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क्या सपने सिर्फ दिनभर की बातों का रीप्ले होते हैं? जानें हमारा ही दिमाग रात में क्यों खेलता है ये खेल

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क्या सपने सिर्फ दिनभर की बातों का रीप्ले होते हैं? जानें हमारा ही दिमाग रात में क्यों खेलता है ये खेल

हमारे सपने हमारे व्यक्तिगत गुणों और बाहरी अनुभवों का मिला-जुला मिश्रण होते हैं। ...और पढ़ें









 हमारे सपने काफी हद तक हमारी असल जिंदगी, विचारों और चिंताओं से जुड़े होते हैं। जिन विषयों पर हम दिन में सोचते हैं, वे अक्सर रात में सपनों में सामने आते हैं।

एक नए अध्ययन के अनुसार, सपनों की सामग्री रैंडम या अव्यवस्थित नहीं होती बल्कि यह व्यक्तिगत गुणों, जैसे कि मन की भटकने की प्रवृत्ति, सपनों में रुचि और नींद की गुणवत्ता, और बाहरी घटनाओं, जैसे कि कोविड-19 महामारी जैसे बड़े पैमाने पर सामाजिक अनुभवों के बीच एक कॉम्प्लेक्स इंटरैक्शन को दिखा सकती है।
3700 सपनों पर हुई इटली की रिसर्च

इटली के आइएमटी स्कूल फार एडवांस्ड स्टडीज लुका के शोधकर्ताओं ने 287 प्रतिभागियों से एकत्रित 3,700 से अधिक सपनों और जागृत अनुभवों की रिपोर्ट का विश्लेषण किया, जिनकी आयु 18 से 70 वर्ष के बीच थी। दो सप्ताह के दौरान प्रतिभागियों ने दैनिक अनुभवों को दर्ज किया, जबकि शोधकर्ताओं ने नींद के पैटर्न, संज्ञानात्मक क्षमताओं, व्यक्तिगत गुणों और मनोवैज्ञानिक विशेषताओं के बारे में जानकारी एकत्र की। शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों द्वारा दैनिक जीवन और सपनों का वर्णन करने के लिए उपयोग किए गए शब्दों का विश्लेषण किया।




(Picture Courtesy: Freepik)
वास्तविकता को आकार देते हैं सपने

उन्होंने कहा कि सपने केवल हमारे वेकिंग एक्सपीरिएंस को रिप्रोड्यूस नहीं करते, बल्कि उन्हें फिर से रिइंटरप्रेट भी करते हैं। दैनिक दिनचर्या के तत्व, जैसे काम का वातावरण, स्वास्थ्य देखभाल सेटिंग्स या शिक्षा, जैसे हैं, वैसे फिर से प्रकट नहीं होते बल्कि इन्हें जीवंत, समग्र परिदृश्यों में पुनर्गठित किया जाता है, जो अक्सर अलग-अलग संदर्भों को मिलाते हैं और अपरिचित परिदृश्यों में दृष्टिकोण को बदलते हैं। परिणाम बताते हैं कि सपने केवल वास्तविकता को नहीं दर्शाते, बल्कि इसे सक्रिय रूप से फिर से आकार देते हैं। यह अतीत के अनुभवों के टुकड़ों को कल्पित या प्रत्याशित अनुभवों के साथ एकीकृत करते हैं।


गतिशील प्रक्रिया हैं सपने

लेखकों ने लिखा कि जागृत रिपोर्टों की तुलना में सपने आत्म संदर्भित, विचार केंद्रित कथाओं से दृश्य स्थानिक विवरणों, कई पात्रों और अजीब घटनाओं से भरे संवेदनात्मक अनुभवों में बदल गए। उन्होंने कहा कि स्थिर गुण, जिसमें सपनों के प्रति दृष्टिकोण, मन की भटकने की प्रवृत्ति और व्यक्तिपरक नींद की गुणवत्ता शामिल हैं, ने सपनों की सामग्री को चयनात्मक रूप से प्रभावित किया।


आइएमटी स्कूल फार एडवांस्ड स्टडीज लुका में शोधकर्ता और मुख्य लेखक वेलेंटिना एल्से ने कहा, हमारे निष्कर्ष दिखाते हैं कि सपने केवल अतीत के अनुभवों का प्रतिबिंब नहीं हैं, बल्कि यह एक गतिशील प्रक्रिया है जो इस पर निर्भर करती है कि हम कौन हैं और हम क्या जीते हैं।
कोविड लाकडाउन के दौरान अध्ययन

एल्से ने कहा, बड़े पैमाने पर डाटा को गणनात्मक विधियों के साथ मिलाकर हम सपनों की सामग्री में ऐसे पैटर्न खोजने में सक्षम हुए जो पहले पहचानना कठिन था। सपनों में परिवर्तन व्यक्तियों के बीच भी भिन्न पाए गए। उदाहरण के लिए, जो लोग मन की भटकने के प्रति अधिक प्रवृत्त होते हैं, वे अधिक खंडित और तेजी से बदलते सपनों की रिपोर्ट करते हैं।
हीटवेव में वर्कआउट करते समय रहें सावधान, तेज गर्मी में एक्सरसाइज करने का ये है सबसे सही समय और तरीका

हीटवेव में वर्कआउट करते समय रहें सावधान, तेज गर्मी में एक्सरसाइज करने का ये है सबसे सही समय और तरीका

हीटवेव में वर्कआउट करते समय रहें सावधान, तेज गर्मी में एक्सरसाइज करने का ये है सबसे सही समय और तरीका

तेज गर्मी में सेहत को नुकसान से बचाने के लिए वर्कआउट करते समय सावधानी बरतनी जरूरी है। ...और पढ़ें






टाइट कपड़े और गलत समय का वर्कआउट पहुंचा सकता है अस्पताल! (Picture Courtesy: Freepik)

सुबह या शाम का समय वर्कआउट के लिए चुनें


पसीना निकलने पर शरीर को हाइड्रेटेड रखें


ढीले और हल्के रंग के कपड़े पहनकर एक्सरसाइज करें


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। दिल्ली-एनसीआर में पारा 42 डिग्री को छू चुका है। ऐसे में तपती गर्मी और लू के थपेड़ों को बीच खुद को फिट बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है। तेज गर्मी में अगर सावधानी न बरती जाए, तो वर्कआउट करना शरीर के लिए जितना फायदेमंद है, उतना ही जोखिम भरा भी हो सकता है।


गर्मी में एक्सरसाइज करते समय शरीर से पसीना ज्यादा निकलता है, जिससे डिहाइड्रेशन और हीट स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। अगर आप इस मौसम में भी अपनी फिटनेस रूटीन को बरकरार रखना चाहते हैं, तो आपको अपनी आदतों में कुछ जरूरी बदलाव करने होंगे। यहां कुछ जरूरी टिप्स दिए गए हैं जो गर्मी में सुरक्षित वर्कआउट करने में आपकी मदद करेंगे।

सही समय चुनें

कड़कती धूप में वर्कआउट करना आपके स्वास्थ्य को बिगाड़ सकता है। सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक एक्सरसाइज करने से बचें। गर्मी में एक्सरसाइज करने का सबसे अच्छा समय सुबह का वक्त है, जब वातावरण में थोड़ी ठंडक होती है। अगर सुबह समय नहीं मिल पाता, तो शाम को भी वर्कआउट कर सकते हैं।


हाइड्रेशन है सबसे जरूरी

गर्मी में पसीने के जरिए शरीर से जरूरी इलेक्ट्रोलाइट्स बाहर निकल जाते हैं। एक्सरसाइज शुरू करने से 20-30 मिनट पहले कम से कम 2 गिलास पानी पिएं। हर 15-20 मिनट में पानी की चुस्कियां लेते रहें। सादे पानी के अलावा नारियल पानी, नींबू पानी या ओआरएस का घोल लें, ताकि शरीर में सोडियम और पोटेशियम का संतुलन बना रहे।

पहनावे पर दें ध्यान

जिम के टाइट कपड़े गर्मी में परेशानी पैदा कर सकते हैं। हमेशा सूती या ड्राय-फिट फैब्रिक वाले ढीले कपड़े पहनें जो पसीने को सोख सकें और हवा का संचार होने दें। गहरे रंग के कपड़े गर्मी को सोखते हैं, इसलिए हल्के रंगों के कपड़े चुनें।

वार्म-अप और कूल-डाउन करें

गर्मी में मांसपेशियों पर तनाव जल्दी आता है। इसलिए सीधे हैवी वेट उठाने या तेज दौड़ने के बजाय 10 मिनट स्ट्रेचिंग और हल्का वार्म-अप करें। वर्कआउट खत्म करने के तुरंत बाद ठंडे पानी से न नहाएं। शरीर के तापमान को सामान्य होने दें, फिर रिलैक्स करें।

शरीर के संकेतों को पहचानें

वर्कआउट के जुनून में अक्सर हम शरीर की चेतावनी को अनदेखा कर देते हैं। अगर आपको चक्कर आना, तेज सिरदर्द, जी मिचलाना, उल्टी, मांसपेशियों में तेज ऐंठन या धड़कन का असामान्य रूप से तेज होने जैसा महसूस हो, तो तुरंत रुक जाएं और डॉक्टर से संपर्क करें।
सावधान! प्रेग्नेंसी में मलेरिया बन सकता है प्रीमैच्योर डिलीवरी की वजह, ऐसे करें अपना बचाव

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प्रेग्नेंसी में मलेरिया मां और शिशु दोनों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है, क्योंकि इस दौरान शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है। ...और पढ़ें





प्रेग्नेंसी में मलेरिया का खतरा: डॉक्टर ने बताया गर्भवती महिलाओं के लिए क्यों जरूरी है ज्यादा सावधानी 

गर्भावस्था में मलेरिया से रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है


प्रीमैच्योर डिलीवरी, कम वजन, मिसकैरेज का खतरा बढ़ता है


मच्छरों से बचाव और समय पर इलाज है बेहद जरूरी


 नई दिल्ली। गर्भ में एक नए जीवन को संजोना एक बेहद खास और संवेदनशील अनुभव होता है। इस दौरान एक मां अपने होने वाले बच्चे को हर बाहरी खतरे से सुरक्षित रखने की पूरी कोशिश करती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि कई बार हमारी नजरों से बच निकलने वाला एक छोटा-सा मच्छर इस सुरक्षा चक्र के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बन सकता है?


आकाश हेल्थकेयर की वरिष्ठ स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ (डायरेक्टर और हेड), डॉ. मधुलिका सिन्हा बताती हैं कि प्रेग्नेंसी में मलेरिया को कभी भी एक सामान्य बुखार समझकर अनदेखा नहीं करना चाहिए। आखिर इस नाजुक समय में मलेरिया इतना घातक क्यों हो जाता है? आइए इसे आसानी से समझते हैं।

(Image Source: AI-Generated)
शरीर की घटती ताकत और मलेरिया का बढ़ता खतरा

प्रेग्नेंसी के दौरान एक महिला के शरीर में प्राकृतिक रूप से बीमारियों से लड़ने की क्षमता थोड़ी कमजोर पड़ जाती है। यही कारण है कि आम दिनों के मुकाबले गर्भावस्था में मलेरिया का संक्रमण शरीर पर ज्यादा तेजी से हावी हो सकता है और उनके लिए अधिक खतरनाक साबित हो सकता है।


गर्भ में पल रहे बच्चे पर क्या होता है असर?

