैंडी भी हैं शामिल

सर्दी में हेल्दी रहने के लिए एक्सपर्ट ने बताया क्या न खाएं, आपका फेवरेट च्यवनप्राश और आंवला कैंडी भी हैं शामिल

सर्दी का मौसम आते ही आंवला कैंडी, च्यवनप्राश जैसी कई चीजें हम अपनी डाइट में शामिल कर लेते हैं (Winter Health Tips)। इसके पीछे हमारा मानना होता है कि इ ...और पढ़ें







सर्दी के मौसम में क्या न खाएं? (Picture Courtesy: Freepik)


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। सर्दी का मौसम अपने साथ कोहरा, सर्द हवाएं और सेहत से जुड़ी चुनौतियां लेकर आता है। इस मौसम में इम्युनिटी मजबूत रखना और शरीर को अंदर से गर्म रखना जरूरी हो जाता है (Winter Health Care)। लेकिन अक्सर हम कुछ ऐसी ‘हेल्दी’ दिखने वाली चीजों खाना शुरू करने लगते हैं, जो असल में हमारी सेहत के लिए फायदेमंद कम, नुकसानदेह ज्यादा साबित होती हैं।


जी हां, इन्हीं चीजों के बारे में न्यूट्रिशन एक्सपर्ट अमिता गादरे ने एक विडियो शेयर करके बताया। आइए जानें एक्सपर्ट के मुताबिक, सर्दी के मौसम में हेल्दी रहने के लिए किन चीजों (Foods to Avoid in Winter) को नहीं खाना चाहिए।


आंवला कैंडी

आंवला विटामिन-सी और एंटीऑक्सीडेंट्स का भंडार है, लेकिन आंवला कैंडी इसका हेल्दी रिप्लेसमेंट नहीं है। अमिता बताती हैं, "आंवला बहुत अच्छा है, लेकिन आंवला कैंडी नहीं। इसमें चीनी की मात्रा बहुत ज्यादा होती है।" इसकी जगह ताजे आंवले को कद्दूकस करके चटनी, दाल, सब्जी या सलाद में शामिल करें। इससे आपको आंवले के पूरे फायदे बिना एक्स्ट्रा चीनी के मिलेंगे।

ड्राई फ्रूट लड्डू

सर्दियों में घर-घर ड्राई फ्रूट के लड्डू बनते हैं। ये पोषक तत्वों से भरपूर जरूर होते हैं, लेकिन इनमें कैलोरी भी बहुत ज्यादा होती है। अमिता सलाह देती हैं, "एक लड्डू में आसानी से लगभग 200 कैलोरी हो सकती है। अगर आप वजन कम करना चाह रहे हैं, तो मुट्ठी भर नट्स ही काफी हैं।" ड्राई फ्रूट्स को संयम के साथ खाना सेहत के लिए काफी जरूरी है।

च्यवनप्राश

च्यवनप्राश को सर्दियों की सेहत का अचूक उपाय माना जाता है, लेकिन अमिता इसे एक ‘अनपॉपुलर ओपिनियन’ देते हुए कहती हैं, "च्यवनप्राश ऐसी चीज है जिसकी आपको असल में जरूरत नहीं है। एक हरी सब्जियों का सूप च्यवनप्राश की तुलना में कहीं ज्यादा एंटीऑक्सीडेंट्स देता है और च्यवनप्राश में भी शुगर की मात्रा ज्यादा होती है। इसलिए किसी को इसकी जरूरत नहीं, बच्चों को भी नहीं।"
रेडी-पैकेज्ड सूप

सर्दी में गर्मागर्म सूप सुकून देता है, लेकिन बाजार में मिलने वाले रेडी-पैकेज्ड सूप से सावधान रहें। अमिता चेतावनी देती हैं, "रेडी-पैकेज्ड सूप में बहुत ज्यादा सोडियम होता है और बाकी पोषक तत्व मुश्किल से होते हैं।" इनकी जगह घर पर ताजी सब्जियों, मसालों और हर्ब्स से बना सूप पिएं। यह पौष्टिक भी होगा और स्वादिष्ट भी।

