ईरान युद्ध पर ट्रंप का 'पाषाण प्लान' फेल, उठ रहे गहरे सवाल

ईरान युद्ध पर ट्रंप का 'पाषाण प्लान' फेल, उठ रहे गहरे सवाल

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव में दो हफ्ते के ठहराव के बावजूद, डोनल्ड ट्रंप की युद्ध रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं। युद्ध समर्थकों को भी नागरिक हताहतों की च ...और पढ़ें





धमकी से ठहराव तक ट्रंप की जंग पर अब अपने ही खेमे में उठ रहे सवाल (फाइल फोटो)


ट्रंप की ईरान रणनीति पर अब सवाल उठ रहे हैं।


सीजफायर के बावजूद युद्ध समर्थकों में भी चिंता बढ़ी।


वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहरा असर, तेल कीमतें बढ़ीं।


डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव में भले ही दो हफ्ते का ठहराव आ गया हो, लेकिन जंग को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। खास बात यह है कि अब सिर्फ युद्ध विरोधी ही नहीं, बल्कि जंग का समर्थन करने वाले लोग भी ट्रंप की रणनीति को लेकर असहज नजर आ रहे हैं।


डोनल्ड ट्रंप ने अपनी तय समयसीमा खत्म होने से करीब 90 मिनट पहले ईरान पर बमबारी रोकने का ऐलान किया। उन्होंने कहा कि अगर ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह सुरक्षित तरीके से खोलता है, तो अमेरिका दो हफ्ते तक हमले नहीं करेगा। हालांकि, इस फैसले से पहले ट्रंप के बयान काफी सख्त थे। उन्होंने चेतावनी दी थी कि अगर समझौता नहीं हुआ तो 'पूरी सभ्यता खत्म हो सकती है', जिससे वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ गई थी।

जंग के तरीके पर उठे सवाल

विशेषज्ञों और विश्लेषकों का कहना है कि युद्ध के दौरान भी कुछ सीमाएं होती हैं। आमतौर पर देश यह बताते हैं कि कार्रवाई क्यों जरूरी है और नागरिकों को निशाना नहीं बनाया जाएगा। लेकिन ट्रंप के बयानों ने इस परंपरा को तोड़ दिया, जिससे कई समर्थक भी असहज हो गए।


अब पश्चिमी देशों के प्रभावशाली वर्ग में भी यह भावना बढ़ रही है कि यह जंग सही दिशा में नहीं जा रही। यहां तक कि जो संस्थान पहले इस जंग का समर्थन कर रहे थे, उन्होंने भी अब चिंता जतानी शुरू कर दी है कि कहीं आम नागरिकों को ज्यादा नुकसान न हो।

मीडिया और विशेषज्ञों की बदलती राय

कुछ प्रमुख अखबारों और विशेषज्ञों ने भी ट्रंप की रणनीति पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जंग का मकसद लोगों को नहीं, बल्कि सत्ता को निशाना बनाना होना चाहिए। कई विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि अगर हमले आम नागरिकों तक पहुंचे, तो इससे हालात और बिगड़ सकते हैं।


वहीं कुछ लोग अब भी मानते हैं कि ट्रंप की सख्ती से लंबी अवधि में शांति का रास्ता निकल सकता है। लेकिन धीरे-धीरे आलोचना बढ़ती जा रही है और यह अब सिर्फ युद्ध विरोधी आवाजों तक सीमित नहीं रही।
आर्थिक असर और लंबी चिंता

इस जंग का असर सिर्फ युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। तेल की कीमतों में उछाल और सप्लाई में बाधा से वैश्विक बाजार प्रभावित हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह संघर्ष लंबा चला, तो यह 1970 के दशक जैसी आर्थिक स्थिति पैदा कर सकता है, जिसमें महंगाई और आर्थिक सुस्ती दोनों बढ़ते हैं।


कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि जंग के बावजूद ईरान को आर्थिक नुकसान उतना नहीं हुआ, जितना उम्मीद की जा रही थी। उल्टा, तेल की ऊंची कीमतों से उसकी कमाई बढ़ गई है। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या जंग अपने असली मकसद को हासिल कर पा रही है या नहीं। कई विशेषज्ञों का मानना है कि इस संघर्ष का असर दुनिया भर में पड़ रहा है, लेकिन लक्ष्य पर उतना नहीं जितना सोचा गया था।

Share this

Related Posts

Previous
Next Post »