यह बीमारी केवल होने वाली मां के स्वास्थ्य को ही नुकसान नहीं पहुंचाती, बल्कि इसका सीधा और बुरा असर अजन्मे बच्चे के विकास पर भी पड़ता है। डॉ. सिन्हा के मुताबिक, मलेरिया के कारण गर्भावस्था में कई तरह की गंभीर परेशानियां खड़ी हो सकती हैं:
समय पूरा होने से पहले ही बच्चे का जन्म हो जाना (प्रीमैच्योर डिलीवरी)
पैदा होने वाले शिशु का वजन सामान्य से बहुत कम होना।
कुछ गंभीर मामलों में मिसकैरेज हो जाने का खतरा।
इन संकेतों को पहचानें और तुरंत लें एक्शन

गर्भवती महिलाओं को अपने शरीर में नजर आने वाले लक्षणों को कभी भी हल्के में नहीं लेना चाहिए। अगर शरीर में ये परेशानियां महसूस हों, तो तुरंत अपने डॉक्टर के पास जाएं:
अचानक तेज बुखार आना।
ठंड लगना या कंपकंपी महसूस होना।
पूरे शरीर में दर्द रहना।
मच्छरों को दूर रखने के जरूरी उपाय

इस खतरनाक बीमारी से बचने का सबसे कारगर तरीका मच्छरों को खुद से दूर रखना है। इसके लिए अपनी दिनचर्या में कुछ आसान कदम शामिल किए जा सकते हैं:
सोते समय नियमित रूप से मच्छरदानी का इस्तेमाल करें।
घर के अंदर और बाहर के हिस्सों में पूरी साफ-सफाई रखें।
अपने घर के आस-पास गमलों, कूलरों या गड्डों में पानी इकट्ठा न होने दें, क्योंकि रुके हुए पानी में ही मच्छर पनपते हैं।
सही समय पर इलाज है सबसे जरूरी

डॉक्टर का मानना है कि इस बीमारी से डरने के बजाय सतर्क रहने की जरूरत है। अगर सही समय पर इन लक्षणों की पहचान करके तुरंत डॉक्टरी जांच और इलाज शुरू करवा लिया जाए, तो मां और उनके गर्भ में पल रहे शिशु दोनों को सुरक्षित रखा जा सकता है।
शरीर को अंदर से 'AC' जैसा ठंडा रखेगा कच्चा प्याज, लू से बचने के लिए ये है खाने का सही तरीका

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शरीर को अंदर से 'AC' जैसा ठंडा रखेगा कच्चा प्याज, लू से बचने के लिए ये है खाने का सही तरीका

गर्मी के मौसम में रोज एक कच्चा प्याज खाना सेहत के लिए काफी फायदेमंद है। इससे लू लगने का खतरा कम होता है। ...और पढ़ें





लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। पारा बढ़ने के साथ ही हीटवेव यानी लू की समस्या बढ़ने लगती है। ऐसे में शरीर को ठंडा रखना सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं लू से बचने का रामबाण इलाज आपकी रसोई में ही छिपा है। हम बात कर रहे हैं कच्चे प्याज की।


जी हां, आयुर्वेद और दादी-नानी के नुस्खों में कच्चा प्याज गर्मियों के लिए किसी वरदान से कम नहीं माना गया है। आइए डॉ. मोहित शर्मा (सीनियर कंसल्टेंट, इंटरनल मेडिसिन, अमृता हॉस्पिटल, फरीदाबाद) से जानें गर्मी के मौसम में कच्चा प्याज खाना कैसे आपके लिए फायदेमंद हो सकता है।

लू से बचाव

कच्चे प्याज का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह शरीर के तापमान को कंट्रोल करने में मदद करता है। प्याज में मौजूद तत्व शरीर के तापमान को सामान्य बनाए रखते हैं। इसलिए गर्मी के मौसम में इसे सलाद के रूप में खाने से शरीर भीतर से ठंडा रहता है।





(Picture Courtesy: Freepik)
पाचन तंत्र के लिए रामबाण

गर्मियों में अक्सर पाचन क्रिया सुस्त हो जाती है, जिससे अपच, गैस और भूख न लगने जैसी समस्याएं होती हैं। प्याज में भरपूर मात्रा में फाइबर होता है, जो पेट को साफ रखने में मदद करता है। साथ ही, प्याज में ऐसे एंजाइम्स भी होते हैं, जो खाने को पचाने में मदद करते हैं।

हाइड्रेशन और ठंडक

प्याज में पानी की मात्रा ज्यादा होती है। गर्मियों में जब पसीने के जरिए शरीर से इलेक्ट्रोलाइट्स बाहर निकल जाते हैं, तब कच्चा प्याज शरीर को हाइड्रेटेड रखने में मदद करता है। यह एक नेचुरल कूलिंग एजेंट की तरह काम करता है।

इम्युनिटी में बढ़ोतरी

प्याज में विटामिन-सी और एंटी-ऑक्सीडेंट्स भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। गर्मियों में इन्फेक्शन का खतरा काफी रहता है। प्याज में मौजूद क्वेरसेटिन नाम का फ्लेवोनोइड शरीर के सेल्स को नुकसान से बचाता है और इम्यून सिस्टम को मजबूत करता है, ताकि आप मौसमी बीमारियों से लड़ सकें।

प्याज को खाने का सही तरीका

प्याज का पूरा फायदा पाने के लिए कोशिश करें कि आप इसे कच्चा खाएं। इसे सलाद में या रायते में मिलाकर खा सकते हैं। अगर आपको प्याज का स्वाद तेज लगता है, तो आप इसे 10-15 मिनट के लिए पानी में भिगोकर रख दें। इससे प्याज की गंध और तीखापन कम हो जाते हैं।
हड्डियों की मजबूती ही नहीं, पेट की हर तकलीफ का भी 'सुपरहीरो' है विटामिन-D; डॉक्टर का बड़ा खुलासा

हड्डियों की मजबूती ही नहीं, पेट की हर तकलीफ का भी 'सुपरहीरो' है विटामिन-D; डॉक्टर का बड़ा खुलासा

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आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में पेट से जुड़ी बीमारियां बहुत तेजी से बढ़ रही हैं। ...और पढ़ें






लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। इरिटेबल बाउल सिंड्रोम, इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज और क्रोहन डिजीज जैसी समस्याएं, आज के खराब लाइफस्टाइल में काफी आम हो गई हैं। इन बीमारियों के कारण लोगों को अक्सर पेट में तेज दर्द, दस्त, सूजन और पाचन से जुड़ी गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ता है।


हालांकि, हाल ही में हुए शोध एक बहुत ही पॉजिटिव खबर लेकर आए हैं और वह यह है कि एक खास विटामिन आपकी इन सभी तकलीफों को कम करने में एक बड़ी भूमिका निभा सकता है। आइए, PSRI अस्पताल, दिल्ली के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. नृपेन सैकिया से डिटेल में जानते हैं इस बारे में।




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सिर्फ हड्डियों के लिए नहीं, इम्युनिटी का भी रक्षक

हम सभी आमतौर पर यही मानते हैं कि 'विटामिन D' का काम सिर्फ हमारी हड्डियों को मजबूत बनाना है, लेकिन इसका फायदा सिर्फ हड्डियों तक ही सीमित नहीं है।

मेडिकल साइंस के अनुसार, यह विटामिन हमारे शरीर के इम्यून सिस्टम को संतुलित रखने में भी बेहद जरूरी है। आंतों से जुड़ी कई गंभीर बीमारियां 'ऑटोइम्यून' होती हैं- यानी एक ऐसी स्थिति जहां शरीर का अपना ही सुरक्षा तंत्र गलती से अपनी स्वस्थ कोशिकाओं पर हमला करने लगता है।


ऐसी स्थिति में विटामिन-डी शरीर की सूजन को कम करने और इम्यून सिस्टम की प्रतिक्रिया को सही दिशा में नियंत्रित करने में बड़ी मदद करता है।
"लीकी गट" से बचाव और आंतों की मजबूती

इसके अलावा, आंतों को सुरक्षित रखने में भी विटामिन D का काम किसी मजबूत दीवार की तरह होता है। यह हमारी आंतों की परत (को ताकत देता है। अगर किसी कारणवश आंतों की यह दीवार कमजोर हो जाए, तो "लीकी गट" नाम की खतरनाक समस्या पैदा हो सकती है।


इस स्थिति में हानिकारक टॉक्सिन्स और खतरनाक बैक्टीरिया आसानी से शरीर के अंदर प्रवेश कर जाते हैं। शरीर में विटामिन D की सही मात्रा इस परत को मजबूत बनाए रखती है और ऐसे जोखिमों को काफी हद तक टाल देती है।




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विटामिन-डी की कमी से बढ़ सकती है IBD की तकलीफ

कई मेडिकल स्टडीज में भी इस बात की पुष्टि हुई है कि जिन लोगों में विटामिन D की कमी पाई जाती है, उनमें IBD जैसी आंतों की बीमारियों के लक्षण कहीं ज्यादा गंभीर और तकलीफदेह होते हैं।


डॉक्टरों ने पाया है कि ऐसे मरीजों को जब विटामिन-डी के सप्लीमेंट दिए जाते हैं, तो उनके लक्षणों में काफी हद तक सुधार देखने को मिलता है। हालांकि, यह समझना भी जरूरी है कि सिर्फ विटामिन-डी ही इन बीमारियों का इकलौता इलाज नहीं है, बल्कि यह आपके संपूर्ण इलाज और रिकवरी की प्रक्रिया को बेहतर बनाने का एक बहुत ही शानदार तरीका है।
अक्सर आंखों में दर्द लेकर जागते हैं आप? जानिए डॉक्टर ने किन 5 कारणों को बताया जिम्मेदार

अक्सर आंखों में दर्द लेकर जागते हैं आप? जानिए डॉक्टर ने किन 5 कारणों को बताया जिम्मेदार

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सुबह आंखों में दर्द और भारीपन कई लोगों को परेशान करता है। ...और पढ़ें





क्या आप भी सुबह आंखों में दर्द के साथ उठते हैं? (Image Source: AI-Generated)


सुबह आंखों में दर्द के 5 मुख्य कारण जानें


ड्राई आई, नींद की कमी, एलर्जी प्रमुख वजहें


इन्फेक्शन, गलत चश्मा भी दर्द का कारण

 नई दिल्ली। सुबह की शुरुआत अगर ताजगी की बजाय आंखों में भारीपन, चुभन या दर्द के साथ हो, तो पूरा दिन परेशानी में बीतता है। हम में से कई लोग इसे एक मामूली थकान मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यह किसी सीरियस आई प्रॉब्लम का शुरुआती संकेत भी हो सकता है।


ग्वालियर स्थित रतन ज्योति नेत्रालय के संस्थापक, निदेशक और सर्जन डॉ. पुरेन्द्र भसीन के अनुसार, सुबह आंखों में दर्द के पीछे मुख्य रूप से 5 कारण जिम्मेदार हो सकते हैं। सही इलाज के लिए इन कारणों को समझना बेहद जरूरी है। आइए जानते हैं।



(Image Source: AI-Generated)
ड्राई आई

रात में सोते समय हमारी आंखें बंद रहती हैं, जिसके कारण प्राकृतिक आंसुओं का बनना कम हो जाता है। जिन लोगों की आंखों में पहले से ही नमी की कमी होती है, उन्हें सुबह उठने पर जलन और दर्द महसूस होता है। खासकर जो लोग बहुत ज्यादा स्क्रीन का इस्तेमाल करते हैं, उनमें यह समस्या सबसे ज्यादा देखी जाती है।



