झारखंड में बंद पड़ी खदानों की 350 एकड़ भूमि पर अब लहलहाएंगे जंगल, लगेंगे साल और जामुन के पौधे

 झारखंड में बंद पड़ी खदानों की 350 एकड़ भूमि पर अब लहलहाएंगे जंगल, लगेंगे साल और जामुन के पौधे



झारखंड में कोयला, लौह और बॉक्साइट खनन करने वाली केंद्रीय व निजी कंपनियों की 350 एकड़ बंद पड़ी भूमि पर अब पौधरोपण होगा। पिछले पांच वर्षों में 250 एकड़ ...और पढ़ें



350 एकड़ बंद खदान भूमि पर होगा पौधरोपण।


स्थानीय पौधे जैसे बांस, साल, जामुन लगेंगे।


नए खनन स्थलों से पेड़ हटाने की भी पहल।


राज्य ब्यूरो, रांची। राज्य में कोयला, लौह और बॉक्साइट खनन कर रही केंद्रीय और निजी कंपनियों का काम पूरा होने पर इनकी भूमि पौधरोपण के लिए प्रयोग की जाएगी। बीसीसीएल, सीसीएल, सेल और बाक्साइट खनन करने वाली कंपनियों के 350 एकड़ भूमि पर खनन बंद हो चुका है।


केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को इन कंपनियों ने खनन बंद होने की जानकारी दी है। इस भूमि का स्वामित्व लीज रहने तक खनन करने वाली कंपनियों के पास ही रहता है। लेकिन राज्य के वन एवं पर्यावरण विभाग को यह भूमि पौधरोपण के लिए सौंप दी जाती है।


पिछले पांच वर्षों में करीब 250 एकड़ जमीन पर पौधरोपण किया गया है। अब 350 एकड़ नई भूमि की पहचान हुई है। इसके लिए केंद्रीय वन मंत्रालय ने राज्य सरकार से पत्राचार किया है है। उम्मीद की जा रही है कि इस वर्ष ही मानसून प्रारंभ के साथ बंद पड़ी खदानों की भूमि पर पौधरोपण प्रारंभ कर दिया जाएगा।


नई खनन साइट से पौधे हटाने की भी पहल

कोयला खनन के लिए नए क्षेत्र की पहचान होने से वहां पहले से मौजूद पेड़ पौधों को हटाना भी केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की पहल में शामिल है। धनबाद जिले के कतरास क्षेत्र में दस एकड़ भूमि पर लगे पौधों को हटाने के लिए विशेषज्ञों से सलाह ली गई है।


कोयला खनन करने वाली कंपनियों को यह क्षेत्र सौंपने से पहले वृक्षों को काटना या दूसरे जगह ले जाने का विकल्प दिया गया है। केंद्र सरकार ने वृक्षों को स्थानांतरित नहीं किए जाने की स्थिति में क्षतिपूर्ति पौधरोपण का निर्देश भी दिया है।

ग्रीन जोन में लगेंगे बांस, साल समेत स्थानीय पौधे

खनन क्षेत्र में लगने वाले पौधों में स्थानीय वनस्पति को प्राथमिकता दिए जाने का निर्दश वन एवं पर्यावरण विभाग ने दिया है। इन क्षेत्रों को ग्रीन जोन के नाम से जाना जाएगा।


यहां बांस, साल, नीम, जामुन के पौधे लगाए जाएंगे। इससे पहले हरियाली बढ़ाने के लिए यूकलिप्टस और अकेशिया के पौधे लगाए जाते थे। इन पौधों के स्थानीय वनस्पति नहीं माना गया है।

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