झारखंड में खनन के बाद जमीन का होगा बेहतर उपयोग: एलआईवीईएस फ्रेमवर्क से पर्यावरण और रोजगार में सुधार
Jharkhand Coal Mine Rehabilitation: केंद्रीय कोयला मंत्री जी. किशन रेड्डी ने बताया कि झारखंड में कोयला खनन के बाद छोड़ी गई जमीनों का वैज्ञानिक और टिका ...और पढ़ें

खनन के बाद भूमि का होगा उपयोग।
झारखंड में खनन के बाद छोड़ी जमीनों का टिकाऊ उपयोग।
एलआईवीईएस फ्रेमवर्क से पर्यावरण सुधार, स्थानीय आजीविका।
2025 माइन क्लोजर गाइडलाइन, 128 खदानों में काम।
संवाददाता, बोकारो। झारखंड में कोयला खनन के बाद छोड़ी गई जमीनों के उपयोग और पर्यावरणीय सुधार को लेकर केन्द्रीय कोयला मंत्री जी किशन रेड्डी ने लोकसभा में महत्वपूर्ण जानकारी दी है। गिरिडीह सांसद चंद्र प्रकाश चौधरी द्वारा लोकसभा में उठाए गए सवाल के जवाब में कोयला मंत्रालय ने बताया कि राज्य में खदान बंदी की प्रक्रिया अब वैज्ञानिक और टिकाऊ तरीके से लागू की जा रही है।
मंत्री ने कहा कि एलआईवीईएस फ्रेमवर्क को प्रभावी रूप से लागू किया जा रहा है, जिससे खनन प्रभावित क्षेत्रों में पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय लोगों के जीवन स्तर में सुधार होगा। सरकार के अनुसार झारखंड में कुल 128 खदानों (37 अंडरग्राउंड, 77 ओपनकास्ट और 14 मिश्रित) में खदान बंदी और भूमि पुनर्वास का काम चल रहा है। ये सभी कार्य स्वीकृत माइन क्लोजर प्लान के तहत किए जा रहे हैं, जिसे 2025 की नई गाइडलाइन के अनुसार अनिवार्य बनाया गया है।
कोल इंडिया लिमिटेड समेत अन्य कंपनियां इन योजनाओं को लागू कर रही हैं। सांसद चंद्र प्रकाश चौधरी ने कहा कि यह पहल झारखंड जैसे खनन प्रधान राज्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इससे न केवल पर्यावरण को लाभ मिलेगा बल्कि स्थानीय लोगों की आजीविका भी सुदृढ़ होगी। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में इसका सकारात्मक असर पूरे राज्य में देखने को मिलेगा।
माइन क्लोजर प्लान 2025 से बढ़ी सख्ती
कोयला मंत्रालय द्वारा जारी माइनिंग प्लान एवं माइन क्लोजर प्लान, 2025 के गाइडलाइन के तहत अब हर खदान के लिए शुरुआत से ही क्लोजर प्लान तैयार करना अनिवार्य कर दिया गया है। इसमें खदान के पूरे जीवनकाल के दौरान चरणबद्ध तरीके से भूमि पुनर्वास, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक विकास के कार्य शामिल किए जाते हैं।
नई व्यवस्था के तहत कंपनियों को वित्तीय प्रावधान (फंड) भी पहले से सुनिश्चित करना होगा। ताकि खदान बंद होने के बाद पुनर्वास कार्य प्रभावित न हो। इसके अलावा थर्ड पार्टी ऑडिट, नियमित निरीक्षण और कोल कंट्रोलर संगठन द्वारा निगरानी को भी अनिवार्य किया गया है। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित किया जा सकेगा।
मंत्री ने बताया कि अब खदान बंदी और जमीन के भविष्य उपयोग की योजना बनाने में आधुनिक तकनीकों का सहारा लिया जा रहा है। जीआईएस आधारित सिस्टम, जियो-टैग फोटो और डिजिटल मॉनिटरिंग के जरिए यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि भूमि का सही उपयोग हो और पर्यावरणीय संतुलन बना रहे।
पर्यावरण सुधार के साथ रोजगार के अवसर
एलआईवीईएस फ्रेमवर्क के तहत कई अहम कदम उठाए जा रहे हैं, जिनमें खदानों की जमीन को भराई कर समतल बनाना, बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण, जैव विविधता को बढ़ावा देना और खदान गड्ढों को जलाशयों में बदलना शामिल है। इसके अलावा इन क्षेत्रों में मछली पालन, सोलर प्रोजेक्ट, इको पार्क और पर्यटन जैसी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
इससे स्थानीय और विशेषकर आदिवासी समुदायों को रोजगार के नए अवसर मिल रहे हैं। लोगों को स्किल डेवलपमेंट के जरिए आत्मनिर्भर बनाने की भी पहल की जा रही है।केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि सभी संचालित, बंद और परित्यक्त खदानों के लिए माइन क्लोजर प्लान बनाना अनिवार्य है। इसकी निगरानी कोल कंट्रोलर संगठन द्वारा की जा रही है। सरकार का लक्ष्य है कि खदान बंद होने के बाद भी जमीन का उपयोग समाज और पर्यावरण के हित में हो।