यह वीडियो भी देखें


नींद की कमी

अगर आप पर्याप्त और गहरी नींद नहीं ले रहे हैं, तो आपके शरीर के साथ-साथ आपकी आंखों को भी पूरा आराम नहीं मिल पाता। देर रात तक मोबाइल या लैपटॉप पर आंखें गड़ाए रखने की आदत आंखों पर एक्स्ट्रा दबाव डालती है। यही कारण है कि सुबह उठने पर आंखों में भयंकर थकान और दर्द होता है।

एलर्जी का असर

कई बार हमारे बिस्तर, तकिए या कंबल में धूल और प्रदूषण के बारीक कण मौजूद होते हैं, जो रात भर हमारी आंखों को नुकसान पहुंचाते हैं। इस एलर्जी के कारण सुबह आंखों में कई समस्याएं हो सकती हैं, जैसे:
आंखों में रेडनेस
तेज खुजली मचना
दर्द होना
आंखों से पानी आना या सूजन महसूस होना
आंखों में इन्फेक्शन

अगर सुबह आपकी आंखें चिपचिपी हो रही हैं और दर्द के साथ सूजन भी है, तो यह कंजक्टिवाइटिस या ब्लेफेराइटिस जैसे इन्फेक्शन का स्पष्ट संकेत हो सकता है। अगर ये लक्षण कई दिनों तक बने रहें, तो बिना देरी किए डॉक्टर से अपनी जांच करवानी चाहिए।

गलत चश्मे का इस्तेमाल या कमजोर नजर

अगर आपकी आंखों की रोशनी कमजोर है और आप या तो चश्मा नहीं पहनते या फिर गलत पावर का चश्मा इस्तेमाल कर रहे हैं, तो आंखों की मांसपेशियों पर लगातार तनाव बना रहता है। यह बढ़ा हुआ तनाव भी सुबह के समय आंखों में दर्द का एक बड़ा कारण बनता है।




(Image Source: AI-Generated)
बचाव के लिए रखें इन बातों का ध्यान

डॉ. भसीन सलाह देते हैं कि अगर यह दर्द कभी-कभार होता है, तो यह चिंता का विषय नहीं है, लेकिन अगर रोज सुबह आंखें खोलने में तकलीफ होती है, तो इसे बिल्कुल भी नजरअंदाज न करें। इससे बचने के लिए आप कुछ आसान तरीके अपना सकते हैं:
नींद पूरी करें: आंखों को आराम देने के लिए अच्छी नींद बहुत जरूरी है।
स्क्रीन टाइम कम करें: सोने से पहले गैजेट्स से दूरी बना लें।
सफाई का ध्यान रखें: अपनी आंखों को साफ रखें और साफ बिस्तर का इस्तेमाल करें।
आर्टिफिशियल टीयर्स: जरूरत महसूस होने पर आंखों की नमी बरकरार रखने के लिए 'आर्टिफिशियल टीयर्स' का इस्तेमाल करें।
भारत में हर चौथी मौत का कारण हार्ट अटैक, 'नॉर्मल हेल्थ रिपोर्ट' के भरोसे रहना पड़ सकता है भारी

युवाओं में हार्ट अटैक के मामले बढ़ रहे हैं। स्टडी में पाया गया कि 80% लोग जांच में लो-रिस्क पाए गए थे, फिर भी उन्हें हार्ट अटैक आया। ...और पढ़ें





युवाओं में तेजी से बढ़ रहे हैं हार्ट अटैक के मामले (Picture Courtesy: Freepik)


 भारत में हार्ट अटैक के खतरे का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और यह अब हर उम्र के लोगों को प्रभावित कर रहा है। देश में हर चार में एक मौत हार्ट अटैक से, युवा सबसे ज्यादा इसकी चपेट में आ रहे हैं।


इस तरह के बढ़ते मामले सार्वजनिक स्वास्थ्य की बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। दिल्ली के जीबी पंत अस्पताल में इसे लेकर हुए अध्ययन में ' सामने आया है कि करीब 80 प्रतिशत ऐसे मरीज जिन्हें पहले मेडिकल जांच में 'लो-रिस्क' माना गया था, वे बाद हार्ट अटैक का शिकार हो गए।




(Picture Courtesy: Freepik)

दिल्ली के जीबी पंत अस्पताल के वरिष्ठ कार्डियोलाजिस्ट डॉ. मोहित दयाल गुप्ता के नेतृत्व में 2023 से 2025 के बीच एकत्रित छह हजार से अधिक मरीजों के डेटा पर आधारित हुआ क्लिनिकल विश्लेषण भारत में हार्ट डिजीज के बदलते पैटर्न को दर्शाता है। हार्ट अटैक का शिकार होने वाले 20- 30 वर्ष के युवाओं की संख्या पांच से 10 प्रतिशत के बीच है।


यह संख्या तेजी से बढ़ रही है, साथ ही इस उम्र में भी अचानक और बिना चेतावनी के हार्ट अटैक के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं। 30 40 वर्ष की उम्र में यह खतरा और बढ़ जाता है, जहां तनाव, अनियमित दिनचर्या, मोटापा और शुरुआती डायबिटीज प्रमुख कारण बनते हैं।

क्यों बढ़ रहा है दिल पर दबाव?

करियर का दबाव, आर्थिक बोझ और नींद का पूरी न होना हृदय पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। धूमपान, वेपिंग और ड्रग्स का सेवन रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाता है और उन्हें संकरा कर देता है। विशेषज्ञ कहते हैं कि कई घंटों तक कुर्सी पर बैठ कर काम करते रहने, जंक फूड खाने, देर रात तक जागने व तनावभरी दिनचर्या ने कोलेस्ट्राल की समस्या को बढ़ा दिया है जो हार्ट अटैक का कारण।


जबकि 40 से 50 वर्ष की आयु में इस तरह के लगभग 25 प्रतिशत मामले सामने आए। 50 से 60 वर्ष का वर्ग अब भी सबसे ज्यादा प्रभावित (30 से 35 प्रतिशत) बना हुआ है। 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में मृत्यु दर सबसे अधिक देखी जाती है।

दिल की बीमारियों से तीन लाख से ज्यादा मौतें

दिल्ली की स्थिति भी चिंताजनक है। सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (सीआरएस) व अन्य सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2024 में दिल और रक्त संचार संबंधी बीमारियों से 34 हजार से अधिक मौतें दर्ज की गईं जो पिछले वर्षों की तुलना में तेज बढ़ोतरी दर्शाती हैं। पिछले दो दशकों में दिल्ली में तीन लाख से ज्यादा लोग दिल से जुड़ी बीमारियों के कारण जान गंवा चुके हैं।


विशेषज्ञ इसके पीछे प्षण, तनावपूर्ण जीवनशैली, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर को प्रमुख कारण मानते हैं। यह भी सामने आया कि पश्चिमी देशों के आधार पर तैयार किए गए रिस्क कैलकुलेटर भारत के लिए पूरी तरह से कारगर नहीं हैं । विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए अलग हार्ट रिस्क आंकलन माडल विकसित करने की जरूरत है।


साथ ही लोगों को 'नार्मल रिपोर्ट' के भरोसे न रहकर नियमित जांच, संतुलित आहार, व्यायाम और तनाव नियंत्रण पर विशेष ध्यान देना चाहिए। जिन लोगों के माता- पिता को दिल की बीमारी रही है, ऐसे बच्चे-वयस्क डाक्टर से सलाह लेकर नियमित रूप से टेस्ट कराएं।
 स्मार्टफोन के दौर में खो गया है फोकस? जानिए कैसे एक हॉबी बदल सकती है आपकी जिंदगी

स्मार्टफोन के दौर में खो गया है फोकस? जानिए कैसे एक हॉबी बदल सकती है आपकी जिंदगी

स्मार्टफोन के दौर में खो गया है फोकस? जानिए कैसे एक हॉबी बदल सकती है आपकी जिंदगी

'फ्लो स्टेट' में पहुंचने पर लोगों को कुछ और महत्वपूर्ण नहीं लगता, विकर्षण की गतिविधियों में आती है कमी। ...और पढ़ें









लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। हम एक ऐसे वातावरण में जी रहे हैं जिसे "डिस्ट्रैक्शन इकोनमी" कहा गया है। मतलब यह कि एक ऐसा माहौल, जो हर मोड़ पर हमारा ध्यान आकर्षित करने के लिए तैयार किया गया है। इसका परिणाम अक्सर ध्यान में बिखराव, फोकस की कमी और कभी-कभी बढ़ती हुई चिंताओं और विचारों की पुनरावृत्ति होती है।


किसी गतिविधि में पूरी तरह से डूब जाना एक दुर्लभ घटना हो गई है। कल्पना कीजिए कि आप जब कोई इतनी आकर्षक फिल्म देख रहे थे तो अपने फोन को हाथ तक नहीं लगाया। इस अनुभव को "फ्लो" कहा जाता है।

फ्लो एक ऐसी अवस्था है, जिसमें लोग किसी गतिविधि में इतने लिप्त हो जाते हैं कि कुछ और महत्वपूर्ण नहीं लगता। इसका अनुभव इतना आनंददायक होता है कि लोग इसे करने के लिए बड़े खर्च पर भी जारी रखते हैं।


एक शौक के प्रति प्रतिबद्धता और अपने फ्लो को खोजने से न केवल बाहरी शोर (कार्य या सोशल मीडिया विकर्षण) को कम करने में मदद मिल सकती है, बल्कि आपके अपने आंतरिक शोर, जैसे मन की भटकन या पुनरावृत्ति को भी कम कर सकती है।


विकर्षणों की दुनिया में किसी गतिविधि में पूरी तरह से डूब जाना दुर्लभ है, लेकिन यह आपके मस्तिष्क के लिए लाभकारी हो सकता है तंत्रिका विज्ञान के साक्ष्यों की समीक्षाएं दिखाती हैं कि फ्लो स्टेट में होना मस्तिष्क की गतिविधि को दबाकर मन के भटकाव को कम करता है। यह मस्तिष्क के क्षेत्रों का एक सेट है, जो आत्म- संदर्भित प्रोसेसिंग को कवर करता है।

मन का भटकाव

मस्तिष्क सक्रियता में कमी का मतलब है कि ध्यान नेटवर्क की अधिक प्रभावी सक्रियता हो सकती है । शोधकर्ताओं ने दिखाया कि फ्लो की स्थितियों में उद्देश्यपूर्ण मानसिक प्रयास और दृष्टि का ध्यान सबसे अधिक था। फ्लो का मतलब है कि ध्यान इतने प्रभावी ढंग से कार्य में आवंटित किया जाता है कि आत्म-निगरानी और विकर्षण गायब हो जाते हैं।


हालांकि, फ्लो "हाइपरफोकस " के समान नहीं है। वास्तव में, ये एक- दूसरे के साथ नकारात्मक रूप से संबंधित हो सकते हैं। कालेज के 85 छात्रों के एक अध्ययन में, जिनमें ध्यान में कमी के विकार (एडीएचडी) वाले और बिना एडीएचडी वाले छात्र शामिल थे। जिन छात्रों में क्लीनिकल रूप से महत्वपूर्ण एडीएचडी के लक्षण थे, उन्होंने उच्च हाइपरफोकस की रिपोर्ट की, लेकिन कई मानदंडों पर कम फ्लो। मुख्य अंतर नियंत्रण में प्रतीत होता है । फ्लो निर्देशित और इरादतन होता है, जबकि हाइपरफोकस आपके साथ होता है।

फ्लो कैसे खोजें

शौक ( हाबी ) फ्लो स्टेट पाने का एक बेहतरीन तंत्र हैं। खेलों को फ्लो उत्पन्न करने वाली गतिविधि के रूप में व्यापक रूप से शोधित किया गया है। 188 जूनियर टेनिस खिलाड़ियों के एक अध्ययन में, कार्य पर ध्यान और नियंत्रण की भावना फ्लो के दो पहलू थे जो सबसे मजबूत रूप से यह भविष्यवाणी करते थे कि खिलाड़ी ने अपना मैच जीता या हारा। हालांकि, यह केवल जीतने के बारे में नहीं है।


12-16 वर्ष के 413 युवा एथलीटों के एक अध्ययन में पाया गया कि प्रतिभागियों ने प्रयास और सुधार पर ध्यान केंद्रित किया, न कि जीतने पर उन्होंने अधिक फ्लो की रिपोर्ट की।

फ्लो स्टेट में होना दोस्तों के साथ सामाजिक इंटरैक्शन से अधिक संतोष से जुड़ा होना होता है। ये निष्कर्ष अन्य शोधों के साथ मेल खाते हैं, जो दिखाते हैं कि गेमिंग के दौरान फ्लो स्टेट इतना अवशोषित हो सकता है कि यह आपको देर से सोने पर मजबूर कर देता है यह एक नई हाबी उठाने से पहले विचार करने के लिए कुछ है।
सिर्फ आंखों की रोशनी ही नहीं, जानलेवा कैंसर के खिलाफ भी ढाल बनेगा ये 'खास' न्यूट्रिएंट

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शिकागो विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है कि आंखों की रोशनी के लिए जरूरी 'जेक्सैंथिन' अब कैंसर से लड़ने में भी एक मजबूत ढाल ...और पढ़ें






आंखों की सेहत सुधारने वाला 'जेक्सैंथिन' अब करेगा कैंसर का खात्मा? (Image Source: AI-Generated)


जेक्सैंथिन एंटी-ट्यूमर प्रतिरक्षा को मजबूत कर कैंसर से लड़ता है


यह CD8+ टी कोशिकाओं की कैंसर-नाशक क्षमता बढ़ाता है


शिकागो विश्वविद्यालय के शोध ने कैंसर उपचार में नई उम्मीदें जगाई हैं


एएनआई, नई दिल्ली। हम सभी जानते हैं कि हेल्दी डाइट और कुछ खास पोषक तत्व हमारी आंखों की रोशनी के लिए वरदान होते हैं। इन्हीं में से एक प्रमुख कैरोटीनॉयड है- 'जेक्सैंथिन', लेकिन अब वैज्ञानिकों ने इसके बारे में एक बेहद ही चौंकाने वाला खुलासा किया है।


दरअसल, आंखों की सेहत को बढ़ावा देने वाला यह तत्व अब कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से लड़ने में भी एक मजबूत ढाल साबित हो सकता है।



(Image Source: AI-Generated)
कैंसर सेल्स को ढूंढकर मारेगी आपकी इम्युनिटी

यह नई और अहम जानकारी शिकागो विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन में सामने आई है। इस महत्वपूर्ण रिसर्च के नतीजे मेडिकल जर्नल 'सेल रिपोर्ट्स मेडिसिन' में प्रकाशित किए गए हैं। इस अध्ययन ने चिकित्सा जगत को एक नई उम्मीद दी है कि कैसे एक सामान्य सा तत्व शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाकर कैंसर को हराने में मदद कर सकता है।

'एंटी-ट्यूमर' इम्युनिटी को लेकर हुआ खुलासा

इस शोध से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता जिंग चेन ने भी इन नतीजों पर खुशी और हैरानी जताई है। उनका कहना है, "हमें यह जानकर बहुत सुखद आश्चर्य हुआ कि जेक्सैंथिन, जिसे हम अब तक मुख्य रूप से आंखों के स्वास्थ्य में इसकी बेहतरीन भूमिका के लिए ही जानते थे, वह असल में शरीर के अंदर एंटी-ट्यूमर प्रतिरक्षा को बढ़ाने का भी काम करता है।"

कैंसर के खिलाफ कैसे काम करता है यह तत्व?

शोधकर्ताओं की टीम ने पाया कि जेक्सैंथिन हमारे शरीर की खास रक्षक कोशिकाओं- 'सीडी8 प्लस टी कोशिकाओं' की काम करने की क्षमता को सीधे तौर पर तेज कर देता है। आपको बता दें कि ये खास प्रतिरक्षा कोशिकाएं ही शरीर में मौजूद कैंसर की खतरनाक कोशिकाओं की पहचान करने और उन्हें नष्ट करने की सबसे अहम जिम्मेदारी निभाती हैं।


अध्ययन में इस पूरी प्रक्रिया को विस्तार से समझाया गया है। दरअसल, असामान्य या कैंसर वाली कोशिकाओं का पता लगाने के लिए ये 'सीडी8 प्लस टी कोशिकाएं' एक विशेष संरचना पर निर्भर करती हैं, जिसे 'टी-कोशिका रिसेप्टर' कहा जाता है।

टी-सेल्स का 'रिसेप्टर कॉम्प्लेक्स' होगा मजबूत

वैज्ञानिकों ने पाया कि जब ये रक्षक टी-कोशिकाएं कैंसर की कोशिकाओं से टकराती हैं, तो जेक्सैंथिन वहां पहुंचकर इस 'रिसेप्टर कॉम्प्लेक्स' के निर्माण को मजबूत और स्थिर करने में मदद करता है। इस मजबूती के कारण कोशिकाओं के अंदर के संकेत काफी तेज हो जाते हैं। नतीजा यह होता है कि टी-कोशिकाएं पहले से ज्यादा सक्रिय हो जाती हैं, साइटोकाइन का उत्पादन बढ़ जाता है और कुल मिलाकर ट्यूमर को नष्ट करने की कोशिकाओं की ताकत में भारी सुधार होता है।
 हेल्दी समझकर रोज खा रहे हैं ग्रेनोला? फायदे की जगह शरीर को हो सकते हैं ये 8 बड़े नुकसान

हेल्दी समझकर रोज खा रहे हैं ग्रेनोला? फायदे की जगह शरीर को हो सकते हैं ये 8 बड़े नुकसान

हेल्दी समझकर रोज खा रहे हैं ग्रेनोला? फायदे की जगह शरीर को हो सकते हैं ये 8 बड़े नुकसान


ग्रेनोला को कई लोग हेल्दी फूड समझकर रोज सुबह ब्रेकफास्ट में खाते हैं, लेकिन बाजार में मिलने वाला ग्रेनोला सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है। ...और पढ़ें




क्या आप भी रोज ग्रेनोला खाना हेल्दी समझते हैं? (Picture Courtesy: Freepik)


बाजार के ग्रेनोला में उच्च चीनी, वजन बढ़ाए


अधिक कैलोरी से मोटापा और दिल का खतरा


प्रिजर्वेटिव्स लिवर, किडनी पर एक्स्ट्रा दबाव डालते हैं


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आजकल हेल्दी स्नैक के रूप में ग्रेनोला काफी ट्रेंड में है। लोग इसे नाश्ते, स्नैक या कभी-कभी डिनर रिप्लेसमेंट के तौर पर भी खाने लगे हैं। हेल्थ-कॉन्शस लोग इसे एनर्जी और न्यूट्रिशन का अच्छा सोर्स मानते हैं।


लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसे रोज खाना आपके शरीर को नुकसान भी पहुंचा सकता है? जी हां, हेल्दी दिखने वाला यह फूड आपके शरीर को नुकसान पहुंचा सकता है। आइए जानें कैसे।
ग्रेनोला होता क्या है?

ग्रेनोला ओट्स, नट्स, बीज, शहद या शुगर सिरप और सूखे फलों को मिलाकर बेक करके तैयार किया जाता है। इसे योगर्ट, दूध या स्मूदी के साथ खाया जाता है। देखने में यह हेल्दी लगता है और तुरंत एनर्जी भी देता है। लेकिन मार्केट में मिलने वाले अधिकतर ग्रेनोला बार्स और पैकेट्स में हाई शुगर, ऑयल्स और प्रिजर्वेटिव्स मिलाए जाते हैं, जिससे यह हेल्दी से ज्यादा कैलोरी और शुगर लोडेड स्नैक बन जाता है। यही वजह है कि इसे रोज खाना शरीर को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचा सकता है।





(Picture Courtesy: Freepik)
रोज ग्रेनोला खाने से होने वाले नुकसानहाई शुगर कंटेंट- मार्केट में मिलने वाले ग्रेनोला में शुगर की मात्रा बहुत ज्यादा होती है। लगातार इसे खाने से ब्लड शुगर लेवल बढ़ सकता है, जिससे डायबिटीज और मोटापे का खतरा बढ़ता है
कैलोरी ओवरलोड- ग्रेनोला का एक छोटा बाउल ही लगभग 200–300 कैलोरी तक का हो सकता है। रोजाना इसे खाने से वजन तेजी से बढ़ सकता है, खासकर उन लोगों में जो पहले से कम एक्टिव लाइफस्टाइल जीते हैं।
हाई फैट लेवल- इसे टेस्टी बनाने के लिए अक्सर इसमें ऑयल्स और बटर जैसे फैट्स मिलाए जाते हैं। इससे कोलेस्ट्रॉल लेवल बढ़ सकता है और दिल की बीमारियों का खतरा भी।
डाइजेशन प्रॉब्लम- ग्रेनोला में फाइबर की मात्रा ज्यादा होती है। थोड़ी मात्रा में यह डाइजेशन के लिए अच्छा है, लेकिन रोजाना ज्यादा मात्रा में इसे खाने से गैस, ब्लोटिंग और कब्ज की समस्या हो सकती है।
हिडन प्रिजर्वेटिव्स- पैक्ड ग्रेनोला में स्वाद और शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए प्रिजर्वेटिव्स और आर्टिफिशियल फ्लेवर डाले जाते हैं। ये लिवर और किडनी पर एक्स्ट्रा प्रेशर डाल सकते हैं।
ब्लड शुगर स्पाइक- ग्रेनोला जल्दी डाइजेस्ट हो जाता है और ब्लड शुगर लेवल को अचानक बढ़ा देता है। डायबिटिक मरीजों के लिए यह काफी नुकसानदायक साबित हो सकता है।
हाई सोडियम लेवल- कुछ ग्रेनोला प्रॉडक्ट्स में सोडियम भी ज्यादा होता है। रोजाना इसे खाने से ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है और दिल से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं।
एडिक्शन का खतरा- ग्रेनोला का मीठा और क्रंची टेस्ट कई लोगों को इसे बार-बार खाने के लिए प्रेरित करता है। यह ओवरईटिंग की आदत डाल सकता है और हेल्दी डाइट बैलेंस बिगाड़ देता है।
आंखों से बेवजह पानी आने को हल्के में न लें! आंखों को सुरक्षित रखने के लिए आज ही फॉलो करें ये टिप्स

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दुख या खुशी में आंखों में आंसू आते ही हैं। लेकिन आंखों से लगातार आंसू या पानी आना एपिफोरा कहलाता है। परेशानी बढ़ने पर डॉक्टरी सलाह जरूर लें। ...और पढ़ें




लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आंखों में नमी बनाए रखने के लिए कुदरती तौर पर टियर्स या आंसू बनते रहते हैं। कई बार जरूरत से ज्यादा टियर्स बनने की वजह से आपको चीजों को देखने या रोजमर्रा के काम करने में परेशानी हो सकती है। ऐसा होने के कई कारण हो सकते हैं और इससे बचने के लिए छोटी-छोटी सावधानियां बड़ी राहत दिला सकती हैं।