बहुत सारा घी

सर्दियों में घी या गर्म तासीर वाली चीजें ज्यादा खाना शुरू कर देते हैं। लेकिन अमिता इस बात पर जोर देती हैं कि इस मौसम में हमारी शारीरिक गतिविधि आमतौर पर कम हो जाती है। सर्दियों में हम कम चलते-फिरते हैं, आराम से रहना चाहते हैं और स्वभाविक रूप से थोड़े आलसी हो जाते हैं। ऐसे में हमें ज्यादा फैट से मिलने वाली कैलोरी की जरूरत नहीं होती। इसलिए सीमित मात्रा में घी खाएं।
सिर्फ स्पाइसी फूड को न दें दोष, न्यूट्रिशनिस्ट ने कहा- एसिडिटी की सही वजह बताएंगे 6 जरूरी टेस्ट

सिर्फ स्पाइसी फूड को न दें दोष, न्यूट्रिशनिस्ट ने कहा- एसिडिटी की सही वजह बताएंगे 6 जरूरी टेस्ट

सिर्फ स्पाइसी फूड को न दें दोष, न्यूट्रिशनिस्ट ने कहा- एसिडिटी की सही वजह बताएंगे 6 जरूरी टेस्ट


हम अक्सर यह मान लेते हैं कि सीने में जलन या एसिडिटी का कारण सिर्फ तीखा या मसालेदार खाना है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि कई बार असली वजह आपकी प्लेट में ...और पढ़ें




एसिडिटी की जड़ तक ले जाएंगे 6 हेल्थ टेस्ट (Image Source: AI-Generated)


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या आपको भी लगता है कि एसिडिटी और सीने में जलन का एकमात्र दुश्मन 'मिर्च-मसालेदार खाना' है? हम अक्सर अपनी पसंद का खाना छोड़ देते हैं, फिर भी जलन कम होने का नाम नहीं लेती। आखिर ऐसा क्यों होता है?


सच्चाई यह है कि असली 'मुजरिम' हमेशा आपकी थाली में नहीं, बल्कि आपके शरीर के अंदर छिपा होता है। कभी-कभी सादा खाना भी आपको परेशान कर सकता है क्योंकि समस्या खाने में नहीं, बल्कि आपके सिस्टम में है।

न्यूट्रिशनिस्ट आशिमा अचंतानी ने उन 6 छिपे हुए कारणों (Hidden Reasons for Acidity) का खुलासा किया गया है जो चुपके से एसिडिटी पैदा करते हैं और जिनके बारे में शायद आपको अब तक पता भी नहीं होगा।
आयरन की कमी

कई बार एसिडिटी का संबंध आयरन की कमी से होता है। जब पेट में एसिड कम बनता है, तो शरीर ठीक से आयरन को सोख नहीं पाता (Low Iron Absorption)। यह असंतुलन आपकी समस्या की एक बड़ी वजह हो सकता है।
हाई होमोसिस्टीन

अगर आपके शरीर में Vitamin-B12 और फोलेट का संतुलन बिगड़ जाए, तो 'होमोसिस्टीन' का स्तर बढ़ जाता है। इसके कारण पेट की परत कमजोर हो जाती है, जिससे पाचन संबंधी समस्याएं शुरू हो जाती हैं।


इंसुलिन रेजिस्टेंस

क्या आपको कभी ऐसा लगता है कि खाना पेट में फंसा हुआ है और पच नहीं रहा? यह 'इंसुलिन रेजिस्टेंस' का संकेत हो सकता है, जो एसिडिटी का एक बड़ा और छिपा हुआ कारण है।


