नक्सल से राजनीति तक फैला वन्यजीव तस्करी का जाल, झारखंड- बिहार- छत्तीसगढ़ में चल रहा था करोड़ों का अवैध कारोबार
झारखंड, बिहार और छत्तीसगढ़ में वन्यजीव तस्करी के एक बड़े नेटवर्क का पर्दाफाश हुआ है। वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो और पलामू टाइगर रिजर्व ने 61 शिका ...और पढ़ें

पूर्व नक्सली राजू उरांव नेटवर्क का मुख्य सूत्रधार बना।
जागरण संवाददाता, मेदिनीनगर (पलामू)। झारखंड, बिहार और छत्तीसगढ़ के जंगलों में फैला वन्यजीव तस्करी का नेटवर्क सिर्फ शिकारियों तक सीमित नहीं था। इसके पीछे नक्सल पृष्ठभूमि, राजनीतिक संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय तस्करी गिरोहों का खतरनाक गठजोड़ काम कर रहा था।
वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो और पलामू टाइगर रिजर्व की संयुक्त कार्रवाई में 61 शिकारियों और तस्करों की गिरफ्तारी के साथ इस पूरे तंत्र का पर्दाफाश हुआ है।
जांच एजेंसियों के अनुसार, यह नेटवर्क नक्सल प्रभाव वाले दुर्गम इलाकों से शुरू होकर राजनीति की छाया में पनपा और बाद में अंतरराष्ट्रीय तस्करी गिरोहों तक जा पहुंचा। करोड़ों रुपये मूल्य के दुर्लभ वन्यजीव और उनके अवशेष इसी संरक्षण में जंगलों से बाहर भेजे जाते रहे।
नक्सल छोड़ राजनीति में उभरा, बना रैकेट की सबसे अहम कड़ी
इस पूरे रैकेट की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी लातेहार जिले के गारु निवासी राजू उरांव को माना जा रहा है। राजू उरांव वर्ष 2007–08 में नक्सल संगठन छोड़कर मुख्यधारा में शामिल हुआ था। इसके बाद उसने राजनीतिक संपर्क मजबूत किए और धीरे-धीरे एक प्रभावशाली चेहरे के रूप में उभरा।
जांच में सामने आया है कि नक्सल नेटवर्क और जंगलों की गहरी जानकारी का इस्तेमाल कर राजू उरांव ने बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ के शिकारियों व तस्करों को एक सूत्र में बांधा। नेटवर्क के भीतर सौदे तय करने से लेकर राजनीतिक संपर्कों की आड़ में इंटरनेशनल रैकेट तक माल पहुंचाने की व्यवस्था वही करता था।
राजनीतिक रसूख में पनपे बड़े तस्कर
गिरफ्तार तस्करों में कई ऐसे नाम हैं, जिनका स्थानीय स्तर पर राजनीतिक रसूख बताया जा रहा है। बिहार के औरंगाबाद निवासी मोहम्मद सिराज पर सांप के जहर की तस्करी का आरोप है।
वहीं, बक्सर के जयराम सिंह, मधुबनी के अजय कुमार झा और पंकज कुमार झा, मुजफ्फरपुर निवासी धीरज कुमार श्रीवास्तव तथा इंद्रजीत कुशवाहा को तेंदुआ और हिरण की खाल की तस्करी के आरोप में गिरफ्तार किया गया है।
जांच एजेंसियों का दावा है कि जयराम सिंह और अजय कुमार झा को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था। इसी संरक्षण के चलते वे लंबे समय तक कानून की पकड़ से बाहर रहे। अजय कुमार झा पर रेड सैंड बोआ की तस्करी के साथ-साथ उसे पालतू जानवर की तरह रखने का भी गंभीर आरोप है।
नक्सल इलाकों से शिकार, राजनीति की छाया में सप्लाई
जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि नक्सल प्रभावित इलाकों में स्थानीय ग्रामीणों और पूर्व नक्सल संपर्कों के जरिए शिकार कराया जाता था। बेहद कम कीमत पर वन्यजीव या उनके अवशेष खरीदे जाते थे, जिन्हें राजनीतिक पहुंच रखने वाले तस्करों के माध्यम से बड़े गिरोहों तक पहुंचाया जाता था। यही गिरोह आगे अंतरराष्ट्रीय रैकेट से जुड़कर करोड़ों की तस्करी कर रहे थे।
राजनीतिक संरक्षण की परतें खुलने के संकेत
इस बड़ी कार्रवाई के बाद जांच एजेंसियों की नजर अब उन राजनीतिक चेहरों पर भी टिकी है, जिनकी छाया में यह रैकेट फल-फूल रहा था। सूत्रों के मुताबिक,आने वाले दिनों में राजनीतिक संरक्षण,फंडिंग और नेटवर्क से जुड़े और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं।