सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से आतंकवाद और मादक पदार्थों के मामलों का विवरण मांगा
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से आतंकवाद और मादक पदार्थों के मामलों की जानकारी प्रदान करने को कहा है। यह कदम विशेष अदालतों की ...और पढ़ें

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से आतंकवाद और मादक पदार्थों के मामलों की जानकारी प्रदान करने को कहा, जिनकी जांच केंद्रीय और राज्य एजेंसियों, जैसे कि एनआईए और एनसीबी द्वारा की जा रही हैं। यह विशेष अदालतों की स्थापना की दिशा में एक कदम है, ताकि मामलों का शीघ्र निपटारा किया जा सके।
शीर्ष अदालत ने केंद्र से सभी राज्यों में यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) और एनडीपीएस अधिनियम (नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रापिक सब्सटेंसेस एक्ट) के तहत दर्ज मामलों की सुनवाई के लिए अदालतों की स्थापना हेतु प्रत्येक राज्य को एक करोड़ रुपये उपलब्ध कराने पर विचार करने को कहा।
विशेष अदालतों की स्थापना का दिया था निर्देश
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से विशेष अदालतों का सुचारु संचालन सुनिश्चित करने के लिए प्रति वर्ष एक करोड़ रुपये जारी करने पर विचार करने को भी कहा।
24 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) द्वारा जांच किए जा रहे मामलों और यूएपीए के अंतर्गत आने वाले मामलों के लिए विशेष अदालतों की स्थापना का निर्देश दिया था।
सोमवार को प्रधान न्यायाधीश ने इस दायरे को बढ़ाते हुए 17 राज्यों के अधिवक्ताओं से यूएपीए और एनडीपीएस अधिनियम के तहत दर्ज मामलों का विवरण प्रस्तुत करने को कहा, चाहे उनकी पैरवी एनआइए या राज्य पुलिस द्वारा की जा रही हो या नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो या राज्य एजेंसियों द्वारा।
अदालत ने मामले पर स्वत: लिया था संज्ञान
पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि मुकदमों के शीघ्र निपटारे से आरोपित और पीडि़त, दोनों के अधिकारों में संतुलन बना रहेगा। अदालत ने शेष राज्यों को भी नोटिस जारी कर उनसे आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराने को कहा। एनआईए के मुकदमों में वर्षों से लंबित मामलों को लेकर चिंताओं के मद्देनजर स्वत: संज्ञान लेते हुए शीर्ष अदालत ने सुनवाई शुरू की थी।
अदालत ने गौर किया कि दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात, बिहार और जम्मू-कश्मीर सहित 17 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश ऐसे हैं, जहां लंबित मामलों की संख्या बहुत ज्यादा है। इनमें से कई राज्यों में विशेष अदालतों पर अत्यधिक बोझ है, क्योंकि पीठासीन अधिकारियों को गैर-एनआइए मामले भी सौंपे गए हैं।