मैग्नीशियम की कमी

हमारे पेट में एक वाल्व होता है जो एसिड को ऊपर आने से रोकता है। मैग्नीशियम की कमी से यह वाल्व ढीला पड़ जाता है, जिससे पेट का एसिड भोजन नली में वापस आने लगता है और जलन होती है।

स्ट्रेस और कोर्टिसोल

तनाव सिर्फ दिमाग को ही नहीं, पेट को भी खराब करता है। ज्यादा स्ट्रेस और बढ़ा हुआ कोर्टिसोल हार्मोन पेट में एसिड के उत्पादन को बिगाड़ देते हैं, जिससे आप परेशान रहते हैं।
एच. पाइलोरी संक्रमण

यह एक खास तरह का बैक्टीरिया है जो पेट में एसिडिटी और अल्सर को ट्रिगर करता है। यह संक्रमण कई बार बार-बार होने वाली एसिडिटी की मुख्य जड़ होता है।

इसलिए, सिर्फ लक्षणों को दबाने से काम नहीं चलेगा। अगर आप एसिडिटी से हमेशा के लिए छुटकारा पाना चाहते हैं, तो ऊपर दिए गए असली कारणों को पहचानें और उनका इलाज करें।
इस साल इन 5 बीमारियों का रहा सबसे ज्यादा खौफ, आने वाले समय में भी रहना होगा सतर्क

इस साल इन 5 बीमारियों का रहा सबसे ज्यादा खौफ, आने वाले समय में भी रहना होगा सतर्क

इस साल इन 5 बीमारियों का रहा सबसे ज्यादा खौफ, आने वाले समय में भी रहना होगा सतर्क


साल 2025 अब विदा ले रहा है। अगर हम इस साल को पलट कर देखें, तो यह साल सेहत के लिहाज से काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा। एक तरफ मेडिकल साइंस ने तरक्की की, तो दूस ...और पढ़ें




साल 2025 में इन बीमारियों ने बढ़ाई दुनियाभर की चिंता (Image Source: AI-Generated)

युवाओं में तेजी से बढ़े साइलेंट हार्ट अटैक के मामले


सुपर फ्लू और जिद्दी खांसी ने किया परेशान


डेंगू के नए रूप ने बढ़ाई अस्पतालों में भीड़


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। साल 2025 अब अलविदा कह रहा है, लेकिन सेहत के लिहाज से यह साल हमें कई खौफनाक अनुभव देकर जा रहा है। एक तरफ जहां 2025 में टेक्नोलॉजी और AI ने हमारी जिंदगी आसान बनाई, वहीं दूसरी तरफ हमारे शरीर ने कई परेशानियों को झेला। यह वो साल था जब बीमारी ने 'उम्र' देखना बंद कर दिया- क्या बच्चे और क्या जवान, इस साल अस्पताल की लाइनों में हर कोई खड़ा मिला।


जी हां, कोविड का साया तो धुंधला पड़ गया, लेकिन 2025 में सेहत से जुड़ी इन 5 समस्याओं ने ऐसा कोहराम मचाया कि डॉक्टर भी हैरान रह गए। आइए, साल के आखिरी पन्नों को पलटते हैं और जानते हैं उन बीमारियों के बारे में जिन्होंने इस साल सबसे ज्यादा डर पैदा किया...


युवाओं में 'साइलेंट हार्ट अटैक'

इस साल की सबसे डरावनी हेडलाइन्स दिल की बीमारियों से जुड़ी रहीं। पहले यह बीमारी 50 पार के लोगों की मानी जाती थी, लेकिन 2025 में 25 से 40 साल के फिट दिखने वाले युवाओं में हार्ट अटैक के मामले तेजी से बढ़े। जिम में कसरत करते हुए या ऑफिस में काम करते हुए अचानक दिल का दौरा पड़ना एक बड़ी चिंता का विषय बन गया।
वजह: जरूरत से ज्यादा तनाव, खराब खानपान और बिना मेडिकल सलाह के हैवी वर्कआउट।


