World Autism Awareness Day: पटना में आटिज्म से पीड़ित बच्चों की दुनिया को समझने और उन्हें सहयोग देने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। माता-पिता अक्सर श ...और पढ़ें

एआई द्वारा जेनरेट की गई ग्राफिक।
आटिज्म बीमारी नहीं, बल्कि एक न्यूरो-विकासात्मक स्थिति है।
शुरुआती पहचान, थेरेपी और सहयोग से बच्चे सामान्य जीवन जीते हैं।
स्क्रीन टाइम सीमित कर सामाजिक संपर्क बढ़ाना बच्चों के लिए आवश्यक।
पटना। करीब पांच वर्ष का बच्चा, जो न तो आंखें मिलाता है और न ही पुकारने पर तुरंत प्रतिक्रिया देता है। बस अपनी ही दुनिया में गुम, कभी खिलौनों को सजाता है तो कभी एक ही हरकत को बार-बार दोहराता है।
वर्षों तक माता-पिता यह समझ ही नहीं पाते कि उनका बच्चा खामोश या शांतप्रिय नहीं बल्कि आटिज्म की अलग दुनिया में जी रहा है। राजधानी पटना समेत प्रदेश के लाखों परिवार इसी अनुभव से गुजर रहे हैं।
माता-पिता शुरुआत यानी डेढ़ से दो वर्ष में इसकी पहचान कर सकें, इसलिए हर वर्ष 2 अप्रैल को विश्व आटिज्म जागरूकता दिवस मनाया जाता है। अब इसे बीमारी नहीं बल्कि एक अलग न्यूरो-विकासात्मक स्थिति के रूप में देखा जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे बच्चों की सोच, सीखने व प्रतिक्रिया देने का तरीका अलग होने से उन्हें संभालना चुनौतीपूर्ण है लेकिन उम्मीद भी है। जागरूकता, सही इलाज व समाज के सहयोग से ये बच्चे अलग पहचान बना रहे हैं, बस जरूरत उन्हें समझने और स्वीकार करने की है।
स्क्रीन से भाषा विकास हो रहा प्रभावित
आइजीआइएमएस की क्लीनिकल चाइल्ड साइकोलाजिस्ट डॉ. प्रियंका के अनुसार उनकी ओपीडी में हर दिन दो से चार नए आटिज्म स्पेक्ट्रम डिसआर्डर यानी एएसडी पीड़ित बच्चे आते हैं। फालोअप को जोड़े तो इनकी संख्या 6 से आठ हो जाती है।
यह एक बड़ी मानसिक स्वास्थ्य चुनौती की ओर संकेत कर रहा है। प्रदेश में हर सौ में से एक तो देश में 80 में से एक बच्चा एएसडी ग्रसित है। इसके शुरुआती लक्षण 18 से 24 माह दिखने लगते हैं।
जागरूकता की कमी के कारण प्रदेश में जब बच्चे स्कूल जाते हैं तब समस्या का पता चलता है। यदि शुरुआत में पहचान हो जाए और स्पीच, आकुपेशनल व बिहेवियरल थेरेपी के साथ सामाजिक सहयोग मिले तो ऐसे बच्चे सामान्य जीवन जी सकते हैं।
मोबाइल या स्क्रीन में अधिक समय बिताने से छोटे बच्चे समाज से कटते हैं और उनका भाषा विकास प्रभावित होता है। इससे आटिज्म के लक्षण और अधिक गंभीर प्रतीत होते हैं। बच्चों का स्क्रीन टाइम सीमित करने व वास्तविक सामाजिक संपर्क बढ़ाना जरूरी है।
बेटियों में कम नहीं पर होती उनकी अनदेखी
क्लीनिकल साइकोलाजिस्ट सह पटना यूनिवर्सिटी में विजिटिंग फैकल्टी ईशा सिंह के अनुसार आटिज्म स्पेक्ट्रम डिसआर्डर बच्चों में होने वाला एक न्यूरो-डेवलपमेंटल डिसआर्डर है।
इससे उनके व्यवहार, संवाद क्षमता व सामाजिक विकास पर असर पड़ता है। लड़कों में यह समस्या लड़कियों की तुलना में अधिक यानी यदि तीन लड़के तो एक लड़की इससे पीड़ित होती है।
इसका सामाजिक कारण है, अधिसंख्य माता-पिता बेटों को जांच के लिए डाक्टर के पास ले जाते हैं लेकिन बेटियों को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। थेरेपी और जरूरत पड़ने पर दवाओं से इसे काफी हद तक ठीक किया जा सकता है।
जरूरत बच्चों के व्यवहार में बदलाव की अनदेखी के बजाय साइकोलाजिस्ट से परामर्श लेने की है। पटना में थेरेपी सेंटर, स्पेशल स्कूल व प्रशिक्षित विशेषज्ञों की कमी भी एक बड़ी चुनौती है।
क्या आटिज्म व इसका कारण
आटिज्म एक न्यूरो-विकासात्मक विकार है, रोग नहीं। यह बच्चे के सामाजिक व्यवहार, संचार क्षमता व सीखने के तरीके को प्रभावित करता है।
इसे आटिज्म स्पेक्ट्रम डिसआर्डर (एएसडी) भी कहते हैं क्योंकि इसके लक्षण व तीव्रता हर बच्चे में अलग होती है। इसका कोई एक निश्चित कारण नहीं है।
यह मुख्यतः आनुवंशिक और मस्तिष्क के विकास में होने वाले बदलावों से जुड़ा होता है। गर्भावस्था के दौरान कुछ जैविक कारक भी इसकी संभावना को प्रभावित कर सकते हैं।
मुख्य लक्षण व क्या करें
यदि बच्चा आंखों में आंखें डाल कर नहीं देखे, बोलने में देरी, बार-बार एक ही गतिविधि दोहराए, बोलने में देरी या भाषा का असामान्य प्रयोग, आवाज देने पर तुरंत प्रतिक्रिया नहीं दे तो तुरंत जांच कराएं। माता-पिता बच्चों का स्क्रीन टाइम सीमित कर, उनसे बातचीत व खेल का समय बढ़ाएं।