इन वजहों से जरूरत से ज्यादा बहते हैं आंसूएलर्जी
ड्राई आइज
कंजंक्टिवाइटिस या रेड आई
टियर डक्ट का बंद होना
पलकों की बनावट असामान्य होना
आंख के ऊपर फुंसी होना
ऐसे बचे रहें इस परेशानी से

एक्सपायरी डेट का आई-मेकअप न लगाएं: हर तीन से छह महीने में अपना मस्कारा और आई शैडो रिप्लेस कर दें। पुराने या एक्सपायरी डेट वाले आई-मेकअप का इस्तेमाल ना करें और साथ ही अपने मेकअप एप्लीकेटर्स की भी अच्छी तरह सफाई करते रहें। ऐसा ना करने से इंफेक्शन का खतरा बढ़ सकता है या आंखों से पानी जाने की परेशानी और ज्यादा बढ़ सकती है।

एलर्जी के कारणों से दूर रहें

ऐसी चीजों से सतर्क रहें जोकि एलर्जी पैदा करते हों और आंखों से ज्यादा मात्रा में आंसू आने का कारण बनते हों जैसे:धूल-मिट्टी
परागकण
धुआं
आई ब्रेक लेते रहें

लगातार डिजिटल डिवाइस का इस्तेमाल करने से आंखें थक जाती हैं, जिसकी वजह से उनसे पानी आने, ड्राइनेस की समस्या होती है। ऐसे में थोड़ी-थोड़ी देर में अपने डिवाइस से ब्रेक लेना ना भूलें।


आंखों को रगड़ें नहीं

अगर आंखों में आपके बार-बार खुजली हो रही है तो उसे रगड़ने की बजाय आंखों को ल्युब्रिकेट करने वाले आई ड्रॉप का इस्तेमाल करें। ड्राई आंखों को रगड़ने से पानी आने की समस्या और बढ़ जाती है।

डॉक्टर से सलाह लें

अगर छोटी-छोटी सावधानियां बरतने के बावजूद आपकी परेशानी दूर नहीं हो रही तो इन स्थितियों में डॉक्टरी सलाह जरूरी हो जाती है:आंखों से लगातार पानी आना
आंखों में दर्द होना
आंखों का लाल हो जाना
धूप या रोशनी में जाने पर परेशानी महसूस होना
आंखों में सूजन
डिस्चार्ज होना या पलकों पर पपड़ी जमना
किसी से कम नहीं बस अलग है आटिज्म पीड़ित बच्चों की दुनिया, समझ-सहयोग और संवेदना से बदलेगी तस्वीर

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World Autism Awareness Day: पटना में आटिज्म से पीड़ित बच्चों की दुनिया को समझने और उन्हें सहयोग देने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। माता-पिता अक्सर श ...और पढ़ें





एआई द्वारा जेनरेट की गई ग्राफिक।


आटिज्म बीमारी नहीं, बल्कि एक न्यूरो-विकासात्मक स्थिति है।


शुरुआती पहचान, थेरेपी और सहयोग से बच्चे सामान्य जीवन जीते हैं।


स्क्रीन टाइम सीमित कर सामाजिक संपर्क बढ़ाना बच्चों के लिए आवश्यक।

 पटना। करीब पांच वर्ष का बच्चा, जो न तो आंखें मिलाता है और न ही पुकारने पर तुरंत प्रतिक्रिया देता है। बस अपनी ही दुनिया में गुम, कभी खिलौनों को सजाता है तो कभी एक ही हरकत को बार-बार दोहराता है।


वर्षों तक माता-पिता यह समझ ही नहीं पाते कि उनका बच्चा खामोश या शांतप्रिय नहीं बल्कि आटिज्म की अलग दुनिया में जी रहा है। राजधानी पटना समेत प्रदेश के लाखों परिवार इसी अनुभव से गुजर रहे हैं।

माता-पिता शुरुआत यानी डेढ़ से दो वर्ष में इसकी पहचान कर सकें, इसलिए हर वर्ष 2 अप्रैल को विश्व आटिज्म जागरूकता दिवस मनाया जाता है। अब इसे बीमारी नहीं बल्कि एक अलग न्यूरो-विकासात्मक स्थिति के रूप में देखा जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे बच्चों की सोच, सीखने व प्रतिक्रिया देने का तरीका अलग होने से उन्हें संभालना चुनौतीपूर्ण है लेकिन उम्मीद भी है। जागरूकता, सही इलाज व समाज के सहयोग से ये बच्चे अलग पहचान बना रहे हैं, बस जरूरत उन्हें समझने और स्वीकार करने की है।



स्क्रीन से भाषा विकास हो रहा प्रभावित

आइजीआइएमएस की क्लीनिकल चाइल्ड साइकोलाजिस्ट डॉ. प्रियंका के अनुसार उनकी ओपीडी में हर दिन दो से चार नए आटिज्म स्पेक्ट्रम डिसआर्डर यानी एएसडी पीड़ित बच्चे आते हैं। फालोअप को जोड़े तो इनकी संख्या 6 से आठ हो जाती है।


यह एक बड़ी मानसिक स्वास्थ्य चुनौती की ओर संकेत कर रहा है। प्रदेश में हर सौ में से एक तो देश में 80 में से एक बच्चा एएसडी ग्रसित है। इसके शुरुआती लक्षण 18 से 24 माह दिखने लगते हैं।


जागरूकता की कमी के कारण प्रदेश में जब बच्चे स्कूल जाते हैं तब समस्या का पता चलता है। यदि शुरुआत में पहचान हो जाए और स्पीच, आकुपेशनल व बिहेवियरल थेरेपी के साथ सामाजिक सहयोग मिले तो ऐसे बच्चे सामान्य जीवन जी सकते हैं।


मोबाइल या स्क्रीन में अधिक समय बिताने से छोटे बच्चे समाज से कटते हैं और उनका भाषा विकास प्रभावित होता है। इससे आटिज्म के लक्षण और अधिक गंभीर प्रतीत होते हैं। बच्चों का स्क्रीन टाइम सीमित करने व वास्तविक सामाजिक संपर्क बढ़ाना जरूरी है।

बेटियों में कम नहीं पर होती उनकी अनदेखी

क्लीनिकल साइकोलाजिस्ट सह पटना यूनिवर्सिटी में विजिटिंग फैकल्टी ईशा सिंह के अनुसार आटिज्म स्पेक्ट्रम डिसआर्डर बच्चों में होने वाला एक न्यूरो-डेवलपमेंटल डिसआर्डर है।

इससे उनके व्यवहार, संवाद क्षमता व सामाजिक विकास पर असर पड़ता है। लड़कों में यह समस्या लड़कियों की तुलना में अधिक यानी यदि तीन लड़के तो एक लड़की इससे पीड़ित होती है।

इसका सामाजिक कारण है, अधिसंख्य माता-पिता बेटों को जांच के लिए डाक्टर के पास ले जाते हैं लेकिन बेटियों को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। थेरेपी और जरूरत पड़ने पर दवाओं से इसे काफी हद तक ठीक किया जा सकता है।


जरूरत बच्चों के व्यवहार में बदलाव की अनदेखी के बजाय साइकोलाजिस्ट से परामर्श लेने की है। पटना में थेरेपी सेंटर, स्पेशल स्कूल व प्रशिक्षित विशेषज्ञों की कमी भी एक बड़ी चुनौती है।
क्या आटिज्म व इसका कारण

आटिज्म एक न्यूरो-विकासात्मक विकार है, रोग नहीं। यह बच्चे के सामाजिक व्यवहार, संचार क्षमता व सीखने के तरीके को प्रभावित करता है।

इसे आटिज्म स्पेक्ट्रम डिसआर्डर (एएसडी) भी कहते हैं क्योंकि इसके लक्षण व तीव्रता हर बच्चे में अलग होती है। इसका कोई एक निश्चित कारण नहीं है।

यह मुख्यतः आनुवंशिक और मस्तिष्क के विकास में होने वाले बदलावों से जुड़ा होता है। गर्भावस्था के दौरान कुछ जैविक कारक भी इसकी संभावना को प्रभावित कर सकते हैं।
मुख्य लक्षण व क्या करें

यदि बच्चा आंखों में आंखें डाल कर नहीं देखे, बोलने में देरी, बार-बार एक ही गतिविधि दोहराए, बोलने में देरी या भाषा का असामान्य प्रयोग, आवाज देने पर तुरंत प्रतिक्रिया नहीं दे तो तुरंत जांच कराएं। माता-पिता बच्चों का स्क्रीन टाइम सीमित कर, उनसे बातचीत व खेल का समय बढ़ाएं।
डिलीवरी के बाद हर महिला को करना चाहिए योग, शारीरिक और मानिसक सेहत के लिए है फायदेमंद

डिलीवरी के बाद हर महिला को करना चाहिए योग, शारीरिक और मानिसक सेहत के लिए है फायदेमंद

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डिलीवरी के बाद महिलाओं को होने वाली शारीरिक थकान, कमजोरी और मानसिक चिड़चिड़ापन जैसी समस्याओं के लिए योग थेरेपी बेहद फायदेमंद है। ...और पढ़ें




डिलीवरी के बाद योग थेरेपी: शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए वरदान


योग पेल्विक मसल्स को मजबूत कर पोस्चर सुधारता है


प्राणायाम हार्मोन संतुलित कर चिड़चिड़ापन, थकान घटाता है


नियमित अभ्यास आत्मविश्वास बढ़ाता, मानसिक शांति देता है


ब्रांड डेस्क, नई दिल्ली। बच्चे के जन्म यानी डिलीवरी के बाद अक्सर महिलाओं को शारीरिक थकान, कमजोरी, नींद में कमी के कारण चिड़चिड़ापन, बिना बात का गुस्सा और मांसपेशियों में ढीलेपन की समस्या होती है। अगर महिलाओं की इन समस्याओं का सामाधान तुरंत न किया जाए, तो इससे भविष्य में बीमारियों का खतरा बढ़ता है।


डिलीवरी के बाद इन परेशानियों को दूर करने में योग थेरेपी काफी मददगार साबित होती है। योग गुरु स्वामी रामदेव मानते हैं कि डिलीवरी के बाद महिलाएं योग थेरेपी करें। इससे शरीर की मांसपेशियों को धीरे-धीरे मजबूत मिलती है।

पेल्विक मसल्स को मजबूत बनाती है योग थेरेपी

प्रेग्नेंसी और डिलीवरी के समय महिलाओं की पेल्विक मसल्स काफी कमजोर हो जाती हैं। ऐसे में भुजंगासन, सेतुबंधासन जैसे योगासन पेल्विक मसल्स को एक्टिव करने में मदद करते हैं। इन योगासनों को करने से शरीर का पोस्चर ठीक होता है। साथ ही, कमर और पीठ के दर्द से राहत मिलती है।

डिलीवरी के बाद योग और प्राणायाम जैसे अनुलोम-विलोम और भ्रामरी जैसे प्राणायाम करने से शरीर का हार्मोनल संतुलन बनता है। इससे नर्वस सिस्टम स्थिर होता है और महिलाओं को मानसिक शांति मिलती है। डिलीवरी के बाद योग थेरेपी करने से मूड स्विंग्स चिड़चिड़ापन और बिना कारण आने वाला गुस्सा कम होता है।