'सुपर फ्लू' और जिद्दी खांसी

क्या आपको याद है इस साल का वह दौर जब हर दूसरे घर में कोई न कोई खांस रहा था? 2025 में इन्फ्लूएंजा के ऐसे वैरिएंट देखे गए, जिसमें बुखार तो 3 दिन में ठीक हो गया, लेकिन खांसी 3-4 हफ्तों तक नहीं गई। इसे डॉक्टरों ने 'लॉन्ग लास्टिंग कफ' का नाम दिया। एंटीबायोटिक्स का असर कम होना भी इस साल एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा।

डेंगू का बदलता रूप

आमतौर पर डेंगू बरसात के बाद खत्म हो जाता है, लेकिन 2025 में जलवायु परिवर्तन के कारण डेंगू का प्रकोप नवंबर-दिसंबर तक देखा गया। इस बार डेंगू के ऐसे मामले सामने आए जिनमें प्लेटलेट्स गिरने के साथ-साथ लिवर पर भी असर पड़ा। मच्छरों से होने वाली इस बीमारी ने अस्पतालों में सबसे ज्यादा भीड़ बढ़ाई।

प्रदूषण जनित सांस की तकलीफें

साल के अंत तक आते-आते खराब हवा (AQI) ने लोगों का दम घोंट दिया। अस्थमा और ब्रोंकाइटिस सिर्फ मरीजों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि स्वस्थ लोगों को भी सांस लेने में भारीपन महसूस हुआ। छोटे बच्चों में नेब्युलाइजर की जरूरत इस साल सबसे ज्यादा महसूस की गई।

फैटी लिवर

साल 2025 में पेट और पाचन से जुड़ी समस्याओं में सबसे ज्यादा खौफ 'नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर' का रहा। पहले माना जाता था कि लिवर सिर्फ शराब पीने वालों का खराब होता है, लेकिन इस साल यह भ्रम टूट गया। हेल्थ चेकअप्स के आंकड़े बताते हैं कि इस साल बड़ी तादाद में बच्चों और युवाओं के लिवर में सूजन पाई गई। वजह है- पिज्जा, बर्गर जैसे जंक फूड का बढ़ता चलन, शुगरी ड्रिंक्स और फिजिकल एक्टिविटी की कमी।



डरें नहीं, सतर्क रहें

बीमारियों के नए नाम सुनकर घबराने से कुछ नहीं होगा, बल्कि तनाव और बढ़ेगा। साल 2025 ने हमें सिखाया है कि "इलाज से बेहतर बचाव है"। आने वाला साल आपके और आपके परिवार के लिए सुरक्षित रहे, इसके लिए आपको अपनी दिनचर्या में ये जरूरी बदलाव करने होंगे:
लक्षण दिखने का इंतजार न करें: हम अक्सर डॉक्टर के पास तब जाते हैं जब बीमारी बहुत बढ़ जाती है। इस आदत को बदलें। भले ही आप खुद को कितना भी फिट महसूस करें, साल में एक बार 'फुल बॉडी चेकअप' जरूर कराएं।
'डॉक्टर गूगल' से बचें: आजकल हल्की सी खांसी या सिरदर्द होने पर लोग इंटरनेट पर लक्षण खोजते हैं और खुद ही दवाई ले लेते हैं। यह बहुत खतरनाक ट्रेंड है। 2025 में कई केस बिगड़े क्योंकि लोगों ने सही समय पर सही डॉक्टर को नहीं दिखाया।
अपने दिल और लिवर को 'एक्टिव' रखें: जिम जाकर भारी वजन उठाना ही कसरत नहीं है। दिल और लिवर को स्वस्थ रखने के लिए रोजाना 30 से 40 मिनट की वॉक काफी है। अगर आप दिन भर कुर्सी पर बैठकर काम करते हैं, तो हर एक घंटे बाद 5 मिनट का ब्रेक लेकर टहलें।
ऐसी रखें डाइट: इम्युनिटी बढ़ाने के लिए कोई जादुई गोली नहीं आती, यह आपके खाने से आती है। अपनी प्लेट में सिर्फ रोटी-चावल नहीं, बल्कि रंग-बिरंगी सब्जियां और फल शामिल करें।
प्रदूषण और संक्रमण से बेसिक सुरक्षा: फ्लू और प्रदूषण अभी खत्म नहीं हुए हैं। जब भी आप भीड़भाड़ वाली जगह जाएं या शहर में प्रदूषण का स्तर ज्यादा हो, तो मास्क पहनने में शर्म न करें। वहीं, बाहर से आने के बाद हाथ धोने की आदत को न छोड़ें।
दुनिया के 60% दिल के मरीज सिर्फ भारत में? हार्ट अटैक से बचना है, तो आज ही शुरू करें ये 3 एक्सरसाइज

