जल्द ही इतिहास बन जाएगा 'सिविल लाइंस'... अंग्रेजों के दौर की पहचान मिटाने की शुरू हुई कवायद
केंद्र सरकार 'सिविल लाइंस' जैसे औपनिवेशिक नामों को बदलने की तैयारी में है। यह ब्रिटिश शासन की पहचान मिटाने और भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने का एक बड़ ...और पढ़ें

ब्रिटिश शासन के दौरान बनाए गए 'सिविल लाइंस' जैसे इलाकों का नाम और अवधारणा अब इतिहास बन सकती है। केंद्र सरकार देश में औपनिवेशिक दौर की बची हुई परंपराओं और नामों को बदलने की दिशा में काम कर रही है। इसी क्रम में 'सिविल लाइंस' को भी समीक्षा के लिए चिन्हित किया गया है।
सूत्रों के अनुसार, सरकार एक बड़ा अभियान चला रही है, जिसके तहत ब्रिटिश शासन की निशानियों को पहचानकर उन्हें भारतीय संस्कृति के अनुरूप बदला जाएगा। जनवरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों से ऐसे औपनिवेशिक प्रथाओं की पहचान करने और उनके भारतीय विकल्प सुझाने को कहा था।
'सिविल लाइंस' की शुरुआत 19वीं सदी में हुई थी। ये इलाके खास तौर पर ब्रिटिश अफसरों के रहने के लिए बनाए गए थे, जहां बेहतर सुविधाएं और ढांचा होता था। ये क्षेत्र सत्ता के करीब होने का प्रतीक भी माने जाते थे।
कई शहरों में मौजूद हैं सिविल लाइंस
आज भी 'सिविल लाइंस' दिल्ली समेत उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र के कई शहरों में मौजूद हैं। पहले ये इलाके पुराने शहरों या बाजारों से अलग होते थे और खास पहचान रखते थे।
शहरी योजनाकारों के अनुसार, उस समय शहरों का विकास इस तरह किया जाता था कि एक तरफ सैन्य छावनी (कैंटोनमेंट) होती थी और दूसरी तरफ सिविल लाइंस। यह शहरों के नियोजित विकास का हिस्सा था।
पूर्व डीडीए आयुक्त एके जैन का कहना है कि अब इन इलाकों में काफी बदलाव आ चुका है। पहले जहां बंगले होते थे, वहां अब बहुमंजिला इमारतें बन गई हैं और ये इलाके अब शहर का सामान्य हिस्सा बन चुके हैं।
नाम बदलने पर क्या है राय?
विशेषज्ञों का मानना है कि अब ‘सिविल लाइंस’ का नाम बदलने का ज्यादा प्रभाव नहीं होगा, क्योंकि इन इलाकों की पहचान समय के साथ बदल चुकी है। हालांकि, सरकार का उद्देश्य औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकलकर भारतीय पहचान को मजबूत करना है। पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने कई सड़कों और जगहों के नाम बदले हैं। उदाहरण के तौर पर, दिल्ली की 'रेस कोर्स रोड' का नाम बदलकर 'लोक कल्याण मार्ग' किया गया है।