होर्मुज से परमाणु मुद्दे तक अटकी बातचीत: इस्लामाबाद वार्ता से पहले अमेरिका-ईरान में मतभेद, क्या निकलेगा समाधान?

 होर्मुज से परमाणु मुद्दे तक अटकी बातचीत: इस्लामाबाद वार्ता से पहले अमेरिका-ईरान में मतभेद, क्या निकलेगा समाधान?


अमेरिका और ईरान इस्लामाबाद में वार्ता कर रहे हैं, लेकिन प्रमुख मुद्दों पर गहरे मतभेद बने हुए हैं। ईरान यूरेनियम संवर्धन और होर्मुज पर नियंत्रण चाहता ह ...और पढ़ें




अमेरिका-ईरान वार्ता इस्लामाबाद में, गहरे मतभेद बरकरार।


ईरान यूरेनियम संवर्धन, होर्मुज पर नियंत्रण चाहता है।


इजरायल-हिजबुल्लाह संघर्ष शांति समझौते में बड़ी बाधा।


डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान शुक्रवार को इस्लामाबाद में वार्ता करने वाले हैं, लेकिन समझौते की राह बहुत आसान नहीं है। भले ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि ईरान की ओर से पेश प्रस्ताव बातचीत का आधार बन सकते हैं।


लेकिन दोनों ही पक्षों में कई अहम मुद्दों पर गहरे मतभेद हैं और वे अपनी-अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं। फिर भी कोई समझौता होता है तो यह आगामी कई पीढि़यों तक पश्चिम एशिया के भविष्य को तय कर सकता है।

दोनों पक्षों का रुख

इस्लामाबाद में बातचीत 10 सूत्रीय प्रस्ताव के आधार पर होगी। इसमें अमेरिका की ओर से पूर्व में पेश 15 सूत्रीय योजना से बहुत कम समानताएं हैं। इससे संकेत मिलता है कि दोनों पक्षों के बीच की खाई पाटने के लिए अभी काफी काम करना बाकी है।

उदाहरण के तौर पर ईरान के प्रस्ताव में यूरेनियम संवर्धन की मांग शामिल है, जिसे अमेरिका पहले ही खारिज कर चुका है। ट्रंप ने साफ कहा है कि इस मुद्दे पर कोई बातचीत नहीं होगी। 10 बिंदुओं में ईरान की मिसाइल क्षमताओं का कोई जिक्र नहीं है, जिनके बारे में इजरायल और अमेरिका ने कहा है कि उन्हें बड़े पैमाने पर कम करना होगा।


जबकि ईरान इस पर कोई बात नहीं करना चाहता। एक पाकिस्तानी अधिकारी ने कहा कि ईरान अपनी पुनर्निर्माण, हर्जाना और प्रतिबंधों में राहत जैसी मांगें मनवाने की उम्मीद कर सकता है, लेकिन यूरेनियम संवर्धन पर किसी समझौते की उम्मीद नहीं कर सकता।

वार्ता के एजेंडे में सबसे ऊपर होर्मुज

पिछली बातचीत ईरान के परमाणु कार्यक्रम और मिसाइलों पर केंद्रित थी। लेकिन अब होर्मुज स्ट्रेट का मुद्दा हावी हो गया है। ईरान ने संकेत दिया है कि एक स्थायी शांति समझौते के तहत वह यहां से गुजरने वाले जहाजों से शुल्क वसूलेगा।


ट्रंप ने धमकी दी थी कि यदि तेहरान युद्धविराम समझौते पर सहमत नहीं होता और होर्मुज को फिर से नहीं खोलता, तो वह ईरान को तबाह कर देंगे। जबकि ईरान ने कहा है कि अगर इजरायल लेबनान पर हमले जारी रखेगा तो कोई समझौता नहीं होगा।

ईरान की शर्तें बनाम अमेरिकी प्रस्ताव

ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने एक बयान में कहा कि अमेरिका ईरान की 10-सूत्रीय योजना को स्वीकार करने पर सहमत हो गया है और इन पर सैद्धांतिक रूप से प्रतिबद्धता जताई है। इनमें हमले नहीं करना, होर्मुज पर ईरान का नियंत्रण बनाए रखना, यूरेनियम संवर्धन की स्वीकृति, सभी प्राइमरी व सेकेंडरी प्रतिबंधों को हटाना, यूएनएससी व अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के बोर्ड आफ गवर्नर्स द्वारा पारित सभी प्रस्तावों को खत्म करना, क्षेत्र से अमेरिकी सेनाओं की वापसी; लेबनान में हिजबुल्लाह समेत सभी मोर्चों पर युद्ध की समाप्ति शामिल है।


इजरायली सूत्रों के अनुसार, पूर्व में पाकिस्तान के जरिये ईरान को भेजे गए ट्रंप के 15-सूत्रीय प्रस्ताव में ईरान के अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम के भंडार को हटाना, संवर्धन रोकना, बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर अंकुश और क्षेत्रीय सहयोगियों के लिए फं¨डग बंद करने की मांग रखी गई थी।

स्थायी समझौता होने की कितनी संभावना

ट्रंप ने हालांकि युद्ध में जीत की घोषणा कर दी है, लेकिन अमेरिका उन लक्ष्यों को हासिल नहीं कर पाया, जिनकी घोषणा उसने युद्ध की शुरुआत में इसे सही ठहराने के लिए की थी। ईरान की अपने पड़ोसियों पर हमला करने की क्षमता को खत्म करना, उसके परमाणु कार्यक्रम को नष्ट करना और ऐसी परिस्थितियां बनाना जिनसे ईरानियों के लिए अपनी सरकार को गिराना आसान हो जाए।


इस बात की संभावना कम ही है कि ईरान इन मुद्दों पर कोई बड़ी रियायत देगा। उसने यह संकेत भी दिया है कि वह धैर्यपूर्वक लड़ना जारी रख सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य उसे ऐसे दुश्मन के मुकाबले आर्थिक बढ़त देता है, जिसके पास कहीं अधिक मारक क्षमता है।

इजरायल का रुख और लेबनान का मुद्दा

लेबनान में ईरान के सहयोगी हिजबुल्लाह पर लगातार हमले कर रहा इजरायल तेहरान को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता है। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ईरान में सत्ता परिवर्तन चाहते हैं, भले ही इसके लिए शायद जमीन पर सेना उतारनी पड़े और उसके बाद स्थिरता की कोई गारंटी न हो।


यह सवाल कि क्या युद्धविराम में हिजबुल्लाह के विरुद्ध इजरायल का युद्ध भी शामिल है, एक ऐसा पेचीदा मुद्दा बन गया है जो इस शांति समझौते के लिए खतरा पैदा कर रहा है। अमेरिका और इजरायल का कहना है कि लेबनान इस समझौते में शामिल नहीं है, जबकि ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने कहा है कि लेबनान में शत्रुता को रोकना युद्धविराम की एक अनिवार्य शर्त थी।

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