दुनिया के 60% दिल के मरीज सिर्फ भारत में? हार्ट अटैक से बचना है, तो आज ही शुरू करें ये 3 एक्सरसाइज

दुनिया के 60% दिल के मरीज सिर्फ भारत में? हार्ट अटैक से बचना है, तो आज ही शुरू करें ये 3 एक्सरसाइज


हार्ट आपके शरीर में सबसे अहम मसल है और इसको सेहतमंद रखने के लिए सिर्फ डाइट ही नहीं एक्सरसाइज भी जरूरी है। भले ही आप बहुत ज्यादा एक्सरसाइज ना करते हों, ...और पढ़ें




दिल को दुरुस्त रखने के लिए 3 कमाल की एक्सरसाइज (Picture Credit- AI Generated)

 भारत में हार्ट डिजीज मौत की सबसे बड़ी वजहों में से एक है। इंडियन हार्ट एसोसिएशन के अनुसार पूरी दुनिया में होने वाली दिल की बीमारियों में 60% भागीदारी भारत की है। ये आंकड़े बताते हैं कि दिल को बीमार होने से पहले ही उसकी देखभाल कितनी जरूरी है।


सही खानपान के साथ-साथ सही एक्सरसाइज भी आपकी हार्ट हेल्थ को बेहतर बनाने में कारगर हैं। आइए, ऐसी ही 3 एक्सरसाइज के बारे में जानें जो दिल को सेहतमंद रखने में मददगार हो सकती हैं।
एरोबिक एक्सरसाइज

यह एक्सरसाइज कार्डियो कहलाती है। यह स्टेमिना के लिए काफी अच्छा माना जाता है। जब आप एरोबिक एक्सरसाइज करते हैं तो हार्ट रेट बढ़ने के साथ-साथ पसीना भी आता है। इससे ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है और ब्लड प्रेशर भी कम होता है। एरोबिक एक्सराइज के लिए आप वॉकिंग, स्वीमिंग, जॉगिंग करने के साथ-साथ बैडमिंटन, बास्केटबॉल जैसे गेम भी खेल सकते हैं।



स्ट्रेंथ ट्रेनिंग

इससे आपकी रेजिस्टेंस क्षमता बढ़ती है और जिन लोगों के शरीर में ज्यादा चर्बी जमा हो गई है उनके फैट को कम करने में मददगार है। एरोबिक एक्सराइज के साथ स्ट्रेंथ ट्रेनिंग को मिलाने से गुड कोलेस्ट्रॉल के स्तर को बढ़ाने और बैड कोलेस्ट्रॉल के लेवल को कम करने में मदद मिलती है। हालांकि, रेजिस्टेंस ट्रेनिंग से पहले अपने डॉक्टर या एक्सपर्ट से जरूर सलाह लें।

