मोजतबा से लेकर पेजेश्कियन तक... वो 6 प्रभावशाली चेहरे, जो तय करते हैं ईरान की किस्मत
मोजतबा खामेनेई, सैन्य रणनीतिकार मोहसिन रेजाई और अहमद वाहिदी से लेकर राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन तक आज हम आपको ईरान के उन 6 प्रभावशाली चेहरों के बारे मे ...और पढ़ें
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अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच 40 दिन तक लगातार युद्ध चलने के बाद अस्थायी सीजफायर हो गया है। सीजफायर के बीच इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान में चल रही शांति वार्ता फेल हो गई है। शनिवार देर रात अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध विराम और तनाव कम करने को लेकर आमने-सामने की बातचीत का पहला चरण पूरा हुआ।
लेकिन इसका कोई हल नहीं निकला। अब अमेरिका ने वापसी का एलान कर दिया है। इस बीच ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई से लेकर युद्ध के मैदान में तपे रणनीतिकारों और सीमित शक्तियों वाले राष्ट्रपति तक, आज हम आपको उन छह प्रमुख चेहरों के बारे में बताने जा रहे हैं। जो न केवल तेहरान की दिशा तय कर रहे हैं, बल्कि जिनके फैसले पूरे पश्चिम एशिया की किस्मत बदल सकते हैं।
मोजतबा खामेनेई
सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद नया सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई को बनाया गया। मोजतबा वास्तव में सुप्रीम लीडर के लिए उत्तराधिकारी नहीं थे। क्योंकि इससे पहले ईरान का उद्देश्य कभी भी वंशानुगत दिखना नहीं था। कई वर्षों तक, मोजतबा अपने भाषणों से कम और अपनी चुप्पी से अधिक जाने जाते थे।
हालांकि, ईरान की सत्ता संरचना से जुड़े लोग पहले से ही उनके प्रभाव से अवगत थे। वह दिखाई नहीं देते थे, लेकिन उनकी उपस्थिति अवश्य थी। नियुक्तियों में, निर्णयों में, और इस बात के निर्धारण में कि सर्वोच्च नेता से कौन मिल पाएगा और कौन नहीं। ईरान के सर्वोच्च नेता के रूप में पदभार संभालने के बाद से उन्हें आज तक किसी ने नहीं देखा है। अब सत्ता संभालने के बाद, उनसे ईरान को पूरी तरह से बदलने की उम्मीद नहीं दिख रही है।
मोहसेन रेजाई
मोहसेन रेजाई ने अपना अधिकांश जीवन संघर्ष की तैयारी में बिताया है। वह आईआरजीसी के पूर्व कमांडर हैं और उस पीढ़ी से ताल्लुक रखते हैं, जिसने ईरान-इराक युद्ध (1980-1988) में लड़ाई लड़ी और उसे परिभाषित किया। उनके भाषण, नीतियां और रुख लगातार समझौते की बजाय ताकत का समर्थन करते रहे हैं।
युद्ध के दौरान ईरानी नेता उन्हीं पर भरोसा करते हैं, जो कूटनीति के बजाय शक्ति के बारे में सोचते हैं। मौजूदा संकट में उनकी आवाज तनाव बढ़ाने वाली है, लेकिन साथ ही स्पष्टता भी दर्शाती है।
अहमद वाहिदी
अहमद वाहिदी ने आईआरजीसी की कमान ऐसे समय में संभाली है जब नेतृत्व ही निशाने पर आ गया है। ईरान के सैन्य प्रतिष्ठान के उच्च अधिकारियों पर एक के बाद एक, तेजी से हमले हुए। इससे वाहिदी के सामने एक ऐसी चुनौती आ गई, जिसे शायद ही कोई करना चाहे। वह है, कमान का पुनर्निर्माण करना, मनोबल बनाए रखना और एक ऐसे दुश्मन का जवाब देना जिसने पहले ही साबित कर दिया है कि वह गहराई तक हमला कर सकता है।
ईरान की क्षेत्रीय रणनीति में अहमद वाहिदी के पूर्व नेतृत्व ने उन्हें ईरान की क्षेत्रीय रणनीति के केंद्र में ला खड़ा किया, जहां संघर्ष अप्रत्यक्ष, जटिल होते हैं और शायद ही कभी खुले तौर पर स्वीकार किए जाते हैं। वाहिदी की भूमिका अब केवल रणनीतिक नहीं बल्कि तात्कालिक है। वाहिद ईरान में आज के समय में उन लोगों में से एक हैं, जो मोर्चा संभाले हुए हैं।
मोहम्मद बगेर गालिबफ
मोहम्मद बगेर ईरान-इराक युद्ध के दौरान वर्दीधारी एक युवा के रूप में शुरुआत की, मोहम्मद उस पीढ़ी का हिस्सा थे जो मजबूरीवश तेजी से आगे बढ़ी। जहां से मोहम्मद ने असाधारण सहजता के साथ सैन्य कमांडर, वायुसेना प्रमुख, पुलिस प्रमुख जैसे पदों पर अपनी भूमिकाएं निभाईं।
मोहम्मद बगेर के हर बदलाव के साथ उनके सामने नई छवि सामने आती थी। पुलिस प्रमुख के रूप में उन्होंने आधुनिकीकरण को बढ़ावा दिया। तेहरान के मेयर के रूप में उन्होंने विकास पर ध्यान केंद्रित किया। ईरान की व्यवस्था में मोहम्मद बगेर गालिबफ
जैसे व्यक्ति बेहद जरूरी हैं। क्योंकि यह नौकरशाही और युद्धक्षेत्र दोनों को अच्छे समझते हैं।
मसूद पेजेश्कियन
मसूद पेजेश्कियन ईरान के वर्तमान और 9वें राष्ट्रपति हैं। जुलाई 2024 में हुए चुनाव में जीत के बाद उन्होंने 28 जुलाई 2024 को पदभार ग्रहण किया। लेकिन ईरान में राष्ट्रपति जैसे पद के पास बहुत कम ही पावर होती है। ईरान में राष्ट्रपति पद सत्ता का केंद्र नहीं है। यह अधिक शक्तिशाली संस्थानों के साथ-साथ और अक्सर उनके अधीन कार्य करता है।
हालांकि, युद्ध के दौरान, उन्होंने परस्पर विरोधी दबावों को संतुलित करने की कोशिश की है- जिनमें राज्य का समर्थन करना, जनभावनाओं का प्रबंधन करना और संयम का संकेत देना शामिल है।
अब्बास अराघची
सैनिकों और धर्मगुरुओं के वर्चस्व वाली व्यवस्था में अब्बास अरघची महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एक अनुभवी राजनयिक के रूप में अराघची ने उन वार्ताओं में भी हत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिनके परिणामस्वरूप 2015 का परमाणु समझौता हुआ। वह समझौते की भाषा को समझते हैं।
भले ही वह जिस व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है वह अक्सर इसका विरोध करती हो। विदेश मंत्री के रूप में, वे धारणा के मोर्चे पर सबसे आगे रहकर काम करते हैं। जहां दूसरे लोग जमीनी स्तर पर घटनाओं को आकार देते हैं, वहीं वह इस बात को आकार देते हैं कि उन घटनाओं को दुनिया के सामने कैसे समझाया जाए।