1 साल का बच्चा बन गया जमींदार! ED और CID की जांच में चौंकाने वाले खुलासे

 1 साल का बच्चा बन गया जमींदार! ED और CID की जांच में चौंकाने वाले खुलासे


बोकारो के तेतुलिया मौजा में 103 एकड़ जमीन की फर्जी खरीद-बिक्री मामले में ईडी और सीआईडी के शपथ पत्रों ने चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। जांच में पता चला ...और पढ़ें




ईडी और सीआईडी के शपथ पत्रों में सामने आए अंतर।


राज्य ब्यूरो, रांची। बोकारो के तेतुलिया मौजा स्थित 103 एकड़ जमीन की कथित फर्जी खरीद-बिक्री मामले में ईडी और सीआइडी के शपथ पत्रों ने कई चौंकाने वाले तथ्य उजागर किए हैं। जांच में सामने आया है कि जमीन के स्वामित्व से जुड़े दस्तावेजों में गंभीर विसंगतियां हैं, जिससे पूरे सौदे पर संदेह गहरा गया है।


ईडी ने कोर्ट में दाखिल अपने शपथ पत्र में बताया है कि याचिकाकर्ता शैलेश कुमार सिंह ने इजहार हुसैन और अख्तर हुसैन से पावर ऑफ अटॉर्नी लिया था। आरोप है कि इन दोनों ने विवादित जमीन के स्वामित्व के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार किए।
दादा को नीलामी में मिली जमीन

इजहार हुसैन ने दावा किया था कि जमीन उन्हें नीलामी बिक्री प्रमाणपत्र (191/1933) और 25 नवंबर 2004 की गिफ्ट डीड के आधार पर मिली थी। उनके अनुसार, यह जमीन उनके दादा समीर महतो उर्फ समिरुद्दीन अंसारी को नीलामी में प्राप्त हुई थी। ईडी की जांच में यह दावा संदिग्ध पाया गया। शपथ पत्र के अनुसार समिरुद्दीन अंसारी की जन्मतिथि 5 अप्रैल 1932 दर्ज है, जबकि नीलामी वर्ष 1933 में हुई बताई गई है।

इस आधार पर सवाल उठता है कि मात्र एक वर्ष का बच्चा नीलामी प्रक्रिया में कैसे शामिल हो सकता है। दूसरी ओर, सीआइडी ने अपने शपथ पत्र में समिरुद्दीन अंसारी की जन्मतिथि 26 मार्च 1924 बताई है और नीलामी की तिथि 20 सितंबर 1933। इस हिसाब से भी वह नीलामी के समय केवल नौ वर्ष पांच माह के थे, जो कानूनी रूप से नाबालिग होने के कारण नीलामी में भाग लेने के पात्र नहीं थे। जांच एजेंसियों ने इन दस्तावेजों को फर्जी करार दिया है।

25 नवंबर 1933 को जमीन सरेंडर

जांच में यह भी सामने आया कि कथित नीलामी के बाद 25 नवंबर 1933 को जमीन सरेंडर कर दी गई थी, लेकिन इसका उल्लेख सेल सर्टिफिकेट में नहीं है। साथ ही, जिस सेल सर्टिफिकेट नंबर 191/193 का हवाला दिया गया, वह वर्ष 2025 में जारी पाया गया, जिसकी पुष्टि पुरुलिया जिला निबंधक कार्यालय से हुई है।


संबंधित दस्तावेज वर्तमान में गायब हैं और इस संबंध में मामला भी दर्ज किया गया है। तीन सदस्यीय जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में यह भी बताया कि 1993 के एक रजिस्टर (वॉल्यूम 58) के पन्ने फाड़े गए हैं।
कई गुना ज्यादा दर पर बेचा

ईडी ने यह भी खुलासा किया है कि उमायुष मल्टीकाम प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी ने इस जमीन को सरकारी सर्किल दर से कई गुना अधिक कीमत पर बेचा। जहां सर्किल दर 50 हजार रुपये प्रति डिसमिल थी, वहीं जमीन को 5.50 लाख रुपये प्रति डिसमिल की दर से 20 अलग-अलग खरीदारों को बेचा गया।


उदाहरण के तौर पर, एक खरीदार बेबी देवी ने पांच डिसमिल जमीन के लिए सरकारी मूल्य के अनुसार ढाई लाख रुपये दिखाए, जबकि वास्तविक भुगतान 22.50 लाख रुपये किया गया।

इधर सीआईडी के शपथ पत्र में एक महत्वपूर्ण तथ्य का अभाव भी सामने आया है। सीआईडी ने इस मामले में इजहार हुसैन, अख्तर हुसैन और राजबीर कंस्ट्रक्शन के संचालक के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी, लेकिन इसका उल्लेख हाई कोर्ट में दिए गए शपथ पत्र में नहीं किया गया। वहीं, ईडी ने अपने शपथ पत्र में इस चार्जशीट का जिक्र किया है, जिससे दोनों एजेंसियों के प्रस्तुतीकरण में अंतर भी उजागर हुआ है।

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