स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज

भले ही यह सीधे तौर पर हार्ट हेल्थ में मदद ना करती हो लेकिन यह लचीलापन बढ़ाती है। ऐसा होने से एक्सरसाइज के दौरान मांसपेशियों में ऐंठन, जोड़ों में दर्द और मसल पर स्ट्रेन नहीं पड़ता।
इन बातों का रखें ध्यानकोई भी एक्सरसाइज करने से पहले वॉर्म अप करना न भूलें। इससे आपकी हार्ट रेट धीरे-धीरे बढ़ती है और हार्ट पर एकदम से दबाव नहीं पड़ता और एक्सरसाइज के दौरान दिल की धड़कनों के असामान्य रूप से बढ़ जाने का खतरा कम हो जाता है।
एक्सरसाइज के बाद कूलिंग डाउन भी उतना ही जरूरी है। वर्कआउट के बाद हार्ट रेट, बॉडी का तापमान बढ़ता है और ब्लड वेसल्स फैलती हैं। यदि आप एकदम से एक्सराइज करना बंद कर देते हैं तो चक्कर जैसा महसूस हो सकता है या तबीयत खराब लग सकती है।
स्ट्रेचिंग एक्सराइज को कूल डाउन सेशन के दौरान करने की सलाह दी जाती है, क्योंकि इससे मसल्स में लैक्टिक एसिड बनने की मात्रा कम करने में मदद मिल सकती है। ऐसा होने से मसल्स क्रैम्प या उनमें कड़ापन होने की शिकायत कम हो सकती है।
थकान, बदन दर्द और झड़ते बाल... कहीं आपके शरीर में 'माइक्रोन्यूट्रिएंट्स' की कमी तो नहीं?

थकान, बदन दर्द और झड़ते बाल... कहीं आपके शरीर में 'माइक्रोन्यूट्रिएंट्स' की कमी तो नहीं?

थकान, बदन दर्द और झड़ते बाल... कहीं आपके शरीर में 'माइक्रोन्यूट्रिएंट्स' की कमी तो नहीं?


शरीर के विकास व प्रतिरक्षा के लिए सूक्ष्म पोषक तत्व (माइक्रोन्यूट्रिएंट्स) अल्प मात्रा में ही सही, पर अति आवश्यक होते हैं। इनकी कमी सेहत के लिए गंभीर ...और पढ़ें




शरीर के लिए बेहद जरूरी हैं माइक्रोन्यूट्रिएंट्स (Image Source: AI-Generated)

बालों का झड़ना, हाथों-पैरों में जलन महसूस होना, बार-बार बीमार पड़ना, घाव का धीरे-धीरे भरना, हड्डियों में दर्द होना आदि शरीर में कम या असंतुलित होते विटामिंस और मिनरल्स के संकेत हैं। अगर समय रहते इन माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की भरपाई नहीं की जाए, तो सामान्य जीवन भी मुश्किल होने लगता है।


हालांकि, स्वस्थ और संतुलित भोजन का थोड़ा सा भी खयाल रखा जाए तो इससे न केवल सभी आवश्यक सूक्ष्म पोषकों को भरपाई हो जाएगी, बल्कि लंबे समय तक हम सेहतमंद जीवन का आनंद भी उठा पाएंगे। प्रत्येक विटामिन और मिनरल की शरीर के विकास में खास भूमिका होती है।



माइक्रोन्यूट्रिएंट्स और उनके सोर्सबी1, बी2, बी 12 आदि दूध, साबुत अनाज, अंडे, मीट, मछली, मशरूम, अवाकाडो आदि ।
विटमिन-सी (एस्कार्बिक एसिड) : खट्टे फल, शिमला मिर्च, स्प्राउट्स आदि ।
विटामिन-ए : डेरी उत्पाद, मछली, शकरकंद, गाजर, पालक,
विटामिन-डी: सूर्य की रोशनी, फिश आयल, दूध आदि।
विटामिन-ई: सूरजमुखी बीज अंकुरित गेहूं, वादाम,
विटामिन-के: हरी सब्जियां, सोयाबीन, कद्दू
माइक्रोमिनरल्स के सोर्सकैल्शियम : दूध उत्पाद, पत्तेदार सब्जियां और ब्रोकली आदि ।
फास्फोरस : साल्मन मछली, दही।
मैग्नीशियम : बादाम, काजू, काली वींस
सोडियम : नमक, प्रोसेस्ड फूड, डिब्बाबंद सूप आदि ।
पोटेशियम : दाल, केला आदि।
सल्फर : लहसुन, प्याज, स्प्राउट्स, अंडे, मिनरल वाटर।



क्यों जरूरी हैं माइक्रोन्यूट्रिएंट्स?

