निचली अदालत ने दी फांसी, ऊपरी अदालत ने किया बरी; क्या बेगुनाह काट रहे जेल?
Death penalty statistics India 2016-2025: नलसार यूनिवर्सिटी की एक नई रिपोर्ट ने भारत में मौत की सजा सुनाने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। आंकड़ो ...और पढ़ें

रिपोर्ट का खुलासा- 10 साल में ट्रायल कोर्ट के 30% 'मौत के मुजरिम' हुए बरी। फोटो- एआई जेनरेटेड है।
नलसार रिपोर्ट ने मौत की सजा प्रक्रिया पर सवाल उठाए।
उच्च अदालतों में मृत्युदंड के दोषियों की उच्च बरी दर।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। देश में निर्मम हत्याएं, बर्बरता से रेप और गैंगरेप व अन्य जघन्य अपराध समाज को झकझोर रहे हैं। तकरीब हर घटना के बाद दोषी को सख्त सजा देने की मांग होती है ताकि अपराधियों में भय पैदा हो और क्राइम पर लगाम कसी जा सके। लेकिन हाल ही में जारी हैदराबाद स्थित नलसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के साथ जुड़े आपराधिक कानूनों पर काम करने वाले संगठन स्क्वायर सर्कल क्लीनिक की नई रिपोर्ट ने भारत में मौत की सजा सुनाने की न्यायिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों द्वारा मृत्युदंड के दोषियों को बरी किए जाने की उच्च दर 'गलत या अनुचित दोषसिद्धि' के पैटर्न को दर्शाती है। 10 वर्षों के आंकड़ों से पता चला है कि शीर्ष अदालत ने हाल के सालों में किसी को भी मौत की सजा देने की पुष्टि नहीं की है। उच्च न्यायालयों ने भी केवल 8% दोषियों की मौत की सजा बरकरार रखी है।
रिपोर्ट में सामने आया कि निचली अदालतों/ट्रायल कोर्ट में जिन मामलों में मौत की सजा सुनाई गई, उनमें से अधिकांश मामले उच्च न्यायिक स्तरों पर जांच में खरे नहीं उतरे। यही कारण रहा कि निचली अदालत में मौत की सजा पाने वाले दोषियों को हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली। सजा रद्द या उम्रकैद में परिवर्तित कर दी गई और कई मामलों में तो बरी तक कर दिया गया।
ट्रायल कोर्ट्स ने 10 वर्ष में 1,310 मौत की सजा सुनाई, हाई कोर्ट ने केवल 70 की सजा रखी बरकरार।
सुप्रीम कोर्ट ने 2023-25 के दौरान किसी भी मामले में मौत की सजा न सुनाई और न बरकरार रखी।
10 साल में हाईकोर्ट ने कितने निचली अदालत के दोषी किए बरी?
रिपोर्ट के अनुसार, देशभर के ट्रायल कोर्ट ने 2016 से 2025 के बीच 822 मामलों में 1310 लोगों को मौत की सजा सुनाई। उच्च न्यायालयों ने इनमें से 842 सजाओं पर विचार किया, लेकिन केवल 70 दोषियों (8.31%) की सजा को ही बरकरार रखा।इसके विपरीत 258 अभियुक्तों (30.64%) को बरी कर दिया गया।
अध्ययन में पाया गया कि हाई कोर्ट स्तर पर बरी होने की दर पुष्टि की गई सजाओं की दर से चार गुना अधिक थी।
मृत्युदंड पाने वाले दोषी पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया?
पिछले एक दशक में सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युदंड के जिन 153 मामलों पर विचार किया, उनमें 38 मामलों में आरोपियों को बरी कर दिया गया। अकेले 2025 में हाई कोर्ट ने 85 मामलों में से 22 में मृत्युदंड को पलट दिया। उसी वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युदंड के मामलों में से आधे से अधिक (19 में से 10) आरोपियों को बरी कर दिया।
मृत्युदंड पर अदालत के फैसले आंकड़ेनिचली अदालतों (Sessions Courts) द्वारा सुनाई गई कुल मौत की सजा 1,310
उच्च न्यायालयों (High Courts) द्वारा विचार किए गए मामले 842
उच्च न्यायालयों द्वारा बरकरार रखी गई फांसी की सजा 70
उच्च न्यायालयों द्वारा बरी किए गए मामले 258
सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए मृत्युदंड के मामले 38
सुप्रीम कोर्ट द्वारा बरकरार रखी गई फांसी की सजा 0
नोट- यह आंकड़े पिछले 2015 से 2025 के बीच हैं।
रिपोर्ट में क्या कहा गया?
अध्ययन में कहा गया कि अंततः बरी किए गए 364 व्यक्तियों को दोषी ठहराया ही नहीं जाना चाहिए था। उन्हें अनुचित रूप से मौत की सजा का मानसिक आघात झेलना पड़ा। इस तरह की विफलताएं जांच एवं अभियोजन में गंभीर कमियों को दर्शाती हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में गलत, त्रुटिपूर्ण या अनुचित दोषसिद्धि कोई आकस्मिक घटना नहीं है। आंकड़े बताते हैं कि यह एक निरंतर और गंभीर प्रणालीगत समस्या है।
रिपोर्ट में कम पुष्टि दर का कारण अपीलीय न्यायपालिका की उचित प्रक्रिया में विफलताओं से संबंधित चिंताओं को बताया गया है। कहा गया है कि यह सजा सुनाने के चरण में सुरक्षा उपायों की सुप्रीम कोर्ट द्वारा बढ़ती जांच के अनुरूप है।