योग थेरेपी से मानसिक थकान होता है कम


योग थेरेपी का एक खास पहलू होता है श्वास प्रक्रिया। इस दौरान गहरी और नियंत्रित सांस लेने की प्रक्रिया को बार-बार दोहराया जाता है। इससे शरीर में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ता है, जिससे शरीर को एनर्जी मिलती है और थकान भी दूर होती है। डिलीवरी के बाद 40 से 50 दिनों तक लगातार योग थेरेपी करने से महिलाओं को मानसिक तौर पर शांति मिलती है। श्वास प्रक्रिया से डिलीवरी के बाद कब्ज, गैस और अपच की समस्या को भी दूर करने में मदद मिलती है।

आत्मविश्वास बढ़ाती है योग थेरेपी


कई बार डिलीवरी के बाद महिलाएं अपने शरीर में हुए बदलावों को लेकर असहज महसूस करती हैं। ऐसे में योग थेरेपी करने से महिलाओं को अपने बदले हुए शरीर को स्वीकार करने में मदद मिलती है। डिलीवरी के बाद महिलाएं नियमित योगा अभ्यास करें, तो इससे मन में स्थिरता आती है और आत्मविश्वास बढ़ता है। अगर आपकी भी हाल फिलहाल में डिलीवरी हुई है तो शारीरिक और मानसिक रिकवरी के लिए योग थेरेपी को जरूर अपनाएं। योग थेरेपी शुरुआत में 10 मिनट से शुरू करें और धीरे-धीरे इसका समय 15, 20 और 1 घंटे तक लेकर जाएं।
AC के सामने बैठकर कट रही है गर्मियां? जानिए एयर कंडीशनर के इस्तेमाल से सेहत को होने वाले नुकसान

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गर्मियों में तपती धूप से बचने के लिए दिनभर AC के सामने बैठना आज के समय में आम हो गया है, लेकिन यही आदत मोटापे का कारण बन सकती है। ...और पढ़ें




AC में ज्यादा समय बिताना बढ़ा सकता है मोटापा और स्वास्थ्य जोखिम (Picture Credit- AI Generated)

AC में रहने से शरीर का मेटाबॉलिज्म धीमा होता है


ठंडे माहौल में भूख बढ़ती है, जिससे मोटापा आता है


पसीना न आने से शरीर में टॉक्सिन्स जमा होते हैं


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज के समय में गर्मियों की चिलचिलाती धूप से बचने के लिए घंटों AC के सामने बैठना आम हो गया है। ये बात और है कि ये आरामदायक लगता है, लेकिन आपकी यह आदत आपके शरीर पर चुपके से बुरा असर डाल सकती है।


मोटापा एक ऐसा खतरा है जो बिना आहट के आपके जीवन में प्रवेश कर सकता है। अगर आप भी दिनभर एसी की ठंडी हवा में सुस्त रहते हैं, तो अलर्ट हो जाइए। आईए जानते हैं कि कैसे हमारे शरीर पर असर होता है है

जानिए कैसे बढ़ता है मोटापा
गतिविधियों में भारी गिरावट

जब शरीर आरामदायक ठंडक में रहता है, तो वह एनर्जी खर्च करने के लिए इंस्पायर नहीं होता। पूरे दिन बैठे रहना या लेटे रहना कैलोरी बर्न को बहुत कम कर देता है। नतीजा फैट तेजी से जमा होता है।

नेचुरल टेंपरेचर बैलेंस बिगड़ जाता है

गर्म मौसम में शरीर टेंपरेचर को संतुलित करने के लिए अधिक मेहनत करता है, जिससे मेटाबॉलिज्म एक्टिव रहता है। एसी में रहने से यह प्रक्रिया धीमी हो जाती है, जिससे मेटाबालिज्म दर गिरती है और वजन बढ़ने लगता है।

भूख में अनियंत्रित बढ़ोतरी

ठंडे वातावरण में शरीर को एक्स्ट्रा एनर्जी की जरूरत महसूस होती है। इसका नतीजा है बार-बार भूख लगना और बिना सोचे-समझे जंक फूड या ऑयली फूड्स का सेवन करना, जो मोटापा बढ़ाता है।
पसीने का रुकना और डिटॉक्स न होना

पसीना आना बॉडी का एक नेचुरल डिटॉक्स सिस्टम है। एसी में रहने से पसीना न के बराबर आता है, जिससे टॉक्सिन्स शरीर में जमा होते रहते हैं और वजन बढ़ने के साथ अन्य हेल्थ प्रॉब्लम्स भी हो सकती हैं।

मन और शरीर की निष्क्रियता

ठंडी हवा में दिमाग भी सुस्त पड़ सकता है, जिससे एक्साइटमेंट और ऐक्टिवनेस घटती है। इसका असर मोटिवेशन पर भी पड़ता है, जिससे एक्सरसाइज से दूरी बढ़ जाती है।
कैसे करें बचाव हर 45 मिनट बाद 5 मिनट टहलें या हल्की स्ट्रेचिंग करें।
एसी का तापमान बहुत कम न रखें, 24–26 डिग्री तक सीमित करें।
घर के कामों में खुद को व्यस्त रखें।
ताजे फल, सलाद और पानी का सेवन बढ़ाएं।
हर दिन कम से कम 30 मिनट वर्कआउट को समय दें।
आराम जरूरी है, लेकिन आराम की आदत से पैदा हुआ मोटापा जिंदगी भर का स्ट्रेस बन सकता है।
पैकेटबंद स्नैक्स और कोल्ड ड्रिंक से पुरुषों की फर्टिलिटी पर सीधा असर, कंसीव करने में आ सकती है दिक्कत

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स्टडी में पाया गया कि अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड्स पुरुषों में सबफर्टिलिटी का कारण बन सकते हैं। ...और पढ़ें







खान-पान से प्रजनन क्षमता पर प्रभाव (Picture Courtesy: Freepik)


पुरुषों में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड से सबफर्टिलिटी का खतरा बढ़ा


महिलाओं में भ्रूण के शुरुआती विकास पर नकारात्मक प्रभाव


नीदरलैंड के शोध में आधुनिक खान-पान और फर्टिलिटी का संबंध


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स, जैसे- पैकेट बंद स्नैक्स, कोल्ड ड्रिंक्स और रेडी-टू-ईट मील हमारी थाली का अहम हिस्सा बन चुके हैं।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि स्वाद का यह चस्का केवल मोटापे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पुरुषों की फर्टिलिटी को भी सीधे तौर पर प्रभावित कर रहा है? जी हां, हाल ही में हुए एक शोध ने इस विषय पर चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। आइए जानें क्या कहती है यह स्टडी।

शोध के आंकड़े क्या कहते हैं?

नीदरलैंड की रिसर्चर डॉ. रोमी गैलार्ड के नेतृत्व में एक स्टडी की गई, जिसमें आधुनिक खान-पान और फर्टिलिटी के बीच के संबंधों को गहराई से परखा गया। यह शोध साल 2017 से 2021 के बीच किया गया। इस अध्ययन की खास बात यह थी कि इसमें 831 महिलाओं और 651 पुरुषों को शामिल किया गया, ताकि यह समझा जा सके कि गर्भधारण से पहले माता-पिता की डाइट का आने वाले बच्चे और फर्टिलिटी पर क्या असर पड़ता है

अध्ययन में पाया गया कि औसतन महिलाओं के कुल खान-पान में 22 प्रतिशत हिस्सा अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का था, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा थोड़ा ज्यादा यानी 25 प्रतिशत पाया गया।
पुरुषों के लिए बढ़ता जोखिम

इस रिसर्च के सबसे चिंताजनक परिणाम पुरुषों से जुड़े हुए थे। आंकड़ों से पता चला कि जो पुरुष ज्यादा मात्रा में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खा रहे थे, उनमें सबफर्टिलिटी का जोखिम काफी बढ़ा हुआ पाया गया। सबफर्टिलिटी का मतलब है कि पुरुष की फर्टिलिटी सामान्य से कम हो जाती है, जिसके कारण पार्टनर को गर्भधारण करने में सामान्य से काफी ज्यादा समय लगता है। यानी खराब खान-पान सीधे तौर पर पुरुषों के पिता बनने की 

महिलाओं और भ्रूण के विकास पर प्रभाव

हालांकि, अध्ययन में यह देखा गया कि महिलाओं के अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खाने से गर्भधारण की संभावना पर कोई सीधा नकारात्मक असर नहीं पड़ा, लेकिन इसका प्रभाव होने वाले बच्चे के शुरुआती विकास पर जरूर दिखा। शोध के अनुसार, जो महिलाएं इस तरह का खाना ज्यादा मात्रा में खा रही थीं, उनके भ्रूण का शुरुआती विकास प्रभावित हुआ। खासतौर से योल्क सैक का आकार सामान्य से छोटा पाया गया। बता दें कि योल्क सैक भ्रूण के विकास के लिए बेहद जरूरी होता है, क्योंकि यह शुरुआती चरणों में उसे पोषण देता है।
पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के लिए ज्यादा खतरनाक है टीबी, डॉक्टर ने बताया छीन सकता है मां बनने का सुख

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24 मार्च का दिन हर साल World TB Day के रूप में मनाया जाता है। ...और पढ़ें






लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। अक्सर हम यही मानते हैं कि टीबी सिर्फ फेफड़ों से जुड़ी एक बीमारी है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह महिलाओं के रिप्रोडक्टिव सिस्टम को भी अपना शिकार बना सकती है?

गुरुग्राम स्थित CIFAR की डायरेक्टर और रिप्रोडक्टिव हेल्थ एक्सपर्ट, डॉ. पुनीत राणा अरोड़ा के अनुसार, महिलाओं के लिए टीबी एक गंभीर खतरा बन सकती है, जिसे 'जननांग टीबी' (Genital TB) कहा जाता है। यह समस्या विशेष रूप से उन महिलाओं को अपना शिकार बनाती है जिनकी इम्युनिटी कमजोर होती है।




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महिलाओं के शरीर पर कैसे होता है असर?

जब टीबी का संक्रमण महिलाओं के प्रजनन अंगों तक पहुंचता है, तो यह गर्भाशय, फैलोपियन ट्यूब और अंडाशय को भारी नुकसान पहुंचाता है। इसका सबसे खतरनाक नतीजा बांझपन के रूप में सामने आता है।

दरअसल, टीबी के कारण फैलोपियन ट्यूब में सूजन या ब्लॉकेज आ जाती है। इस रुकावट के चलते महिला के अंडे और पुरुष के शुक्राणु आपस में मिल नहीं पाते हैं। इसके कारण कई और गंभीर परेशानियां जन्म लेती हैं, जैसे:

पीरियड्स का अनियमित होना या पूरी तरह से रुक जाना।
गर्भधारण करने में बहुत अधिक कठिनाई होना।
गर्भ ठहरने के बाद बार-बार गर्भपात हो जाना।
पुरुषों और महिलाओं में टीबी के असर में क्या अंतर है?

डॉ. अरोड़ा बताती हैं कि पुरुषों में टीबी का संक्रमण ज्यादातर फेफड़ों तक ही सीमित रहता है। हालांकि, कुछ मामलों में यह पुरुषों के प्रजनन अंगों- जैसे टेस्टिस और प्रोस्टेट को भी प्रभावित कर सकता है। इससे पुरुषों के स्पर्म काउंट और उनकी क्वालिटी में गिरावट आ सकती है, लेकिन एक बड़ी राहत की बात यह है कि महिलाओं की तुलना में पुरुषों में टीबी के कारण बांझपन का खतरा काफी कम होता है।




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बीमारी को पहचानने में क्यों होती है देरी?