विटामिंस और मिनरल्स (खनिज तत्व) ऐसे सूक्ष्म पोषक (माइक्रोन्यूट्रिएंट्स) तत्व होते हैं, जो शरीर की अलग-अलग सामान्य गतिविधियों के लिए अतिआवश्यक हैं। विटामिन-डी को छोड़कर सभी माइक्रो न्यूट्रिएंट्स के लिए हम आहार पर निर्भर होते हैं। हालांकि, शरीर को इनकी जरूरत बहुत ही सूक्ष्म मात्रा में ही होती है, पर शरीर सेहतमंद रहे, इसमें इनकी भूमिका बहुत बड़ी होती है। विटामिंस जहां शरीर को ऊर्जावान बनाए रखने, प्रतिरक्षा को मजबूत रखने, रक्त संचरण को सुचारु रखने में सहायक होते हैं, तो वहीं मिनरल्स शरीर के विकास, हड्डियों की मजबूती और द्रव संतुलन के लिए अनिवार्य हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) भी दुनियाभर में विटामिंस और मिनरल्स की अल्पता से होने वाली परेशानियों से निपटने के लिए अनेक स्तरों पर प्रयास कर रहा है।

भारतीयों में माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी

ज्यादतर वयस्क सूक्ष्म पोषक तत्वों की भरपाई संतुलित आहार के जरिये कर लेते हैं, लेकिन कुछ खास तरह के न्यूट्रिएंट्स की भरपाई के लिए अतिरिक्त उपाय करने की जरूरत होती है ।विटामिन-डी: आइसीएमआर के मुताबिक, 70 से 90 प्रतिशत भारतीयों में विटामिन-डी का स्तर कम पाया जाता है। विटामिन-डी यानी सनसाइन विटामिन हमारे मूड, हड्डियों और इम्युनिटी को प्रभावित करता है।
विटामिन-बी 12: नेशनल इंस्टीट्यूट आफ हेल्थ के मुताबिक, 47 प्रतिशत भारतीय आबादी में विटामिन बी12 की कमी देखी गई है। केवल 26 प्रतिशत भारतीयों में ही यह पर्याप्त होता है। यह लाल रक्त कोशिकाओं, डीएनए को सिंथेसाइज करने और न्यूरोलाजिकल हेल्थ के लिए आवश्यक है।
विटामिन-ए: सही पोषण नहीं होने के कारण बच्चों और महिलाओं में इसकी कमी होने की आशंका रहती है। आंखों की सही रोशनी और अलग-अलग संक्रमण से बचाव के लिए यह आवश्यक सूक्ष्म पोषक है।
आयरन: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के अनुसार, 15-49 वर्ष आयु वर्ग की भारतीय महिलाओं और पुरुषों में एनीमिया (आयरन की कमी) की प्रचलन दर क्रमशः 57 और 25 प्रतिशत है। इसकी कमी होने के कारण थकान, कमजोरी, शरीर का पीलापन, नाखून टूटने, सांस फूलने जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इसके लिए अंडे, मछली, दलों, हरी पत्तेदार सब्जियों, रागी, गुड़ आदि का सेवन लाभकारी होता है।
कैल्शियम: हड्डियों की सघनता बनाए रखने और फ्रैक्चर से बचाने में कैल्शियम की बड़ी भूमिका होती है। कैल्शियम की कमी होने के चलते रजोनिवृत्ति के बाद महिलाओं में ओस्टियोपोरोसिस की आशंका बढ़ जाती है। कैल्शियम की कमी होने के कारण हड्डियां कमजोर हो जाती हैं।



कैसे करें भरपाई?

