चीन में 56 जातीय समूहों को पहचान देने के लिए नया कानून, बच्चों को सिखाया जाएगा कम्युनिस्ट पार्टी से प्यार
चीन सरकार 'जातीय एकता और प्रगति को बढ़ावा देने वाला कानून' ला रही है, जिसका मकसद 56 जातीय समूहों को एक साझा पहचान देना है। मानवाधिकार कार्यकर्ता इसे अ ...और पढ़ें

चीन ला रहा 'जातीय एकता' कानून, 56 समूहों को मिलेगी साझा पहचान।
अल्पसंख्यक संस्कृतियों पर खतरा, हान चीनी संस्कृति में आत्मसात का आरोप।
मंदारिन को बढ़ावा, बच्चों को कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति वफादारी सिखाना।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। चीन की शी चिनफिंग सरकार अब 56 जातीय समूहों को एक साझा राष्ट्रीय पहचान देने के लिए एक नया कानून पास करने की कगार पर है। यह कानून 'जातीय एकता और प्रगति को बढ़ावा देने वाला कानून' के नाम से जाना जा रहा है। यह कानून चीन की संसद के वार्षिक सत्र में जल्द ही मंजूर हो सकता है।
सरकार का दावा है कि यह कानून देश में लोगों के बीच एकता बढ़ाएगा और आधुनिकीकरण को गति देगा। लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ता और विशेषज्ञ इसे अल्पसंख्यक समुदायों की संस्कृति और अधिकारों पर बड़ा खतरा मान रहे हैं। उनका कहना है कि यह कानून पहले से चल रही हान चीनी संस्कृति में जबरन घोलने की नीति को कानूनी रूप देगा।
कानून का मुख्य प्रावधान क्या है?
इस कानून में मंदारिन (चीन की भाषा) को और ज्यादा महत्व दिया जाएगा। अन्य जातीय भाषाओं की स्थिति कमजोर होगी और स्कूलों में मुख्य विषयों की पढ़ाई मंदारिन में ही होगी। इसके साथ साथ अलग-अलग जातीय समूहों के बीच शादी को प्रोत्साहन दिया जाएगा। किसी भी जातीय या धार्मिक आधार पर ऐसी शादियों को रोकने की कोशिश को गलत माना जाएगा और उस पर रोक लगेगी।
माता-पिता पर जिम्मेदारी होगी कि वे अपने बच्चों को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से प्यार करना सिखाएं। बच्चों को पार्टी के प्रति वफादारी और राष्ट्र की एकता का भाव विकसित करना होगा।
एकता के नाम पर शिकंजा कसने की तैयारी
इस कानून में कोई भी व्यक्ति, संगठन या गतिविधि जो जातीय समूहों के बीच संघर्ष, नफरत बढ़ाए या अलगाव की मांग करे, उसे पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाएगा। ऐसा कोई भी कदम 'जातीय एकता' को नुकसान पहुंचाने वाला माना जाएगा।
यह कानून शी चिनफिंग की 'सिनिसाइजेशन' नीति को और मजबूत करेगा। सिनिसाइजेशन का मतलब है कि धर्म और सांस्कृतिक परंपराओं को भी चीनी संस्कृति और कम्युनिस्ट पार्टी के मूल्यों के अनुरूप ढाला जाए।
अल्पसंख्यक क्षेत्रों में पहले से चल रही नीतियां
चीन में 56 आधिकारिक जातीय समूह हैं, जिनमें हान सबसे बड़ा है। उइगर, तिब्बती, मंगोल जैसे अल्पसंख्यक समूहों की आबादी लाखों में है। सरकार का सबसे ज्यादा ध्यान शिनजियांग और तिब्बत जैसे क्षेत्रों पर है।
शिनजियांग में उइगर और अन्य तुर्किक मुस्लिम समुदाय रहते हैं। तिब्बत में चीन के शासन के खिलाफ लंबे समय से विरोध होता रहा है। 2008 में ल्हासा में भिक्षुओं ने बड़े विरोध किए थे। चीन के अनुसार 22 लोग मारे गए, जबकि निर्वासित तिब्बती संगठनों का दावा है कि करीब 200 मौतें हुईं।
2009 में उरुमची में उइगर और हान के बीच हिंसक झड़पें हुईं, जिसमें लगभग 200 लोग मारे गए। 2013 में तियानआनमेन स्क्वायर पर कार बम हमला और 2014 में युन्नान रेलवे स्टेशन पर हमला भी उइगर अलगाववादियों से जुड़ा बताया गया।
अल्पसंख्यकों पर प्रतिबंध
सरकार इन हिंसक घटनाओं के कारण सख्त कदम जरूरी बताती है। लेकिन संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठन आरोप लगाते हैं कि शिनजियांग में 10 लाख से ज्यादा उइगर मुस्लिमों को हिरासत शिविरों में रखा गया। चीन इन्हें 'पुनर्शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र' कहता है।
रिपोर्ट्स में कहा गया है कि उइगरों की धार्मिक गतिविधियां रोकी गईं, कई मस्जिदें बंद की गईं। तिब्बत में मठों पर सख्त नियंत्रण है। 18 साल से कम उम्र के बच्चों को अब सरकारी स्कूलों में मंदारिन पढ़ना पड़ता है, वे बौद्ध धार्मिक ग्रंथ नहीं पढ़ सकते। पहले बच्चे मठों में जाकर भिक्षु बनने की ट्रेनिंग लेते थे।
हाल के वर्षों में इनर मंगोलिया में मंगोलियाई भाषा पढ़ाने पर रोक और निंगशिया में मस्जिदें तोड़ने के आदेश के बाद भी विरोध हुए।