महिलाओं में इस 'जेनिटल टीबी' की सबसे बड़ी चुनौती इसका छिपकर वार करना है। इसके लक्षण बहुत ही सामान्य और हल्के होते हैं, जैसे:हल्का पेट दर्द रहना
बेवजह कमजोरी महसूस होना
पीरियड्स साइकिल में बदलाव आना

अक्सर महिलाएं इन लक्षणों को आम बात समझकर नजरअंदाज कर देती हैं, और यही कारण है कि इस गंभीर बीमारी का पता बहुत देर से चलता है।

सही समय पर इलाज है बचाव

टीबी से घबराने की नहीं, बल्कि सतर्क रहने की जरूरत है। अगर सही समय पर इसकी जांच हो जाए और सही इलाज मिले, तो टीबी को पूरी तरह से ठीक किया जा सकता है। महिलाओं को यह खास ध्यान रखना चाहिए कि यदि उन्हें लंबे समय तक गर्भधारण करने में परेशानी हो रही हो या उनके पीरियड्स में लगातार बदलाव दिख रहा हो, तो वे बिना देरी किए डॉक्टर से सलाह जरूर लें।
दांतों में दर्द से लेकर मसूड़ों की सूजन तक, ये 9 लक्षण चीख-चीख कर कह रहे हैं- 'डेंटिस्ट की जरूरत है'

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आमतौर पर हम दांतों की छोटी-मोटी समस्याओं को टाल देते हैं और डॉक्टर के पास तभी जाते हैं जब दर्द बर्दाश्त के बाहर हो जाता है। ...और पढ़ें





अगर आपके साथ भी हो रहा है ऐसा, तो डेंटिस्ट के पास भागने में ही भलाई है (Image Source: AI-Generated)


मुंह पूरे शरीर की सेहत का आईना होता है


9 लक्षण दिखें तो तुरंत डेंटिस्ट से मिलें


तंबाकू, शराब छोड़ें, सही खानपान अपनाएं


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज 20 मार्च को दुनियाभर में World Oral Health Day 2026 मनाया जा रहा है। क्या आप जानते हैं कि हमारा मुंह हमारे पूरे शरीर की सेहत का 'आईना' होता है?

मैक्स मल्टी स्पेशलिटी सेंटर, नोएडा के निदेशक और एचओडी (मैक्सिलोफेशियल सर्जरी और इंप्लांटोलॉजी) डॉ. केशव नैथानी के अनुसार, कई बार शरीर की गंभीर बीमारियों के लक्षण सबसे पहले हमारे मुंह में ही दिखाई देते हैं।

दिल की बीमारी, कैंसर, सांस की तकलीफ और डायबिटीज जैसी गंभीर बीमारियों और दांतों की समस्याओं के पीछे अक्सर एक जैसे ही कारण होते हैं। इनमें तंबाकू का सेवन, शराब पीना और बहुत ज्यादा मीठा खाना शामिल है। अगर इन शुरुआती समस्याओं का सही समय पर इलाज न किया जाए, तो ये न सिर्फ दांतों को बल्कि आपके पूरे शरीर को भारी नुकसान पहुंचा सकती हैं।







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9 लक्षण दिखते ही जाएं डेंटिस्ट के पास (Dental Health Warning Signs)

अगर आपको अपने मुंह या दांतों में नीचे दी गई कोई भी समस्या महसूस हो, तो तुरंत डेंटिस्ट से संपर्क करना चाहिए:मुंह में छाले या न भरने वाले घाव: अगर आपके मुंह में कोई लाल या सफेद निशान या छाला है जो दो हफ्ते से ज्यादा समय से ठीक नहीं हो रहा है, तो इसे हल्के में न लें। यह किसी गहरे इन्फेक्शन या ओरल कैंसर का संकेत हो सकता है।
लगातार सूजन या गांठ: मसूड़ों, जबड़े या गले के हिस्से में सूजन आना 'एब्सेस' का लक्षण हो सकता है। अगर इसका इलाज नहीं हुआ, तो यह इन्फेक्शन खून या आस-पास के हिस्सों में फैल सकता है।
पक्के दांतों का हिलना: वयस्कों के दांत हिलने नहीं चाहिए। अगर ऐसा हो रहा है, तो यह मसूड़ों की गंभीर बीमारी, किसी चोट या ऑस्टियोपोरोसिस का इशारा हो सकता है।
मसूड़ों से खून आना: खाना खाते समय या ब्रश करते वक्त मसूड़ों से खून आना मसूड़ों की बीमारी (जिंजिवाइटिस या पेरियोडोंटाइटिस) का सबसे आम लक्षण है, जिस पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है।
दांतों में झनझनाहट: ज्यादा ठंडा, गरम या मीठा खाने पर दांतों में तेज झनझनाहट होना यह बताता है कि दांतों की ऊपरी परत घिस गई है, दांतों में कैविटी है या दांत क्रैक हो गए हैं।
लगातार दांतों में दर्द: अगर दांतों में लगातार दर्द बना रहता है, तो इसका मतलब है कि दांतों में सड़न हो चुकी है और उसे इलाज की सख्त जरूरत है।
सांसों की बदबू और मुंह का खराब स्वाद: अगर आपके मुंह से लगातार बदबू आती है या स्वाद अजीब रहता है, तो यह मसूड़ों की बीमारी, इन्फेक्शन या कैविटी के कारण हो सकता है।
जबड़े में दर्द या आवाज आना: जबड़ा हिलाते समय दर्द होना, परेशानी महसूस होना या 'कट-कट' की आवाज आना टीएमजे डिसऑर्डर का संकेत हो सकता है।
मुंह का हमेशा सूखना: लंबे समय तक मुंह सूखने की वजह से मसूड़ों की बीमारी और कैविटी का खतरा बहुत बढ़ जाता है। यह किसी दवाई के साइड इफेक्ट, डिहाइड्रेशन या किसी अन्य बीमारी के कारण हो सकता है।
ओरल हेल्थ को बेहतरीन बनाए रखने के उपाय

ओरल हेल्थ से जुड़ी समस्याओं से बचना बहुत आसान है:
सही खानपान: अपनी डाइट में चीनी कम करें। ताजे फल और सब्जियां ज्यादा खाएं और दिन भर पर्याप्त मात्रा में पानी पीते रहें।
तंबाकू से दूरी: किसी भी तरह के तंबाकू या सुपारी चबाने की आदत को पूरी तरह छोड़ दें।
शराब से परहेज: शराब से दूरी बनाएं।
सुरक्षा का ध्यान: साइकिल चलाते समय या खेलकूद के दौरान चेहरे और दांतों को चोट से बचाने के लिए माउथगार्ड या हेलमेट जैसे सुरक्षा उपकरणों का इस्तेमाल करें।
ब्रश करने का सही तरीका: दांतों को सड़न से बचाने के लिए फ्लोराइड बहुत जरूरी है। इसलिए दिन में दो बार फ्लोराइड वाले टूथपेस्ट से ब्रश जरूर करें।
 डाइटिंग में पास्ता छोड़ रहे हैं? रुकिए! डॉक्टर ने बताया वजन बढ़ने का असली कारण

डाइटिंग में पास्ता छोड़ रहे हैं? रुकिए! डॉक्टर ने बताया वजन बढ़ने का असली कारण

डाइटिंग में पास्ता छोड़ रहे हैं? रुकिए! डॉक्टर ने बताया वजन बढ़ने का असली कारण

कई लोग मानते हैं कि पास्ता खाने से वजन बढ़ता है, लेकिन असल में पास्ता खुद नहीं, बल्कि उसमें डाली जाने वाली चीजें वजन बढ़ाती हैं। ...और पढ़ें





डाइटिंग में पास्ता छोड़ना गलत! जानें वजन बढ़ने का असली सच (Picture Credit- AI Generated)

पास्ता खुद नहीं, उसमें डलने वाली चीजें वजन बढ़ाती हैं


होलव्हीट पास्ता फाइबर युक्त, पाचन और शुगर नियंत्रित करता है


सही सामग्री, मात्रा और ग्लूटेन-फ्री विकल्प चुनें


लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। पास्ता कई लोगों का पसंदीदा फूड होता है। लोग अक्सर अपनी पसंद के मुताबिक इन्हें खाते हैं, लेकिन अक्सर इसे खाने के बाद गिल्ट भी करते हैं। कई लोगों का ऐसा मानना है कि पास्ता खाने से वजन बढ़ता और इसलिए कई लोग इसे खाने से कतराते हैं।


क्या आप भी उन लोगों में से हैं, जिन्हें है कि एक प्लेट पास्ता खाना मतलब सीधा वजन बढ़ाना है? कई समय से पास्ता को 'डाइटिंग का सबसे बड़ा दुश्मन' माना जाता रहा है। लोग सोचते हैं कि यह सिर्फ स्टार्च और कार्बोहाइड्रेट का मिश्रण है, जो पेट फुलाता है और सुस्ती लाता है। लेकिन सच वो नहीं, जो आप मानते आए हैं। सच इससे काफी अलग है, जिसके बारे में मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, नोएडा में क्लिनिकल न्यूट्रिशन की हेड डॉ. करुणा चतुर्वेदी बता रही हैं।
डॉक्टर बताती हैं कि अगर इसे सही तरीके और सही चीजों के साथ खाया जाए, तो यह आपकी सेहतमंद डाइट और वजन कम करने के सफर का एक शानदार हिस्सा बन सकता है। आइए, पास्ता से जुड़े ऐसे ही कुछ मिथकों को तोड़ते हैं और इसका असली सच जानते हैं:-

क्या पास्ता सच में सिर्फ 'एम्पटी कैलोरी' है?

डॉक्टर बताती हैं कि पास्ता मुख्य रूप से कार्बोहाइड्रेट है, जो हमारे शरीर और दिमाग के लिए एनर्जी का सबसे बड़ा सोर्स है। यही वजह है कि एथलीट इसे इतना पसंद करते हैं।


इसमें सिर्फ कार्ब्स नहीं होते, बल्कि इसमें बी-विटामिन्स (जैसे थायमिन और फोलेट) और आयरन भी होता है। अगर आप होलव्हीट (साबुत अनाज) पास्ता चुनते हैं, तो आपको ढेर सारा फाइबर, मैग्नीशियम और एंटीऑक्सीडेंट्स भी मिलते हैं।
क्या पास्ता खाने से वजन बढ़ता है?

इस सवाल का जवाब देते हुए डॉक्टर ने बताया कि पास्ता आपको मोटा नहीं करता, बल्कि उसमें डलने वाली चीजें करती हैं! सादा सूखा पास्ता असल में लो-फैट होता है।वजन बढ़ाने वाले असली विलेन: जब आप पास्ता में ढेर सारा चीज (Cheese), बटर, हेवी क्रीम सॉस और प्रोसेस्ड मीट मिलाते हैं, तो उसकी कैलोरी बहुत ज्यादा बढ़ जाती है।
हेल्दी तरीका: पास्ता को टमाटर की सॉस, खूब सारी हरी सब्जियों, ऑलिव ऑयल और गुड प्रोटीन (जैसे चिकन, दालें या मछली) के साथ बनाएं। यह आपका पेट भी भरेगा और वजन भी नहीं बढ़ाएगा।
मात्रा का ध्यान रखें: आप कितना खा रहे हैं, इस बात का ध्यान रखना भी बहुत जरूरी है! एक वयस्क के लिए 75 ग्राम कच्चा पास्ता (जो पकने के बाद 180-200 ग्राम हो जाता है) एकदम सही है। इससे ज्यादा इसे खाना हानिकारक हो सकता है।
सफेद पास्ता बनाम होलव्हीट पास्ता: कौन-सा बेहतर है?सफेद पास्ता: इसे रिफाइंड गेहूं से बनाया जाता है, जिसमें से फाइबर वाला बाहरी हिस्सा निकाल दिया जाता है।
होलव्हीट पास्ता: यह पूरे अनाज से बनता है। सफेद पास्ता के मुकाबले इसमें फाइबर लगभग दोगुना (6 से 9 ग्राम) होता है। यह आपके पाचन को धीमा करता है, शुगर लेवल को कंट्रोल रखता है और आपको लंबे समय तक भूख नहीं लगने देता।
पास्ता खाने के बाद पेट क्यों फूलता है या सुस्ती क्यों आती है?