विटामिन बी 12: अगर शाकाहारी हैं तो बी-12 की भरपाई बहुत मुश्किल हो जाती है। यह थोड़ा-बहुत दूध या इससे संबंधित उत्पादों में ही पाया जाता है। कुछ लोग मांसाहारी हैं, फिर भी उन्हें एंजाइम की कमी, पेट में एंटीबाडीज जैसे कारणों से दिक्कत हो सकती है। डायबिटीज की दवाई मेटफार्मिन के चलते भी बी12 का अवशोषण बाधित होता है। बैरियाटिक सर्जरी या आंतों की सर्जरी के चलते भी समस्या आ सकती है।


विटामिन-डी: इसके लिए एक ही प्राकृतिक स्रोत है सूर्य की रोशनी। इनडोर एक्टीविटी और प्रदूषण अधिक होने के चलते लोग सूर्य की पर्याप्त रोशनी से वंचित हो रहे हैं। इसकी भरपाई के लिए जरूरी है कि पहले जांच कराएं, भोजन की गुणवत्ता का विशेष ध्यान रखें और चिकित्सक से परामर्श करें।

कमी को न करें नजरअंदाज, सतर्कता बढ़ाएं

डॉ. आकांक्षा रस्तोगी (सीनियर कंसल्टेंट इंटरनल मेडिसिन, मेदांता अस्पताल, गुरुग्राम) का कहना है कि आमतौर पर लोगों में पांच तरह की समस्याएं देखी जाती हैं, डिहाइड्रेशन, आयरन, मैग्नीशियम, विटामिन-डी और विटामिन बी12 की कमी। कुछ लोगों में पोटैशियम की कमी हो जाती है। ऐसे लोग पानी खूब पिएं, फल खाएं और विटामिन डी बी 12, आयरन, मैग्नीशियम की जांचें कराते रहें। कुछ लोग मल्टीविटामिंस सप्लीमेंट लेते हैं। ऐसे में अगर स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज या व्यायाम नहीं करते हैं, तो केवल मल्टी विटामिन खाने से इसका अवशोषण सही ढंग से नहीं होता।



किस तरह के होते हैं लक्षण?

माइक्रोन्यूट्रिएंट्स कम होने पर कमजोरी, जल्दी थकान, बाल झड़ने जैसी समस्याएं होती हैं। इससे नाखून सफेद और टूटने लगते हैं व संक्रमण की आशंका रहती है।विटामिन-डी : हड्डियां कमजोर हो जाती हैं।
विटामिन-ए : रात में देखने में परेशानी होती है। दृष्टि कमजोर हो जाती है।
विटामिन सी : मसूढ़ों की समस्या होने लगती है, उसमें सूजन आने लगती है।
आयरन : महिलाओं में आयरन की कमी भारत में आम समस्या है।
विटामिन बी12 : नसों की परत को बनाने में सहायक होता है। कमी होने पर हाथों-पैरों में सुई चुभने जैसा एहसास होने लगता है।
कुछ उपयोगी सुझावभोजन में हरी सब्जियां, डेरी प्रोडक्ट, संतुलित आहार रखें।
प्रोटीन, फैट और कार्य का संतुलन रखना आवश्यक है।
केवल सेंधा नमक खाने से थायराइड की कमी हो जाती है।
हीमोग्लोबिन की जांच कराएं, जरूरत होने पर आयरन लें।
अगर बाहर का खाना अधिक खाते हैं, तो डाक्टर के परामर्श पर कीड़े मारने की दवाएं खाएं।
चुकंदर, अंजीर, काले चने, सेव, अनार खाएं। लोहे के बर्तन में बना भोजन अच्छा होता है।