अगर आपको पास्ता खाने के बाद गैस या पेट फूलने की समस्या होती है, तो इसके पीछे दो कारण हो सकते हैं:
ग्लूटेन या FODMAPs: कुछ लोगों को गेहूं के ग्लूटेन या उसमें मौजूद खास तरह के कार्ब्स (FODMAPs) से एलर्जी होती है, जिसे पचाना आंतों के लिए मुश्किल होता है।
सुस्ती का कारण: अगर आप रिफाइंड सफेद पास्ता बहुत ज्यादा मात्रा में खा लेते हैं, तो ब्लड शुगर तेजी से बढ़ता और गिरता है, जिससे नींद आने लगती है।
अगर गेहूं से एलर्जी है, तो क्या पास्ता नहीं खा सकते?

आजकल बाजार में ग्लूटेन-फ्री (Gluten-free) पास्ता के बेहतरीन विकल्प मौजूद हैं:
दालों वाला पास्ता: यह पास्ता छोले, मसूर या मटर से बनता है। इनमें गेहूं वाले पास्ता से भी ज्यादा प्रोटीन और फाइबर होता है।
चावल या क्विनोआ पास्ता: इनका स्वाद और टेक्सचर एकदम रेगुलर पास्ता जैसा होता है और ये पचने में बहुत आसान होते हैं।
वैज्ञानिकों ने ढूंढ निकाला दवाओं को असरदार बनाने का 'सीक्रेट' तरीका, कैंसर के इलाज में मिलेगी मदद

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वैज्ञानिकों ने 'ट्राइसल्फाइड मेटाथेसिस प्रतिक्रिया' नामक एक नई रासायनिक प्रक्रिया खोजी है। ...और पढ़ें





वैज्ञानिकों ने खोजा वो 'सीक्रेट बॉन्ड' जिससे मिनटों में बनेंगी असरदार दवाएं (Image Source: Freepik)


नई 'ट्राइसल्फाइड मेटाथेसिस प्रतिक्रिया' की दुर्लभ वैज्ञानिक खोज


बिना बाहरी गर्मी, कमरे के तापमान पर सेकंडों में प्रतिक्रिया


कैंसर दवाओं, बायोटेक्नोलॉजी, रीसायकल प्लास्टिक में क्रांतिकारी उपयोग


प्रेट्र, नई दिल्ली। क्या आपने कभी सोचा है कि बिना किसी बाहरी गर्मी, रोशनी या केमिकल के कोई रासायनिक प्रतिक्रिया अपने आप सेकंडों में पूरी हो सकती है? वैज्ञानिकों ने एक ऐसी ही अद्भुत और दुर्लभ खोज की है। इस नई खोज ने दवा निर्माण, प्रोटीन विज्ञान और बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में विकास के नए दरवाजे खोल दिए हैं। आइए, इस अहम वैज्ञानिक खोज को डिटेल में समझते हैं।




(Image Source: Freepik)
क्या है यह नई रिसर्च?

शोधकर्ताओं ने एक पूरी तरह से नई रासायनिक प्रक्रिया की खोज की है, जिसे 'ट्राइसल्फाइड मेटाथेसिस प्रतिक्रिया' नाम दिया गया है। इसके बारे में मशहूर विज्ञान पत्रिका 'नेचर केमिस्ट्री' में प्रकाशित किया गया है।

इस प्रतिक्रिया की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह सामान्य कमरे के तापमान पर, बिना किसी बाहरी एजेंट या उत्तेजना (जैसे गर्मी या रोशनी) के अपने आप काम करती है। यह प्रतिक्रिया कुछ ही सेकंडों में पूरी हो जाती है और इसके परिणाम बेहद साफ, सटीक और कुशल होते हैं।
सल्फर-सल्फर बांड्स का खेल

इस पूरी खोज के केंद्र में 'सल्फर-सल्फर बांड' हैं। ये बांड पेप्टाइड्स, प्रोटीन, दवा के अणुओं और वल्कनाइज्ड रबर जैसे पॉलिमर्स में मौजूद होते हैं। बता दें, ये प्रोटीन को उसकी संरचनात्मक मजबूती और स्थिरता देने के लिए बहुत जरूरी होते हैं।

अब तक, बिना किसी बाहरी रसायन या गर्मी के इन बांड्स को अपनी मर्जी से बनाना या तोड़ना बहुत मुश्किल माना जाता था, लेकिन यह नई प्रतिक्रिया इसे स्वचालित रूप से कर सकती है।



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कैसे हुई यह खोज?

इस अनोखी खोज की शुरुआत ऑस्ट्रेलिया के फ्लिंडर्स विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जस्टिन चाल्कर और यूके के लिवरपूल विश्वविद्यालय के उनके सहयोगी टॉम हैसेल के काम से हुई।

उन्होंने शुरुआत में कुछ खास सॉल्वेंट्स में S-S बांड्स के अजीब और हैरान करने वाले व्यवहार पर ध्यान दिया।

इसके बाद, उन्होंने एक मॉडल तैयार किया जो यह समझाता है कि ये बांड कैसे टूटते हैं, कैसे फिर से बनते हैं और यह हमारे लिए कैसे उपयोगी हो सकता है।
भविष्य के लिए इसके शानदार उपयोग

फ्लिंडर्स विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने इस नई प्रतिक्रिया के कई बेहतरीन फायदे बताए हैं, जिनकी मदद से कई क्षेत्रों में क्रांति आ सकती है:कैंसर की दवाओं में सुधार: चाल्कर लैब के शोधकर्ता हर्षल पटेल के अनुसार, इस प्रतिक्रिया का सफलतापूर्वक इस्तेमाल कैंसर रोधी दवाओं और दवाइयों की खोज से जुड़े केमिकल को संशोधित करने के लिए किया गया है।
रीसायकल होने वाला प्लास्टिक: इस तकनीक से ऐसे नए और बेहतरीन प्लास्टिक बनाए जा सकते हैं जिन्हें आसानी से आकार दिया जा सकता है, इस्तेमाल किया जा सकता है और जरूरत पड़ने पर रीसायकल करने के लिए तोड़ा जा सकता है।
दवा और विज्ञान में तेज विकास: प्राकृतिक उत्पादों और दवाओं के अणुओं को बदलने में यह बेहद काम आ रही है। इसके उच्च प्रतिक्रिया दर की वजह से चिकित्सा से जुड़े यौगिकों को तेजी से तैयार किया जा सकता है।

फ्लिंडर्स विश्वविद्यालय के वरिष्ठ लेखक प्रोफेसर जस्टिन चाल्कर के शब्दों में कहें तो, किसी पूरी तरह से नई प्रतिक्रिया की खोज होना अपने आप में बहुत दुर्लभ है। और यह उससे भी ज्यादा दुर्लभ है कि एक ही खोज इतने सारे अलग-अलग क्षेत्रों में उपयोगी साबित हो। शोधकर्ताओं की टीम इस बात को लेकर बेहद उत्साहित है कि आने वाले समय में इस रसायन विज्ञान को उन तरीकों से भी इस्तेमाल किया जाएगा, जिनकी अभी हमने कल्पना भी नहीं की है।
भारत में भरपूर धूप, फिर भी लोगों में विटामिन-डी की कमी क्यों? जानिए इसके चौंकाने वाले कारण

भारत में भरपूर धूप, फिर भी लोगों में विटामिन-डी की कमी क्यों? जानिए इसके चौंकाने वाले कारण

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भारत जैसे देश में धूप की कभी कमी नहीं होती, लेकिन फिर भी ज्यादातर भारतीयों में विटामिन-डी की कमी देखने को मिलती है। ...और पढ़ें







लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। भारत एक ऐसा देश है जहां साल के ज्यादातर महीनों में सूरज की भरपूर रोशनी रहती है। इसके बावजूद, ज्यादातर भारतीयों में विटामिन-डी की कमी देखने को मिलती है। यह चौंकाने वाला जरूरी है, लेकिन सच है।


इसलिए यह सवाल करना जरूरी है कि ऐसा क्यों है? जिस देश में धूप की कोई कमी नहीं है, वहां लोगों में विटामिन-डी की कमी क्यों पाई जा रही है। आइए जानें इसके पीछे छिपे कारणों के बारे में।
भारतीयों में विटामिन-डी की कमी के कारण



(AI Generated Image)मेलानिन- भारतीयों की त्वचा का रंग प्राकृतिक रूप से गेहुआं या गहरा होता है। हमारी त्वचा में मेलानिन नाम का पिगमेंट ज्यादा मात्रा में होता है। मेलानिन सूरज की अल्ट्रावायलेट किरणों के खिलाफ एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है, जो त्वचा को जलने से तो बचाता है, लेकिन विटामिन-डी के निर्माण की प्रक्रिया को धीमा कर देता है। गोरी त्वचा की तुलना में गहरी त्वचा को उतना ही विटामिन-डी बनाने के लिए धूप में ज्यादा समय बिताना पड़ता है।
बदलती लाइफस्टाइल- आज की ज्यादातर आबादी घर के अंदर रहने लगी है। सुबह 9 से शाम 6 की डेस्क जॉब, बंद दफ्तर और एसी के कमरों ने हमें सूरज से दूर कर दिया है। शहरी इलाकों में ऊंची इमारतों के कारण घरों तक सीधी धूप नहीं पहुंच पाती।
प्रदूषण- महानगरों में बढ़ता वायु प्रदूषण भी एक बड़ा कारण है। हवा में मौजूद धूल के कण और धुएं के कारण सूरज की अल्ट्रावायलेट किरणों हम तक पहुंच नहीं पाती हैं, जिसके कारण विटामिन-डी बनाने की प्रक्रिया रुक जाती है।
खान-पान में बदलाव- खान-पान में विटामिन-डी के नेचुरल सोर्स बहुत सीमित हैं, जैसे- फैटी फिश, अंडे की जर्दी और डेयरी प्रोडक्ट्स। भारत की एक बड़ी आबादी शाकाहारी है, जिससे खाने के जरिए इस विटामिन की पूर्ति करना मुश्किल हो जाता है।
विटामिन-डी की कमी के लक्षण हड्डियों और जोड़ों में लगातार दर्द रहना
हर वक्त थकान और कमजोरी महसूस होना
मांसपेशियों में खिंचाव
डिप्रेशन या चिड़चिड़ापन
बार-बार बीमार पड़ना

क्या है इसका समाधान?धूप का सही समय- सुबह 10 बजे से दोपहर 3 बजे के बीच कम से कम 15-20 मिनट धूप में बिताएं। इस समय UVB किरणें सबसे ज्यादा प्रभावी होती हैं।
खान-पान में बदलाव- अपने खाने में मशरूम, फोर्टिफाइड दूध, दही और पनीर शामिल करें।
जांच और सप्लीमेंट- अगर आप लगातार थकान महसूस करते हैं, तो एक बार ब्लड टेस्ट जरूर करवाएं। डॉक्टर की सलाह पर विटामिन-डी के सप्लीमेंट्स लेना भी कमी दूर करने का असरदार तरीका है।